हम दीवाली के दौरान गणेश पूजा विधि को विस्तृत रूप से उपलब्ध करा रहे हैं। दीवाली पूजा के लिये लोगों को भगवान गणेश की नवीन प्रतिमा खरीदनी चाहिये। यह पूजा विधि श्री गणेश की नवीन प्रतिमा या मूर्ति के लिये प्रदान की गयी है। इस पूजा विधि में भगवान गणेश की पूजा करने के लिये सोलह चरण सम्मिलित हैं जिसे षोडशोपचार पूजा के नाम से जाना जाता है।
पूजा के प्रारम्भ में भगवान गणेश का ध्यान करना चाहिये। पूर्व स्थापित गणेश प्रतिमा के समक्ष ध्यान किया जाना चाहिये। भगवान गणेश का ध्यान करते हुये निम्नलिखित मन्त्र का जाप करें।

उद्यद्-दिनेश्वर-रुचिं निज-हस्त-पद्मैः,
पाशांकुशाभय-वरान् दधतं गजास्यम्।
रक्ताम्बरं सकल-दुःखहरं गणेशम्,
ध्याये प्रसन्नमखिलाभरणाभिरामम्॥
मन्त्र अर्थ - मैं सभी दुःखों को हरनेवाले गज-मुख उन भगवान् गणेश का ध्यान करता हूँ, जो रक्त-वस्त्र पहने हैं, जिनके शरीर का वर्ण उदय-कालीन सूर्य के समान तेज-वन्त है, जो अपने कर-कमलों में पाश, अंकुश, अभय और वर धारण किये हैं और सुन्दर-मनोहर विविध प्रकार के अलङ्कारों से सुसज्जित होकर प्रसन्न हैं।
श्री गणेश जी का ध्यान करने के उपरान्त, मूर्ति के समक्ष आवाहन मुद्रा में, अर्थात् दोनों हथेलियों को ऊपर की ओर एक साथ खोले हुये एवं अँगूठों को अपनी ओर मोड़े हुये निम्नलिखित मन्त्र का जाप करें।
आगच्छ देव-देवेश! तेजोराशे गणपते!
क्रियमाणां मया पूजां गृहाण सुर-सत्तम!
॥श्रीमद्-गणपति-देवम् आवाहयामि॥
मन्त्र अर्थ - हे देवताओं के ईश्वर! तेज-सम्पन्न हे संसार के स्वामिन्! हे देवोत्तम! आइये, मेरे द्वारा की जाने वाली पूजा को स्वीकार करें।
॥ मैं भगवान् श्री गणेश का आवाहन करता हूँ ॥
गणेश जी का आवाहन करने के पश्चात् दोनों हथेलिओं अर्थात् अञ्जलि में पाँच पुष्प लीजिये तथा भगवान गणेश की प्रतिमा के समक्ष पुष्पों को अर्पित कर, निम्नलिखित मन्त्र का जाप करते हुये आसन ग्रहण करायें।
नानारत्न-समायुक्तं कार्त-स्वर-विभूषितम्।
आसनं देव देवेश! प्रीत्यर्थं प्रतिगृह्यताम्॥
॥श्रीगणेश-देवाय नमः आसनार्थे पञ्च-पुष्पाणि समर्पयामि॥
मन्त्र अर्थ - हे देवताओं के ईश्वर! विविध प्रकार के रत्न से युक्त स्वर्ण-सज्जित आसन को प्रसन्नता हेतु ग्रहण करें।
॥ भगवान् श्रीगणेश के आसन के लिये मैं पाँच पुष्प अर्पित करता हूँ ॥
गणेश जी को पुष्पों का आसन अर्पण करने के पश्चात् हाथ जोड़कर निम्नलिखित मन्त्र का जाप करते हुये भगवान गणेश का करबद्ध स्वागत करें।
श्रीगणेश-देव! स्वागतम्।
मन्त्र अर्थ - हे भग्वान् गणेश! आपका स्वागत है।
भगवान गणेश का स्वागत करने के पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का जाप करते हुये गणेश जी के चरण प्रक्षालन हेतु जल अर्पित करें।
पाद्यं गृहाण देवेश सर्वक्षेमसमर्थ भोः!
