भगवान भैरव को भगवान शिव के एक रौद्र रूप में वर्णित किया गया है। हिन्दु धर्म में, भगवान भैरव के आठ भिन्न-भिन्न रूपों की पूजा-अर्चना की जाती है जिन्हें संयुक्त रूप से अष्ट भैरव कहा जाता है। कालभैरव भी उन्हीं अष्ट भैरव में से एक हैं। ब्रह्मवैवर्तपुराण में महाभैरव, संहार भैरव, असितांग भैरव, रुद्र भैरव, कालभैरव, क्रोध भैरव, ताम्रचूड़ भैरव तथा चन्द्रचूड़ भैरव नामक अष्ट भैरव वर्णित किये गये हैं।
भगवान शिव के इस कालभैरव रूप को समय एवं मृत्यु का अधिष्ठाता कहा गया है। भैरव का अर्थ 'भयङ्कर एवं विनाश करने वाला' अथवा 'भय को हरने वाला' होता है। भगवान कालभैरव के पूजन से मन में व्याप्त सभी प्रकार के ज्ञात-अज्ञात भय नष्ट होते हैं तथा शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। भूत, प्रेत, पिशाच आदि दुष्टात्माओं से रक्षा हेतु भी कालभैरव जी का पूजन किया जाता है।

इनके पूजन हेतु सामान्यतः रात्रिकाल को उपयुक्त माना जाता है। अधिकांश भक्तगण रविवार, मंगलवार एवं शनिवार को उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। प्रत्येक माह की कृष्ण पक्ष अष्टमी को मासिक कालाष्टमी के रूप में मनाया जाता है। मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष अष्टमी के दिन भगवान कालभैरव की जयन्ती मनायी जाती है।
धर्मग्रन्थों में वर्णित भगवान कालभैरव की उत्पत्ति से सम्बन्धित पौराणिक कथा इस प्रकार है।
नन्दीश्वर बोले - "सनत्कुमार जी! भैरव जी परमात्मा शिव के पूर्ण अवतार हैं। एक समय भगवान ब्रह्मा सुमेरु पर्वत पर विराजमान थे। उसी समय वहाँ सभी देवगण उपस्थित हुये तथा ब्रह्माजी को प्रणाम करते हुये बोले - 'हे प्रजापति! सृष्टि में अविनाशी तत्व क्या है? कृपया करके आप हमें सृष्टि के यथार्थ से अवगत करायें।' उस समय भगवान शङ्कर की माया के वशीभूत होकर ब्रह्मा जी उस अविनाशी तत्व के विषय में अनभिज्ञ होते हुये भी उसका वर्णन करने लगे और बोले कि - 'हे ऋषियों! मैं उस अविनाशी तत्व के यथार्थ रूप का वर्णन करता हूँ, आप सभी देवगण ध्यानपूर्वक श्रवण करें। मुझसे महान कोई अन्य देवता नहीं है। मैं ही इस सृष्टि को उत्पन्न करने वाला, स्वयम्भू, अज एवं अनादि भोक्ता ब्रह्मा हूँ। मैं ही इस सृष्टि को प्रवृत्त एवं निवृत्त करने वाला हूँ। सम्पूर्ण सृष्टि में मुझसे श्रेष्ठ कोई अन्य नहीं है।'
उन ऋषिगणों के मध्य भगवान विष्णु भी विराजमान थे। अतः ब्रह्मा जी के इन आत्ममुग्ध वचनों का श्रवण करके विष्णु जी उन्हें समझाते हुये बोले - 'हे ब्रह्मा! तुम यह किस प्रकार का व्यवहार कर रहे हो? तुम्हें यह भली-भाँति ज्ञात होना चाहिये कि मेरी ही आज्ञा से तुम सृष्टि के सृजनकर्ता के रूप में प्रतिष्ठित हुये हो।'
