भारतीय लघु चित्रकला का इतिहास 10वीं शताब्दी से आरम्भ होता है। 10वीं से 12वीं शताब्दी के मध्य पश्चिमी भारत में लघु चित्रकला का विकास हुआ। जैसा कि नाम से ही ज्ञात होता है कि, ये चित्र आकार में छोटी थीं तथा उस समय लिखी गयी पाण्डुलिपियों का अङ्ग थीं। इन चित्रों के द्वारा पाण्डुलिपियों के विषयों को दर्शाया गया था। ये लघुचित्र कुछ हिन्दु पाण्डुलिपियों में प्राप्त होते हैं तथा इनका आकार 2 से 4 इन्च होता है।
इन चित्रों की रचना ताड़पत्र के नाम से प्रसिद्ध ताड़ के वृक्ष की पत्तियों तथा उस समय उपलब्ध कागज पर की गयी थी। इनमें से कुछ चित्रों में मानव पात्रों को मृग के समान नेत्र, तीक्ष्ण नासिका, विशाल मस्तक के साथ दर्शाया गया है, जो चित्र में दर्शाये मानव आकृतियों को खल्वाट रूप प्रदान करता है।
काँगड़ा चित्रकला हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा जिले में फली-फूली है। काँगड़ा चित्रकला का स्वर्णिम काल 18वीं एवं 19वीं शताब्दी 1750-1850 ई. के मध्य था। काँगड़ा चित्रकला को भारतीय लघु चित्रकला के अन्तर्गत वर्गीकृत किया गया है। इन चित्रकलाओं को उनके लघु आकार के कारण लघुचित्र कहा जाता है। इस प्रकार के चित्रों की रचना, औसतन 25x30 सेमी आकार के कागद पर की जाती थी।
गीत गोविन्द की रचना कवि जयदेव ने 12वीं सदी के समय की थी। इसमें कृष्ण एवं राधा के मध्य के सम्बन्धों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। गीत गोविन्द की प्रेम कवितायें, काँगड़ा चित्रकला का सर्वाधिक लोकप्रिय विषय हैं। राधा एवं कृष्ण की अधिकांश काँगड़ा चित्रकलायें, गीत गोविन्द में श्री राधा एवं कृष्ण के मध्य अन्तरँग प्रेम दृश्यों के वर्णन पर आधारित हैं।
काँगड़ा चित्रकला की रचना, हस्तनिर्मित कागद पर की जाती थी। हस्तनिर्मित कागद का निर्माण विशेषतः इसी प्रकार के कार्यों के लिये किया जाता था। चित्रकला के लिये शाक-सब्जियों एवं खनिज स्रोतों से प्राप्त प्राकृतिक रँगों का प्रयोग किया जाता है। इन चित्रों की रचना करने हेतु गिलहरियों के रोम तथा पक्षियों के पँखों से निर्मित विशेष प्रकार के कूर्च का प्रयोग किया जाता है।
काँगड़ा लघुचित्रों की औसत चौड़ाई लगभग 28-35 सेमी तथा औसत ऊँचाई लगभग 22-26 सेमी होती है। इन लघुचित्रों में रचनाओं के सूक्ष्म विवरण पर अत्यधिक ध्यान दिया जाता है। प्रत्येक वस्तु को इतने विस्तार से चित्रित किया जाता है कि, जब कोई डिजिटल लघुचित्र देखता है, तो वह इन चित्रों के आकार पर विश्वास नहीं कर पाता है। परन्तु सत्य यह है कि, अधिकांश काँगड़ा लघुचित्र लगभग एक फुट आकार के होते हैं। सूक्ष्मताओं की मात्रा इतनी अद्भुत है कि, चित्र की पृष्ठभूमि में चित्रित वृक्षों के पत्ते तथा घास के तृण पृथक-प्रथक देखे जा सकते हैं। श्री राधा-कृष्ण के अधिकांश काँगड़ा चित्रों में हरी-भरी हरियाली दर्शायी जाती है। परिदृश्य विशाल एवं विविधतापूर्ण होता है तथा इसे हरे रँग के विभिन्न रँगों का उपयोग करके अधिक उत्कृष्ट रूप से प्रदर्शित किया जाता है।
काँगड़ा चित्रकला में स्त्री आकृतियाँ असाधारण रूप से सुन्दर दर्शायी गयी हैं तथा उनके पैर कमल के आकार के हैं, जो इन आकृतियों को वास्तविकता से पृथक करते हैं। इन चित्रों में अधिकांश पात्रों को पार्श्व मुखमुद्रा के साथ दर्शाया गया है। इन लघु चित्रों में केवल कुछ ही पात्रों को सामने की ओर मुख किये दर्शाया गया है। चित्र की पृष्ठभूमि में विस्तृत एवं विविध परिदृश्य को दर्शाने के लिये पर्याप्त स्थान शेष रखने के लिये, मानव आकृतियाँ आकार में छोटी हैं तथा छवि के केन्द्र में दर्शायी गयी हैं। भगवान कृष्ण के वस्त्रों को पीले रँग के विभिन्न रँगों द्वारा आकर्षक एवं विशिष्ट रूप से दर्शाया गया है। श्री कृष्ण के वस्त्रों के लिये किसी भी दो चित्रों में एक समान पीले रँग का प्रयोग नहीं किया गया है, जिसके कारण प्रत्येक लघु चित्र व्यक्तिगत एवं नवीन अनुभूति प्रदान करती है।
चित्रों में दर्शायी मानव आकृतियाँ स्वर्ण आभूषणों से सुसज्जित हैं। राधा एवं कृष्ण के आभूषणों को मूल रूप से विस्तृत एवं देदीप्यमान चित्रित किया गया है, जो उनके वास्तविक स्वरूप के निकट है। अधिकांश काँगड़ा चित्रों में पीला एवं हरा रँग सर्वाधिक प्रमुख रँग हैं।
मानव आकृतियों के अतिरिक्त इन चित्रों में पुष्पमयी पौधे, सुन्दर रूप से व्यवस्थित लघु वृक्ष, लघु पहाड़ियाँ, लघु नदियाँ, नाले तथा पक्षी भी चित्रित किये गये हैं।