भक्त्या समर्पितं देव गणपते! नमोऽस्तु ते॥
॥श्रीगणेश-देवाय नमः पाद्यं समर्पयामि॥
मन्त्र अर्थ - सभी प्रकार के कल्याण करने में सक्षम हे देवेश्वर! चरण धोने हेतु जल भक्ति-पूर्वक समर्पित है। उसे स्वीकार करें। हे विश्वेश्वर भगवन्! आपको नमस्कार है।
॥ भगवान् श्रीगणेश को चरण धोने के लिये यह जल है - उन्हें नमस्कार ॥
पाद प्रक्षालन के उपरान्त निम्नलिखत मन्त्र का जाप करते हुये भगवान गणेश को अभिषेक हेतु जल अर्पित करें।
नमस्ते देव देवेश! नमस्ते धरणी-धर!
नमस्ते सर्वनागेन्द्र नमस्ते पुरुषोत्तम।
गन्ध-पुष्पाक्षतैर्युक्तं फल-द्रव्य-समन्वितम्।
गृहाण तोयमर्घ्यर्थं परमेश्वर वत्सल!
॥श्रीगणेश-देवाय नमः अर्घ्यं समर्पयामि॥
मन्त्र अर्थ - हे देवेश्वर! आपको नमस्कार। हे धरती को धारण करने वाले! आपको नमस्कार। हे जगत् के आधार-स्वरूप गणेश! आपको नमस्कार। शिर के अभिषेक के लिये यह जल (अर्घ्य) स्वीकार करें। हे कृपालु परमेश्वर! चन्दन-पुष्प-अक्षत से युक्त, फल और द्रव्य के सहित यह जल शिर के अभिषेक के लिये स्वीकार करें।
॥ भगवान् श्रीगणेश के लिये अर्घ्य समर्पित है ॥
निम्नलिखित मन्त्र का जाप करते हुये भगवान गणेश को चन्दन अर्पित करें।
श्रीखण्डं चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम्।
विलेपनं गणपते! चन्दनं प्रतिगृह्यताम्॥
॥श्रीगणेश-देवाय नमः चन्दनं समर्पयामि॥
मन्त्र अर्थ - हे गणपते! मनोहर और सुगन्धित चन्दन शरीर में लगाने हेतु ग्रहण करें।
॥ भगवान् श्रीगणेश के लिये चन्दन समर्पित करता हूँ ॥
निम्नलिखित मन्त्र का जाप करते हुये गणेश जी को पुष्प अर्पित करें।
यथा-प्राप्त-ऋतु-पुष्पैः बिल्व-तुलसी-दलैश्च।
पूजयामि गणपते! प्रसीद मे सुरेश्वर!
॥श्रीगणेश-देवाय पुष्पं समर्पयामि॥
मन्त्र अर्थ - हे गणपते! ऋतु के अनुसार प्राप्त पुष्पों और विल्व तथा तुलसी-दलों से मैं आपकी पूजा करता हूँ। हे देवेश्वर! मुझ पर आप प्रसन्न हों।
॥ भगवान श्रीगणेश के लिये पुष्प समर्पित करता हूँ ॥
अब निम्नलिखित मन्त्र का जाप करते हुये श्री गणेश जी को धुप अर्पित करें।
वनस्पति-रसोद्भूतो गन्धाढ्यः सुमनोहरः।
आघ्रेयः सर्व-देवानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम्॥
॥श्रीगणेश-देवाय नमः धूपम् आघ्रापयामि॥
मन्त्र अर्थ - वृक्षों के रस से निर्मित, सुन्दर, मनोहर, सुगन्धित तथा सभी देवताओं के सूँघने के योग्य यह धूप आप ग्रहण करें।
॥ भगवान् श्रीगणेश के लिये मैं धूप समर्पित करता हूँ ॥
धुप अर्पित करने के पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का जाप करते हुये भगवान गणेश को दीप अर्पित करें।
साज्यं त्रिवर्ति-संयुक्तं वह्निना योजितं मया,
दीपं गृहाण देवेश! त्रैलोक्य-तिमिरापहम्।
भक्त्या दीपं प्रयच्छामि देवाय परमात्मने।
त्राहि मां नरकात् घोराद्दीपोऽयं प्रतिगृह्यताम्॥
॥श्रीगणेश-देवाय नमः दीपं दर्शयामि॥