इस प्रकार भगवान विष्णु एवं ब्रह्मा जी के मध्य स्वयं की श्रेष्ठता सिद्ध करने हेतु वाद-विवाद आरम्भ हो गया तथा दोनों ही स्वयं की महानता एवं प्रभुत्व सिद्ध करने हेतु वेद-वाक्यों का उदाहरण प्रस्तुत करने लगे। उसी समय चारों वेद मूर्त रूप धारण कर उन दोनों के समक्ष उपस्थित हो गये। सर्वप्रथम ऋग्वेद ने कहा - 'जिसमें समस्त भूत विद्यमान हैं, जिनमें समस्त सृजन प्रवृत्त होता है तथा जिनको परम तत्व कहा जाता है, वे एकमात्र रुद्र ही हैं।' तदुपरान्त यजुर्वेद ने कहा - 'जिनके माध्यम से हमारी प्रमाणिकता सिद्ध होती है, नाना प्रकार के यज्ञों एवं योग विद्याओं द्वारा जिनका ध्यान किया जाता है ऐसे सर्वज्ञ एवं सर्व-दृष्टा केवल एक भगवान शिव हैं।' तत्पश्चात् सामवेद ने कहा - 'जो समस्त संसार को भ्रमित करने वाले हैं, योगीजन जिनकी खोज करते हैं, जिनके तेज से सम्पूर्ण जगत् प्रकाशवान है, वह मात्र त्रिनेत्रधारी शिव जी ही हैं।' तदुपरान्त अथर्ववेद ने कहा - 'जिनकी अनुभूति एवं साक्षात्कार केवल निश्चल भक्ति से ही सम्भव है, जो समस्त प्रकार के दुखों से रहित हैं, वे परमात्मा केवल भगवान शिव ही हैं।'
वेदों के इन वचनों का श्रवण कर भगवान विष्णु एवं ब्रह्माजी ने कहा - 'वेदों! यह मात्र तुम्हारी अज्ञानता है। निरन्तर शिवा के साथ रमण करने वाले, नग्न रहने वाले, पीत वर्ण, भस्म एवं धूलि-धूसरित शिव को भला परम तत्व कैसे कहा जा सकता है?'
उन दोनों के यह वचन सुनकर सर्वत्र विद्यमान रहने वाले ओंकार ने कहा - 'भगवान शिव शक्ति को धारण करने वाले हैं। वे अपनी शक्ति के अभाव में रमण नहीं कर सकते। वे तो लीलाधर हैं, किन्तु निःसन्देह वे ही परम् परमेश्वर हैं।'
ओंकार के वचनों से भी भगवान विष्णु एवं ब्रह्मा जी सन्तुष्ट नहीं हुये तथा उनके मध्य पुनः विवाद प्रारम्भ हो गया। उसी समय उनके मध्य एक अत्यन्त तीव्र एवं विशाल तेजोमयी प्रकाश पुञ्ज प्रकट हुआ। उस प्रकाश पुञ्ज का न आदि था न ही अन्त। उसके तेज से ब्रह्माजी का पञ्चम् शिर दहन होने लगा। तत्क्षण ही त्रिशूलधारी नील-लोहित भगवान शिव वहाँ प्रकट हो गये। ब्रह्मा जी ने उनसे कहा - 'नील लोहित! चन्द्रमौलि भयभीत मत करो, मैं तुमसे भली प्रकार परिचित हूँ। पूर्वकाल में तुम मेरे शिर से ही उत्पन्न हुये थे तथा रुदन करने के कारण मैंने तुम्हें रुद्र नाम से सम्बोधित किया था। हे पुत्र! मेरी शरण ग्रहण करो, मैं तुम्हारी रक्षा अवश्य करूँगा।'
ब्रह्माजी के मुख से इन अभिमानपूर्ण वचनों को सुनकर भगवान शिव क्रोधित हो उठे तथा प्रलय हेतु तत्पर हो गये। उनके इस अत्यन्त तीव्र क्रोध से भैरव नामक एक पुरुष की उत्पत्ति हुयी। भगवान शिव ने भैरव से कहा - 'भैरव! तुम ब्रह्मा पर शासन करो तथा सृष्टि का पालन करो। तुम साक्षात् काल के समान हो अतः तुम कालभैरव के रूप में पूजे जाओगे। हे कालराज! मुक्ति प्रदायनी काशीपुरी