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Jivitputrika Vrat Katha | Legends of Jivitputrika Vrat

DeepakDeepak

Jitiya Vrat Katha

Jivitputrika Vrat Katha

Story of King Jimutavahana, the Pakshiraja Garuda and the Shankhachuda Naga

पूर्वकाल में एक समय राजा जीमूतवाहन अपने साले मित्रावसु सहित समुद्र-तट के वनों में भ्रमण कर रहा था कि इतने में उसने एक व्याकुल युवा पुरुष को अपनी ओर आते हुये देखा तथा उसके पीछे एक वृद्धा स्त्री हाय पुत्र, हाय पुत्र, कहकर करुण क्रन्दन करती हुयी आ रही थी। पीछे आते हुये सैनिक के समान किसी पुरुष ने एक ऊँची चट्टान के समीप लाकर उस युवक को छोड़ दिया। जीमूतवाहन ने उस युवक से पूछा - "तू कौन है तथा क्‍या चाहता है? तेरी माता तेरे लिये विलाप क्‍यों कर रही है?"

इन प्रश्नों के उत्तर में उस युवक ने जीमूतवाहन के समक्ष सम्पूर्ण वृत्तान्त का वर्णन करते हुये कहा - "प्राचीन समय में कश्यप की दो पत्नियाँ विनता एवं कद्रू के मध्य किसी कथा के प्रसंग में परस्पर विवाद हो गया। कद्रू ने कहा कि सूर्य के अश्व काले हैं तथा विनता ने कहा श्वेत हैं। इसी बात पर उन्होंने आपस में शर्त लगा ली कि जिसकी बात झूठी होगी, वह दूसरी की दासी बन जायेगी। विजय की इच्छा से कद्रू ने अपने पुत्र सर्पों के द्वारा विषैली फुत्कार से सूर्य के अश्वों का रंग काला करवा दिया तथा छलपूर्वक विजयी हुयी। तदुपरान्त कद्रु ने विनता को दासी बना लिया। यह सत्य है कि स्त्रियों की पारस्परिक ईर्ष्या भी दुःखद होती है।

जब यह प्रसङ्ग विनता के पुत्र गरुड़ को ज्ञात हुआ तो उन्होंने शान्तिपूर्वक अपनी माता को दासता से मुक्त करने हेतु कद्रू से प्रार्थना की। तब कद्रू के पुत्र नागगण आपस में विचार-विमर्श करके बोले कि - 'हे गरुड़! देवताओं ने अभी क्षीरसागर का मन्थन प्रारम्भ किया है। क्योंकि तुम अत्यन्त बलवान हो, अतः अपनी माता की मुक्ति के प्रतिफल में वहाँ से अमृत लाकर हमें दो, तदुपरान्त अपनी माता को स्वीकार करो।'

नागों के यह वचन सुनकर अमृत के लिये क्षीरसागर पर जाकर गरुड़ ने अत्यन्त पौरुष का प्रदर्शन किया। गरुड़ के पराक्रम से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने स्वयं गरुड़ से कहा कि - 'मैं तुमसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ, अतः कुछ वर माँगो।' माता के दासत्व के अपमान से क्रुद्ध गरुड़ ने भगवान से वर माँगा कि - 'नाग मेरे भक्ष्य हों।' भगवान ने तथास्तु कहकर उसे यही वरदान दिया। तत्पश्चात्‌ गरुड़ अपने पराक्रम से अमृत को प्राप्त कर जब चलने लगा, तब तत्त्वज्ञ इन्द्र ने उससे कहा - 'हे पक्षिराज! तुम्हें कुछ ऐसा करना चाहिये कि जिससे वे मूर्ख सर्प, अमृत का पान न कर सकें। अतः मैं इसका सर्पों से हरण कर लूँगा।' यह सुनकर विष्णु के वर से प्रचण्ड गरुड़ ने, इन्द्र के इस प्रस्ताव को स्वीकार किया तथा अमृत-कलश लेकर सर्पों के समीप गया।