मन्त्र अर्थ - हे देवेश्वर! घी के सहित और बत्ती से मेरे द्वारा जलाया हुआ, तीनों लोकों के अँधेरे को दूर करने वाला दीपक स्वीकार करें। मैं भक्ति-पूर्वक परमात्मा भगवान् को दीपक प्रदान करता हूँ। इस दीपक को स्वीकार करें और घोर नरक से मेरी रक्षा करें।
॥ भगवान् श्रीगणेश के लिये मैं दीपक समर्पित करता हूँ ॥
अब निम्नलिखित मन्त्र का जाप करते हुये गणेश जी को नैवेद्य अर्पित करें।
शर्करा-खण्ड-खाद्यानि दधि-क्षीर-घृतानि च।
आहारो भक्ष्य-भोज्यं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम्।
॥ श्रीगणेश-देवाय नमः यथांशतः श्रीगणेश-देवाय नैवेद्यं समर्पयामि।
ॐ प्राणाय स्वाहा।
ॐ अपानाय स्वाहा।
ॐ समानाय स्वाहा।
ॐ उदानाय स्वाहा।
ॐ व्यानाय स्वाहा॥
मन्त्र अर्थ - शर्करा-खण्ड (बताशा आदि), खाद्य पदार्थ, दही, दूध और घी जैसी खाद्य वस्तुओं से युक्त भोजन आप ग्रहण करें।
॥यथा-योग्य रूप भगवान् श्री गणेश को मैं नैवेद्य समर्पित करता हूँ - प्राण के लिये, अपान के लिये, समान के लिये, उदान के लिये और व्यान के लिये स्वीकार हो॥
अब निम्नलिखित मन्त्र का जाप करते हुये गणेश जी को आचमन हेतु जल अर्पित करें।
ततः पानीयं समर्पयामि इति उत्तरापोषणम्।
हस्त-प्रक्षालनं समर्पयामि। मुख-प्रक्षालनम्।
करोद्वर्तनार्थे चन्दनं समर्पयामि।
मन्त्र अर्थ - नैवेद्य के उपरान्त मैं पीने और आचमन (उत्तरा-पोशन) के लिये, हाथ धोने के लिये, मुख धोने के लिये जल और हाथों में लगाने के लिये चन्दन समर्पित करता हूँ।
आचमन के पश्चात् भगवान गणेश को ताम्बूल (सुपारी युक्त पान) अर्पित करें।
पूगीफलं महद्दिव्यं नागवल्लीदलैर्युतम्।
कर्पूरैलासमायुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम्॥
॥श्रीगणेश-देवाय नमः मुखवासार्थं पूगीफल-युक्तं ताम्बूलं समर्पयामि॥
मन्त्र अर्थ - पान के पत्तों से युक्त अत्यन्त सुन्दर सुपारी, कपूर और इलायची से प्रस्तुत ताम्बूल आप स्वीकार करें।
॥ भगवान् श्रीगणेश के मुख को सुगन्धित करने के लिये सुपारी से युक्त ताम्बूल मैं समर्पित करता हूँ ॥
अब निम्नलिखित मन्त्र का जाप करते हुये गणेश जी को दक्षिणा अथवा भेंट-उपहार अर्पित करें।
हिरण्यगर्भ-गर्भस्थं हेमबीजं विभावसोः।
अनन्तपुण्य-फलदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥
॥श्रीगणेश-देवाय नमः सुवर्ण-पुष्प-दक्षिणां समर्पयामि॥
मन्त्र अर्थ - असीम पुण्य प्रदान करनेवाले स्वर्ण-गर्भित चम्पक पुष्प से मुझे शान्ति प्रदान करिये।
॥ भगवान् श्रीगणेश के लिये मैं स्वर्ण-पुष्प-रुपी दक्षिणा प्रदान करता हूँ ॥
अब गणेश जी की बायीं ओर से दायीं ओर की दिशा में घूमकर प्रतीकात्मक प्रदक्षिणा करें।
यानि कानि च पापानि जन्मान्तर-कृतानि च।
तानि तानि विनश्यन्ति प्रदक्षिणां पदे पदे॥
अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं प्रभो!
