ऋषि दुर्वासा कहते हैं - "वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली परशुराम द्वादशी का व्रत करने से जो फल प्राप्त होता है, उसका श्रवण करो। प्राचीनकाल में एक अत्यन्त पराक्रमी एवं शूरवीर राजा थे, जिनका नाम वीरसेन था। यद्यपि राजा परम भाग्यशाली थे किन्तु उनका कोई पुत्र नहीं था। अतः पुत्र प्राप्ति की कामना से राजा वीरसेन घोर तपस्या कर रहे थे। जिस स्थान पर राजा तपस्या में लीन थे वहाँ से निकट ही महर्षि याज्ञवल्क्य का आश्रम स्थित था।
एक दिन महर्षि याज्ञवल्क्य तपस्या में लीन राजा वीरसेन से भेंट करने आये। ऋषिवर को अपने समीप आता देखकर राजा वीरसेन करबद्ध प्रणाम कर खड़े हो गये तथा विधिवत् महर्षि याज्ञवल्क्य का स्वागत-सत्कार किया।
तदुपरान्त महर्षि याज्ञवल्क्य ने राजा से पूछा - 'हे धर्मज्ञ राजन्! तुम्हारे इस प्रकार कठिन तप करने का क्या उद्देश्य है? तुम किस मनोरथ की सिद्धि हेतु प्रयासरत हो अथवा कौन सा कार्य सिद्ध करने के इच्छुक हो?'
राजा वीरसेन ने कहा - 'हे मुनिश्रेष्ठ! मैं पुत्रहीन हूँ। मेरी कोई सन्तान नहीं है। हे महर्षे! इसीलिये मैं तप के द्वारा अपनी देह को जीर्ण-शीर्ण कर रहा हूँ।'
ऋषि याज्ञवल्क्य बोले - 'हे राजन्! तपस्या करना सरल नहीं है, इसमें अत्यन्त क्लेश सहना पड़ता है। अतः तुम यह विचार त्याग दो। मैं तुम्हें पुत्र प्राप्ति का अत्यन्त सरल एवं सुलभ उपाय प्रदान करता हूँ। उस उपाय को करने से तुम्हें अवश्य ही पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी।'
ऐसा कहकर महर्षि याज्ञवल्क्य ने राजा वीरसेन के समक्ष वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में किये जाने वाले परशुराम द्वादशी व्रत का वर्णन किया। पुत्र की लालसा से राजा ने पूर्ण विधि-विधान से ऋषिवर के निर्देशानुसार इस पुण्यशाली व्रत का पालन किया।
परशुराम द्वादशी व्रत के चमत्कार से राजा वीरसेन को एक उत्तम एवं परम धार्मिक पुत्र की प्राप्ति हुयी। वह पुत्र समस्त संसार में राजा नल के रूप में विख्यात हुआ। वर्तमान में भी समस्त संसार राजा नल की कीर्ति का गुणगान करता है।
यह तो इस व्रत का मात्र प्रासङ्गिक वर्णन है, वस्तुतः जो परशुराम द्वादशी व्रत का विधिवत् पालन करता है, उसे सुपुत्र, विद्या, कान्ति तथा श्री, अर्थात् धन-समृद्धि की सहज ही प्राप्ति हो जाती है।
अब इस व्रत के पारलौकिक माहात्म्य का श्रवण करो। पूर्ण विधि-विधान एवं नियम-संयम सहित परशुराम द्वादशी व्रत करने वाला मनुष्य एक कल्प की अवधि तक अप्सराओं सहित भगवान ब्रह्मा के ब्रह्मलोक में निवास करता है। तदुपरान्त नवीन सृष्टि का आरम्भ होने पर वह मनुष्य चक्रवर्ती सम्राट होता है तथा उसे 30,000 वर्षों की दीर्घायु प्राप्त होती है।"
॥इस प्रकार श्रीवराहपुराण में वर्णित परशुराम द्वादशी व्रत माहात्म्य सम्पूर्ण होता है॥