हिन्दु धर्म में सूर्य ग्रह को भगवान सूर्य अथवा सूर्यदेव के रूप में पूजा जाता है। भगवान सूर्य को हिन्दु धर्म में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है। विभिन्न धार्मिक अवसरों एवं उत्सवों पर सूर्यदेव की पूजा-अर्चना की जाती है। हिन्दु धर्म में की जाने वाली पञ्चदेव उपासना में भगवान सूर्य को भी विशेष स्थान दिया जाता है। भगवान सूर्य को प्रत्यक्ष देवता के रूप में पूजा जाता है, क्योंकि प्राणियों के लिये उनके नित्य दर्शन करना अति सुलभ है। भारत सहित विश्व के अनेक स्थानों पर प्राचीन सूर्य मन्दिर तथा उनके अवशेष प्राप्त होते हैं, जिससे यह प्रमाणित होता है कि, प्राचीनकाल से सूर्योपासना का बहुत अधिक महत्त्व माना जाता रहा है।

सूर्य को वेदों में सृष्टि की आत्मा के रूप में वर्णित किया गया है तथा वर्तमान युग में भी सूर्य की पृथ्वी पर जीवन के लिये आवश्यकता सिद्ध हो चुकी है। वैदिक काल में, आर्य लोग भी सूर्य को ही सम्पूर्ण सृष्टि का कर्ता धर्ता मानते थे। ऋग्वेद में वर्णित देवताओं में सूर्यदेव का महत्त्वपूर्ण स्थान है।
यजुर्वेद में कहा गया है - "चक्षो सूर्यो जायत", अर्थात सूर्य को भगवान के नेत्र के रूप में वर्णित किया गया है। छान्दोग्यपनिषद के अनुसार, सूर्य को सम्पूर्ण सृष्टि का आधार मानकर, ॐ के रूप में सूर्य की आराधना एवं साधना करने से पुत्र प्राप्ति होती है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में सूर्य को परमात्मा स्वरूप माना गया है। आयुर्वेद, ज्योतिष, श्रुतियों, स्मृतियों और पुराणों सहित विभिन्न धर्मग्रन्थों में भगवान सूर्य की महिमा का वर्णन प्राप्त होता है। नवग्रह मण्डल में सूर्य नवग्रहों के राजा के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
सूर्यदेव की उपासना करने से उत्तम स्वास्थ्य एवं दीर्घायु की प्राप्ति होती है। वंश वृद्धि की कामना से भी भगवान सूर्य की उपासना की जाती है। सूर्यदेव को नारायण, तपेन्द्र, भास्कर, दिवाकर, हिरण्यगर्भ, खगेश, मित्र आदि नामों से भी सम्बोधित किया जाता है।
प्राचीनकाल में एक समय देवताओं तथा असुरों के मध्य शत्रुता बहुत अधिक बढ़ गयी। असुरों ने बलपूर्वक समस्त देवताओं को स्वर्ग से निष्कासित कर दिया तथा स्वयं स्वर्ग पर आधिपत्य कर शासन करने लगे। देवराज इन्द्र दुःखी हो अपनी माता के समक्ष पहुँचे तथा अपनी माता अदिति को सम्पूर्ण घटनाक्रम से अवगत करवाया। इन्द्र तथा अन्य देवताओं को कष्ट में देख, माता अदिति भगवान सूर्य की प्रसन्नता हेतु कठिन तपस्या में लीन हो गयीं। देवी अदिति की कठिन तपस्या एवं भक्ति से भगवान सूर्य अत्यन्त प्रसन्न हुये।
सूर्यदेव देवी अदिति के समक्ष प्रकट हुये तथा बोले, "हे देवि! मैं आपकी भक्ति एवं तप से अति प्रसन्न हूँ, कहिये आपको क्या वरदान चाहिये?" देवी अदिति सूर्यदेव के दर्शन कर आनन्दित हुयीं तथा कहा, हे प्रभु! "मेरी यही कामना है कि, आप मेरे पुत्र के रूप में जन्म लें, तथा मुझे मातृसुख प्रदान करें।" सूर्यदेव बोले, तथास्तु देवि! आपने मुझे अपने तप से प्रसन्न किया है, अतः आपकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी, सूर्य देव इतना कहकर वहाँ से अन्तर्धान हो गये।
एक समय अदिति एवं उनके पति प्रजापति कश्यप में किसी विषय को लेकर विवाद हो गया। उस समय देवी अदिति गर्भवती थीं। प्रजापति कश्यप ने उनके गर्भ में स्थित शिशु को मृत कह दिया, उसी समय अदिति के गर्भ से एक प्रकाश पुञ्ज उत्पन्न हुआ, जिसमें से भगवान सूर्य प्रकट हुये। भगवान सूर्य ने ऋषि कश्यप एवं देवी अदिति से कहा कि, आप दोनों इस प्रकाश पुञ्ज की प्रतिदिन पूजा-अर्चना करें।