तस्मात् कारुण्य-भावेन क्षमस्व परमेश्वर॥
॥श्रीगणेश-देवाय नमः प्रदक्षिणां समर्पयामि॥
मन्त्र अर्थ - पिछले जन्मों में जो भी पाप किये होते हैं, वे सब प्रदक्षिणा करते समय एक-एक पग पर क्रमशः नष्ट होते जाते हैं। हे प्रभो! मेरे लिये कोई अन्य शरण देने वाला नहीं है, तुम्हीं शरण-दाता हो। अतः हे परमेश्वर! दया-भाव से मुझे क्षमा करो।
॥ भगवान् श्रीगणेश को मैं प्रदक्षिणा समर्पित करता हूँ ॥
निम्नलिखित मन्त्र का जाप से गणेश जी की वन्दना करते हुये पुष्प अर्पित करें।
करचरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा,
श्रवण-नयनजं वा मानसं वाऽपराधम्।
विदितमविदितं वा सर्वमेतत् क्षमस्व,
जय जय करुणाब्धे श्रीगणपते! त्राहि।
॥श्रीगणेश-देवाय नमः मन्त्र-पुष्पं समर्पयामि॥
मन्त्र अर्थ - हे दया-सागर, श्रीगणपते! हाथों-पैरों द्वारा किये हुए या शरीर या कर्म से उत्पन्न, कानों-आँखों से उत्पन्न या मन के जो भी ज्ञात या अज्ञात मेरे अपराध हों, उन सबको आप क्षमा करें। आपकी जय हो, जय हो। मेरी रक्षा करें।
॥ भगवान् श्रीगणेश के लिये मैं मन्त्र-पुष्पांजलि समर्पित करता हूँ ॥
श्री गणेश वन्दना के पश्चात् भगवान गणेश को साष्टङ्ग प्रणाम अर्थात् आठ अङ्गों द्वारा प्रणाम करें।
नमः सर्व-हितार्थाय जगदाधार-हेतवे।
साष्टाङ्गोऽयं सुप्रणामः प्रयत्नेन मया कृतः॥
नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्र-मूर्तये सहस्र-पादाक्षि-शिरोरु-बाहवे।
॥श्रीगणेश-देवाय नमः साष्टाङ्ग-प्रणामं समर्पयामि॥
मन्त्र अर्थ - सभी का कल्याण करनेवाले, जगत् के आधारभूत आपके लिये मैंने प्रयत्न-पूर्वक यह साष्टाङ्ग प्रणाम किया है - अनन्त भगवान् के लिये, सहस्रों स्वरुप वाले भगवान् के लिये, सहस्रों पैर-आँख-शिर-ऊरू एवं बाहु वाले भगवान् को नमस्कार है।
निम्नलिखित मन्त्र का जाप करते हुये पूजा के मध्य हुये समस्त ज्ञात-अज्ञात पाप कर्मों के लिये गणेश जी के समक्ष क्षमा-याचना करें।
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजाकर्म न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर!
मया यत्पूजितं देव! परिपूर्णं तदस्तु मे॥
अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया।
दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वर।
विधेहि देव! कल्याणं विधेहि विपुलां श्रियम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपो-यज्ञ-क्रियादिषु।
नूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम्॥
अनेन यथा-मिलितोपचार-द्रव्यैः कृत-पूजनेन श्रीगणेशदेवः प्रीयताम्।
॥श्रीगणेश-देवार्पणमस्तु॥
मन्त्र अर्थ - न मैं आवाहन करना जानता हूँ, न विसर्जन करना। पूजा-कर्म भी मैं नहीं जानता। हे परमेश्वर! मुझे क्षमा करो॥१॥ मन्त्र, क्रिया और भक्ति से रहित जो कुछ पूजा मैंने की है, हे भगवन्! वह मेरी पूजा सम्पूर्ण हो। मैं रात-दिन सहस्रों अपराध किया करता हूँ। "मैं दास हूँ" - ऐसा मानकर, हे परमेश्वर! मुझे क्षमा करें। हे भगवन्! मुझे रूप, विजय और यश दें। मेरे शत्रुओं का नाश करें।
तपस्या और यज्ञादि क्रियाओं में जिनके नाम का स्मरण और उच्चारण करने से सारी कमी तुरन्त पूरी हो जाती है, मैं उन अच्युत भगवान् की वन्दना करता हूँ।
यथा-सम्भव प्राप्त उपचार-वस्तुओं से मैंने जो यह पूजन किया है, उससे भगवान् श्री गणेश प्रसन्न हों।
॥ भगवान् श्रीगणेश को यह सब पूजन समर्पित है ॥
क्षमा-याचना के पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का जाप करते हुये भगवान गणेश से षोडशोपचार पूजा के उपरान्त अपनी सुरक्षा हेतु प्रार्थना करें।
ॐ रक्ष रक्ष गणाध्यक्ष! रक्ष त्रैलोक्य-रक्षक!
भक्तानामभयं कर्त्ता! त्राता भव भवार्णवात्।
॥अनेन पूजनेन श्रीगणेशः ऋद्धि-सिद्धि-सहितः प्रीयताम्, नमो नमः॥
मन्त्र अर्थ - हे गण-समूहों के अध्यक्ष! मेरी रक्षा करिये, रक्षा करिये। हे तीनों लोकों के रक्षक! मेरी रक्षा करिये। हे भक्तों को निर्भय करनेवाले! संसार-सागर से मेरी रक्षा करनेवाले हों।
॥ इस पूजन से ऋद्धि और सिद्धि के सहित भगवान् गणेश प्रसन्न हों, उन्हें बारम्बार प्रणाम है॥