वर के प्रभाव से भयभीत नागों से गरुड़ ने कहा कि - 'मैं अमृत ले आया हूँ, मेरी माता को दासता से मुक्त करके इसे ग्रहण करो। यदि तुम्हें मुझसे भय है, तो मैं इसे कुशा के आसन पर रख देता हूँ एवं अपनी माता को मुक्त कर ले जाता हूँ। तुम लोग इसे स्वीकार करो।'

नागों ने कहा - 'उचित है, तुम ऐसा ही करो' इस प्रकार कहने पर गरुड़ ने पवित्र कुशासन पर अमृत-कलश को रख दिया तथा नागों ने गरुड़ की माता विनता को मुक्त कर दिया। माता को दासता से मुक्त कराकर गरुड़ के प्रस्थान करने पर नाग निर्भयतापूर्वक जब अमृतपान करने हेतु एकत्र हुये, तब इन्द्र ने अपनी शक्ति से कुशासन पर रखे हुये सुधा-कलश का अपहरण कर लिया।

हताश नागों ने विचार किया कि सम्भवतः कुछ अमृत गिरकर कुशा में लगा हो, अतः वे कुशाओं को चाटने लगे। कुशाओं को चाटने से उनकी जिव्हाओं के दो भाग हो गये। अत्यन्त लोभ के कारण नागों को यह फल प्राप्त हुआ। अमृत के स्वाद से वञ्चित नागों का शत्रु गरुड़ भगवान विष्णु के वरदान के कारण बारम्बार नागों पर आक्रमण कर उनका भक्षण करने लगा। इसके परिणामस्वरूप गरुड़ के आक्रमण से सम्पूर्ण पाताल व्याकुल हो गया। भय के कारण सर्प निर्जीव से हो गये। गर्भिणी नाग-पत्नियों के गर्भपात होने लगे तथा इसी भय मात्र से अनेक नागों के प्राण पखेरू उड़ गये।

प्रतिदिन इस प्रकार का आतङ्क देखकर नागराज वासुकि ने विचार किया कि इस प्रकार तो समस्त नागलोक सहसा नष्ट हो जायेगा तथा गरुड़ भी अजेय है। यह विचारकर उसने गरुड़ के साथ मिलकर एक नियम बना लिया कि प्रतिदिन एक नाग, समुद्र-तट के पर्वत पर गरुड़ के भोजन के लिये भेज दिया जायेगा। तब नागराज ने गरुड़ से कहा कि - 'तुम पाताल में उपद्रव करने या आतङ्क फैलाने न आया करो। अन्यथा इस प्रकार एक साथ ही समस्त नागों के नष्ट हो जाने पर तुम्हारा स्वार्थ भी सिद्ध नहीं हो पायेगा।' गरुड़ ने भी इस व्यवस्था को स्वीकार कर लिया तथा वासुकि द्वारा भेजे गए एक-एक नाग का वह प्रतिदिन भोजन करने लगा। अतः नागवध के उसी क्रम में आज मेरी बारी है। मेरा नाम शङ्खचूड़ है। मैं भी नागराज की आज्ञा से आज गरुड़ के आहार के लिये इस वध्यशिला पर लाया गया हूँ। अतः मैं माता के लिये व्यथित एवं शोचनीय हो रहा हूँ।"

इस प्रकार शङ्खचूड़ के वचन सुनकर एवं उसके दुःख से द्रवित होकर जीमूतवाहन खेदपूर्वक उससे बोला - "अहो! वासुकि का नागराज होना कितना सारहीन है, जो स्वयं अपनी प्रजा को शत्रु का आमिष, अर्थात् भोजन बना रहा है। उसने सर्वप्रथम स्वयं को ही गरुड़ के भोजन के लिये क्यों नहीं प्रस्तुत किया। प्रत्युत इसके विपरीत ही नपुंसक की भाँति उसने स्वयं के कुल का ही नाश स्वीकार किया। उधर, गरुड़ भी कश्यप ऋषि की सन्तान होकर कितना घोर पाप कर रहा है। महान पुरुषों को भी इस देह के प्रति कितना मोह है। इसीलिये आज मैं तुम एक नाग की, अपना शरीर-दान करके रक्षा करूँगा। तुम व्यर्थ शोक न करो।"

