राधा अष्टमी का पर्व देवी राधारानी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। राधा अष्टमी को श्रीराधाष्टमी एवं श्रीराधा जन्मोत्सव के नाम से भी जाना जाता है। सम्पूर्ण ब्रज में, मुख्यतः बरसाना स्थित श्री राधारानी मन्दिर, मान मन्दिर तथा वृन्दावन स्थित श्री राधावल्लभ मन्दिर एवं सेवाकुञ्ज में श्री राधा अष्टमी का पर्व अत्यन्त हर्षोल्लास से मनाया जाता है। कल्पभेद के अनुसार रावल ग्राम स्थित श्री राधारानी जन्मस्थली पर राधाष्टमी का अति विशिष्ट महोत्सव मनाया जाता है।
राधाष्टमी श्री राधारानी का वार्षिक जन्मोत्सव है तथा सम्पूर्ण भारत में अत्यधिक लोकप्रिय है। मुख्य रूप से राधावल्लभ सम्प्रदाय, गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय, निम्बार्क सम्प्रदाय, पुष्टिमार्ग सम्प्रदाय तथा हरिदासी सम्प्रदाय में राधा अष्टमी प्रधान उत्सव माना जाता है। इस पावन अवसर पर राधाकृष्ण के मन्दिरों में विशाल महोत्सव आयोजित होता है।

हिन्दु धर्मग्रन्थों में श्री राधारानी को भगवान श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है। भगवान श्रीकृष्ण के अधिकांश चित्रों एवं मूर्तियों में उन्हें देवी राधा सहित दर्शाया जाता है। श्री राधारानी एवं भगवान कृष्ण एक दूसरे के बिना अधूरे माने जाते हैं। भक्तगण राधारानी को श्रीजी कहकर भी सम्बोधित करते हैं।
राधा अष्टमी का पर्व श्री राधारानी के जन्म काल से ही मनाया जा रहा है। श्री राधा-कृष्ण को समर्पित समस्त मन्दिरों एवं देवस्थलों के लिये यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण उत्सव है। भगवान कृष्ण एवं देवी राधा से सम्बन्धित विभिन्न नगरों एवं ग्रामों में राधाष्टमी अधिकांश घरों में मनायी जाती है। मथुरा, वृन्दावन एवं द्वारका आदि धर्म नगरों में श्रीजी का जन्मोत्सव अत्यन्त श्रद्धाभाव से मनाया जाता है।
राधाष्टमी के दिन मुख्यतः देवी श्री राधारानी की पूजा अर्चना की जाती है। श्रीजी का जन्मोत्सव होने के कारण इस दिन उनके बाल किशोरी स्वरूप का पूजन एवं अभिषेक किया जाता है। श्री राधारानी के बाल स्वरूप को वृषभानु लली के नाम से जाना जाता है। इसके अतिरिक्त श्रीजी के पिता वृषभानु जी एवं माता कीर्तिदा की भी पूजा-अर्चना की जाती है।
हिन्दु कैलेण्डर के अनुसार
भाद्रपद (6वाँ माह) की शुक्ल पक्ष अष्टमी
ब्रज क्षेत्र में श्री राधा अष्टमी का उत्सव नौ दिनों तक चलता है, जिसके अन्तर्गत छठी पूजन, चाव शोभायात्रा, समाज गायन, बधाई गायन, ददिकांधा तथा छप्पन भोग आदि का आयोजन किया जाता है। श्री राधारानी के जन्म की प्रसन्नता में वृन्दावन के प्रमुख देवालयों में सेवायतों एवं भक्तों द्वारा वस्त्र, आभूषण, खिलौने, मिष्टान्न आदि विभिन्न प्रकार की वस्तुयें लुटायी जाती हैं।
वृन्दावन स्थित श्री राधावल्लभ मन्दिर एवं सेवा कुञ्ज में श्री राधा अष्टमी का उत्सव नौ दिनों तक मनाया जाता है। इन नौ दिनों में विभिन्न प्रकार के अनुष्ठान एवं परम्पराओं का पालन करते हुये मन्दिरों में बधाई गायन एवं ददिकान्धा आयोजित किया जाता है। मन्दिरों में फूल एवं फलों से सुन्दर-सुन्दर बंगले बनाये जाते हैं तथा श्रीजी को छप्पन भोग अर्पित किये जाते हैं। इसके अतिरिक्त एक विशाल शोभायात्रा भी निकाली जाती है जिसे स्थानीय भाषा में चाव कहा जाता है।
बरसाना स्थित श्री लाडली जी महाराज मन्दिर में राधाष्टमी के अवसर पर विशाल महोत्सव का आयोजन किया जाता है। इस दिन श्रीजी का विशेष पञ्चामृत अभिषेक एवं पूजन किया जाता है। तदुपरान्त राधारानी मन्दिर प्राङ्गण में स्थित श्वेत छतरी में विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देती हैं। राधा अष्टमी, हरियाली तीज तथा रंगवाली होली, वर्ष में मात्र इन तीन अवसरों पर ही श्रीजी श्वेत छतरी में विराजमान होती हैं।
पश्चिम बंगाल में भी श्री राधा अष्टमी का पर्व अत्यन्त धूमधाम से मनाया जाता है। इस अवसर पर ढोल-मृदंग एवं मंजीरे की ताल पर श्री राधाकृष्ण के नाम का संकीर्तन किया जाता है। इसके अतिरिक्त इस्कॉन मन्दिरों में भी राधाष्टमी के अवसर पर श्री राधारानी का विशेष अभिषेक एवं पूजन किया जाता है तथा सुन्दर फूल बंगला भी बनाया जाता है।
राधाष्टमी का पर्व मणिमहेश झील की पवित्र तीर्थयात्रा के लिये भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इस यात्रा को मणिमहेश यात्रा के नाम से भी जाना जाता है। इस अवसर पर तीर्थयात्री भगवान शिव का भजन करते हुये निकटतम सड़क मार्ग हडसर से मणिमहेश झील तक 14 किलोमीटर की पदयात्रा करते हैं। कृष्ण जन्माष्टमी से प्रारम्भ होने वाली मणिमहेश यात्रा पन्द्रह दिनों के उपरान्त राधाष्टमी के दिन समाप्त होती है।
श्री राधा अष्टमी भारत में एक राजपत्रित अवकाश नहीं है। हालाँकि ब्रज क्षेत्र के कुछ विद्यालय एवं महाविद्यालय श्री राधा अष्टमी के अवसर पर एक दिवसीय अवकाश रखते हैं।