उचित समय आने पर इस तेज पुञ्ज से एक पुत्र रत्न जन्म लेगा तथा आपके समस्त दुःख एवं कष्टों का निवारण करेगा। देवी अदिति तथा प्रजापति कश्यप उस पुञ्ज का प्रतिदिन नियमपूर्वक पूजा करने लगे। समय आने पर उस तेज पुञ्ज के भीतर से एक पुत्र उत्पन्न हुआ। प्रजापति कश्यप द्वारा उस पुत्र का नाम विवस्वान् निर्धारित किया गया। देवासुर संग्राम के समय समस्त असुर विवस्वान् का तेज सहन करने में स्वयं को असक्षम होता देख रणभूमि से भाग खड़े गये।
महर्षि कश्यप एवं देवी अदिति भगवान सूर्य के माता पिता हैं। हिन्दु धर्म ग्रन्थों में सूर्यदेव की देवी संज्ञा एवं देवी छाया नामक दो धर्म पत्नियों का वर्णन प्राप्त होता है। इन्द्र सूर्यदेव के ज्येष्ठ भ्राता हैं। भगवान सूर्य के दस अनुज भ्राता हैं, जिनका नाम क्रमशः धाता, पूषा, अर्यमा, त्वष्ट्र, भग, अंशुमान, मित्र, वरुण, पर्जन्य तथा वामन है। सूर्यदेव की प्रमुख सन्तानों के रूप में शनि, यमराज, तथा यमुना सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं, किन्तु इनके अतिरिक्त वैवस्वत मनु, अश्विनी कुमार, रेवन्त, तपती, सवर्णि मनु, सुग्रीव, कर्ण तथा भद्रा आदि सूर्यदेव की ही सन्तानें हैं।
भगवान सूर्य को चतुर्भुज रूप में रक्त एवं पीत वर्ण वाला दर्शाया जाता है। वह अपनी तीन भुजाओं में शँख, चक्र, पद्म धारण करते हैं तथा उनका चतुर्थ हाथ वरद मुद्रा में रहता है। सूर्यदेव से सम्बन्धित विभिन्न चित्रों एवं मूर्तियों में उन्हें एक रथ पर आरूढ़ दर्शाया जाता है, भगवान सूर्य के रथ के सारथि अरुण हैं तथा इस रथ को सप्त अश्व खींचते हैं। यह दिव्य रथ एक मुहूर्त (दो घड़ी) में चौंतीस लाख आठ सौ योजन की यात्रा करता है। सूर्यास्त्र, सुदर्शन चक्र, गदा, कमल, तथा त्रिशूल आदि सूर्यदेव के कुछ प्रमुख आयुधों में से हैं।
हिन्दु वैदिक ज्योतिष में सूर्य को पुरुष ग्रह के रूप में वर्णित किया गया है तथा सूर्य की जाति - क्षत्रिय, धातु - ताम्बा, रत्न - माणिक्य, तथा उपरत्न के रूप में तामड़ा, महसूरी, लालड़ी आदि का वर्णन प्राप्त होता है। सूर्य ग्रह के प्रत्यधिदेवता भगवान शिव हैं। सूर्य को वैदिक ऋतुओं के अनुसार ग्रीष्म ऋतु से सम्बन्धित माना जाता है। मन्दिर, महल, वन, किला तथा नदी का किनारा सूर्य का निवास स्थान है। सूर्य मानव शरीर में नेत्र, मुखमण्डल, उदर, तथा हृदय का प्रतिधिनित्व करते हैं। ज्योतिष के अनुसार सूर्य की महादशा 6 वर्षीय होती है।
ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को आत्मा का कारक कहा गया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, सूर्य कृतिका, उत्तराषाढा तथा उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के स्वामी हैं। सूर्यदेव राशि चक्र में पाँचवीं सिंह राशि के स्वामी हैं। जन्म कुण्डली में सूर्य पिता का प्रतिधिनित्व करता है तथा लकड़ी, स्वर्ण, ताम्बा तथा आभूषण आदि का कारक सूर्य ही है। सूर्य ग्रह गेंहू, घी, पत्थर, दवा तथा माणिक्य आदि पदार्थो को प्रभावित करता है। कुण्डली में सूर्य का नकारात्मक प्रभाव होने पर नेत्र, सिरदर्द, रक्तचाप, गँजापन, ज्वर, तथा पित्त सम्बन्धी रोग उत्पन्न होते हैं।
सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार, हथेली में अनामिका उँगली के मूल स्थान को सूर्य पर्वत कहा जाता है। सूर्य पर्वत पर बनी रेखाओं को सूर्य रेखा कहते हैं। इन रेखाओं को देख कर राजकीय एवं वैवाहिक जीवन से सम्बन्धी फल विचार किया जाता है।
अङ्कशास्त्र के अनुसार, सूर्य ग्रह अङ्क 1 का प्रतिधिनित्व करता है। यदि किसी जातक का जन्म किसी माह की 1, 10, 19 तथा 28 दिनाँक पर होता है, तो उसका मूलाङ्क 1 तथा मूलाङ्क स्वामी सूर्य होगा।
सामान्य मन्त्र-
ॐ घृणि सूर्याय नमः।
बीज मन्त्र-
ॐ ह्राँ ह्रीँ ह्रौँ सः सूर्याय नमः।
सूर्य गायत्री मन्त्र-
ॐ आदित्याय विद्महे, प्रभाकराय धीमहि, तन्नः सूर्यः प्रचोदयात्॥
प्रातः सूर्य स्मरण मन्त्र-
प्रातः स्मरामि खलु तत्सवितुर्वरेण्यं
रूपं हि मंडलमृचोऽथ तनुर्यजूंषि।
सामानि यस्य किरणाः प्रभवादिहेतुं
ब्रह्माहरात्मकमलक्ष्यमचिन्त्यरूपम्॥