यह सुनकर शङ्खचूड़ भी धैर्यपूर्वक बोला - "हे महात्मन्‌! ऐसा पुनः मत कहना। काँच के लिये मोती की हानि करना उचित नहीं है। मैं भी कुल-कलङ्क बनना नहीं चाहता।" ऐसा कहकर जीमूतवाहन को रोककर वह सज्जन नाग शङ्खचूड़, गरुड़ के आगमन का समय होता देख समुद्रतीरवासी गोकर्ण नामक भगवान शिव को अन्तिम प्रणाम करने हेतु गया। उसके प्रस्थान करने पर दयानिधि जीमूतवाहन को उसकी रक्षा के लिये अपना प्राणदान करने का अवसर मिल गया। तब उसने युक्तिपूर्वक किसी कार्य के बहाने से अपने साथी मित्रावसु को वहाँ से भेज दिया। उसी समय वहाँ उपस्थित हुये गरुड़ के पंखों की वायु से कम्पन करती हुयी भूमि मानों उस महापुरुष के दर्शन से आश्चर्यचकित होकर घूर्णन करने लगी। गरुड़ के आगमन के इस लक्षण से सतर्क होकर परोपकारी जीमूतवाहन उस वध्यशिला पर चढ़ गया।

अपने विशाल पंखों की छाया से आकाश को ढके हुये गरुड़ ने चोंच मारकर उस महाप्राणी जीमूतवाहन को उठा लिया। बहती हुयी रक्तधारा वाले जीमूतवाहन को पहाड़ की चोटी पर ले जाकर उसका भक्षण करने लगा। उसी समय आकाश से पुष्पवृष्टि होने लगी जिससे गरुड़ भी आश्चर्यचकित हो गया। इतने में ही शङ्खचूड़ भी गोकर्णेश्वर शिव को प्रणाम करके आ गया तथा वध्यशिला को रक्त से लथपथ पाकर विचार करने लगा कि - "धिक्कार है मुझे, उस महात्मा ने अवश्य ही मेरे लिये जीवनदान दिया है। गरुड़ इस समय उसे कहाँ ले गया होगा। मैं उसे शीघ्र खोजता हूँ। सम्भव है, मैं उसे प्राप्त कर लूँ।" ऐसा विचारकर वह सज्जन रक्त की धारा का अनुसरण करते हुये चलने लगा।

उधर जीमूतवाहन को प्रसन्न देखकर गरुड़ ने उसका भोजन करना छोड़ दिया तथा आश्चर्यान्वित हो उसे देखने लगा। यह नाग नहीं, कोई अन्य ही जीव है, जो मेरे भक्षण करने पर भी मृत नहीं, अपितु इसके विपरीत प्रसन्न हो रहा है। इस प्रकार मन में विचार करते हुये गरुड़ से अपनी इष्टसिद्धि के लिये जीमूतवाहन बोला - "हे पक्षिराज! अब भी मेरी देह में मांस एवं रक्‍त शेष है। फिर भी, तुम बिना तृप्त हुये ही सहसा भोजन करने से क्‍यों रुक गये हो?" यह सुनकर आश्चर्यचकित गरुड़ ने पूछा - "हे सज्जन! तुम नाग नहीं हो, अतः बताओ कौन हो?"

जीमूतवाहन बोला - "मैं नाग ही हूँ, तुम भोजन करो। जो प्रारम्भ किया है, उसे समाप्त करो। महान व्यक्ति किसी भी कार्य को आरम्भ करके समाप्त किये बिना नहीं छोड़ते।" जीमूतवाहन ऐसा कह ही रहा था कि शङ्खचूड़ दूर से चिल्लाकर बोला - "हे गरुड़! इसका भक्षण मत करो, मत करो, यह नाग नहीं है, तुम्हारा भक्ष्य नाग मैं हूँ! तुम्हें यह सहसा भ्रम कैसे हो गया। इसे मुक्त कर दो।"