समस्त पुरियों में श्रेष्ठतम है। मैं सदैव के लिये तुम्हें काशीपुरी का अधिपति घोषित करता हूँ। उस पुरी में जो भी पापी होंगे तुम उनको सूचिबद्ध करोगे।' भगवान शिव से वरदान प्राप्त होते ही, कालभैरव ने अपने बायें हाथ की उँगली के नख से ब्रह्मा जी का पाँचवाँ शिर काट दिया। स्वयं की इस दुर्दशा से व्यथित होकर ब्रह्मा जी शतरुद्रिय का पाठ करने लगे। भगवान विष्णु एवं ब्रह्माजी को सत्य का भान हो गया तथा उन दोनों ने भगवान शिव को परब्रह्म परमात्मा के रूप में स्वीकार कर लिया। उन दोनों के अहङ्कार का शमन होते ही भगवान शिव ने उन्हें अभयदान प्रदान किया।
तदुपरान्त भगवान शिव ने कालभैरव जी से कहा - 'हे नील लोहित! तुम इन ब्रह्मा-विष्णु का आदर करो तथा ब्रह्मा के कपाल को धारण कर उसी में भिक्षावृत्ति करते हुये ब्रह्महत्या के भय का निवारण करो।' इतना कहते हुये शिव जी ने तत्काल ब्रह्महत्या नामक एक कन्या प्रकट की। शिव जी ने कालभैरव से कहा - 'इस कन्या के काशी पहुँचने से पूर्व ही तुम वहाँ जाओ तथा जब यह कन्या वहाँ पहुँचे तो उससे कहना कि वाराणसी के अतिरिक्त अन्य किसी भी स्थान पर विचरण करो। तदुपरान्त यह कन्या समस्त स्थानों पर विचरण कर काशी आयेगी जिसके पश्चात् इसकी मुक्ति हो जायेगी।' उसी समय से भगवान शिव के आदेशानुसार कालभैरव जी काशी पुरी में विराजमान हैं। इसीलिये उन्हें काशी का कोतवाल भी कहा जाता है।"
इस प्रकार भगवान विष्णु एवं ब्रह्माजी के अहङ्कार को नष्ट करके, उनको परम् तत्व का ज्ञान प्रदान करने तथा उनके मध्य श्रेष्ठता के विवाद को शान्त करने हेतु भगवान शिव कालभैरव रूप में प्रकट हुये थे।
कालभैरव को अत्यन्त भयावह एवं भयङ्कर रूप में वर्णित किया गया है। वे श्याम एवं नील वर्ण के हैं, उनके नेत्र क्रोधाग्नि से ज्वलन्त हैं। उनके शीश पर जटाजूट हैं। वे गजचर्म अथवा बाघम्बर धारण करते हैं। किन्तु रूप भेद से उन्हें नग्नावस्था में भी चित्रित किया जाता है। उनकी देह पर यज्ञोपवीत एवं कटिसूत्र के रूप में सर्प सुशोभित हैं तथा गले में वे मुण्डमाला धारण करते हैं। काल भैरव को अधिकांश चित्रों में चतुर्भुज रूप में दर्शाया जाता है। उनकी चार भुजाओं में वे क्रमशः त्रिशूल, पाश, दण्ड तथा फरसा लिये होते हैं। उनका वाहन श्वान है जिन्हें उनके साथ माया के प्रतीक स्वरूप दर्शाया जाता है।
भगवान कालभैरव, भगवान शिव के स्वयम्भू अवतार हैं अतः उनका कोई प्रथक कुटुम्ब वर्णित नहीं है। भगवान शिव की अर्धांगिनी देवी पार्वती हैं। भगवान गणेश एवं भगवान कार्तिकेय उनके पुत्र हैं।
मूल मन्त्र -
ॐ कालभैरवाय नमः।
बीज मन्त्र -
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं काल भैरवाय नमः।
कालभैरव गायत्री मन्त्र -
ॐ कालाकालाय विद्महे कालातीताय धीमहि।
तन्नो काल भैरव प्रचोदयात्॥