यह सुनकर पक्षिराज गरुड़ अत्यन्त व्याकुल हो गया एवं जीमूतवाहन को अपनी अभीष्ट सिद्धि न होने का खेद हुआ। तदनन्तर परस्पर वार्तालाप के प्रसङ्ग में व्यथित होते हुये यह ज्ञात कर कि वह विद्याधरों का राजा है तथा भ्रम से उसका भक्षण करने पर गरुड़ को भारी मानसिक ताप हुआ। वह विचार करने लगा कि - "मुझ जैसे क्रूर ने भारी पाप किया। उच्छृङ्खल वृत्ति के व्यक्तियों से पाप हो जाना सुलभ या स्वाभाविक है। यह एक प्रशंसनीय महात्मा है, जो परहित के लिये अपने प्राण दे रहा है। मैंने अज्ञानवश संसार को नीचा कर दिया।"

इस प्रकार पश्चात्ताप कर पापमुक्ति हेतु अग्नि में भस्म होकर प्राण-त्याग करने का विचार करते हुये गरुड़ से जीमूतवाहन ने कहा - "हे पक्षीराज! दुःखी क्‍यों हो रहे हो? यदि वास्तविकता में पाप से भयभीत हो, तो आज से इन सर्पों का भक्षण करना त्याग दो तथा पूर्व में जिनका भक्षण कर चुके हो, उनके लिये पश्चात्ताप करो। यही इसका प्रायश्चित्त या प्रतिक्रिया है। इसके अतिरिक्त और कुछ भी विचारना व्यर्थ है।"

इस प्रकार प्राणियों पर दया करने वाले जीमूतवाहन के कहने पर गरुड़ ने उसके वचन को गुरु आज्ञा के समान माना एवं तत्पश्चात्‌ वह भक्षण किये हुये नागों को जीवित करने हेतु अमृत लेने गया। क्षत-विक्षित अङ्गों वाले जीमूतवाहन पर उसकी पत्नी मलयवती की भक्ति से सन्तुष्ट होकर स्वयं माता गौरी ने अमृत सिञ्चन किया। साक्षात् माता गौरी द्वारा अमृत-सिञ्चन करने से जीमूतवाहन के अङ्ग अधिक मनोहर हो गये एवं उसकी अत्यधिक शोभा बढ़ गयी। आनन्दित देवताओं के गायन एवं वादन सहित स्वस्थ होकर उठे जीमूतवाहन को देखकर गरुड़ ने सम्पूर्ण समुद्र-तट पर अमृत की वर्षा कर दी। इस अमृत-सिञ्चन के प्रभाव से तट पर इधर-उधर बिखरे हुये सभी नाग-कङ्काल पुनर्जीवित हो उठे। फलतः वह वेला-वन नागों के समूहों से भर गया एवं उन्हें सदैव के लिये गरुड़ के भय से मुक्ति मिल गयी।

ऐसा प्रतीत होता था कि नागकुल के रक्षक जीमूतवाहन के दर्शन हेतु समस्त पाताल वहाँ उपस्थित हो गया हो। तदनन्तर अक्षय शरीर एवं अक्षय यश से शोभित जीमूतवाहन का समस्त बन्धुओं ने अभिनन्दन किया। जीमूतवाहन की पत्नी एवं उसके माता-पिता सभी अत्यन्त प्रसन्न हुये। जीमूतवाहन के कहने पर शङ्खचूड़ भी रसातल को प्रस्थान कर गया तथा जीमूतवाहन का यश तीनों लोकों में प्रकाशित हो गया। तदनन्तर देवताओं के समूह गरुड़ के समीप आकर जीमूतवाहन को प्रणाम करने लगे। माता पार्वती की कृपा से जीमूतवाहन के मतङ्ग नामक सम्बन्धी भी भय से आकर उसे प्रणाम करने लगे जो पहले उसके विरुद्ध थे। उन्हीं पूर्वविरोधी बन्धुओं द्वारा प्रार्थना करने पर जीमूतवाहन अपनी पत्नी मलयवती एवं प्रिय मित्र मित्रावसु के साथ मलयाचल से हिमाचल स्थित अपनी प्राचीन राजधानी को प्रस्थान कर गया। इस प्रकार उस धैर्यशील जीमूतवाहन ने चिरकाल तक विद्याधर-चक्रवर्ती पद का उपभोग किया। इस प्रकार भविष्यपुराण एवं स्कन्दपुराण में वर्णित जीवित्पुत्रिका व्रत कथा सम्पूर्ण होती है।

॥इति श्री जीवित्पुत्रिका व्रत कथा सम्पूर्णः॥

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