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-1997 अगस्त्य तारा उदय का दिन और अर्घ्य समय लँकेस्टर, California, संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए

DeepakDeepak

-1997 अगस्त्य अर्घ्य

लँकेस्टर, संयुक्त राज्य अमेरिका
अगस्त्य अर्घ्य
1वाँ
मार्च -1997
Thursday / गुरुवार
अगस्त्य ऋषि
Agastya Muni

अगस्त्य अर्घ्य मुहूर्त समय

अगस्त्य अर्घ्य बृहस्पतिवार, मार्च 1, -1997 को
अगस्त्य अर्घ्य समय - 04:19 पी एम, फरवरी 28 से 06:30 ए एम
अवधि - 14 घण्टे 12 मिनट्स
अगस्त्य तारा उदय क्षण - 04:19 पी एम, फरवरी 28
अगस्त्य तारा अस्त क्षण - 07:18 पी एम, मार्च 21

टिप्पणी: सभी समय १२-घण्टा प्रारूप में लँकेस्टर, संयुक्त राज्य अमेरिका के स्थानीय समय और डी.एस.टी समायोजित (यदि मान्य है) के साथ दर्शाये गए हैं।
आधी रात के बाद के समय जो आगामि दिन के समय को दर्शाते हैं, आगामि दिन से प्रत्यय कर दर्शाये गए हैं। पञ्चाङ्ग में दिन सूर्योदय से शुरू होता है और पूर्व दिन सूर्योदय के साथ ही समाप्त हो जाता है।

अगस्त्य अर्घ्य -1997

ऋषि अगस्त्य एक वैदिक ऋषि हैं। उनका उल्लेख रामायण और महाभारत में मिलता है।

भविष्यपुराण में कहा है कि - हे पाण्डव, इस तरह सात साल तक इस क्रम से अर्घ्य को देकर ब्राह्मण चतुर्वेदी और क्षत्रिय पृथिवीपति होता है। वैश्य तो धान्य का अधिपति एवं शुद्र धनवान होता है। जब तक आयु रहती है तब तक जो अर्घ्य देता है वह परब्रह्म को जाता है। सम्पूर्ण अर्घ्य विधि देखने हेतु अगस्त्य अर्घ्य विधि पर जायें।

प्रार्थना मन्त्रः -

इस मन्त्र को पढते हुये अगस्त्यमुनि के लिये प्रार्थना करें -

काशपुष्पप्रतीकाश वह्निमारुतसम्भव।
मित्रावरुणयोः पुत्र कुम्भयोने नमोऽस्तु ते॥
विन्ध्यवृद्धिश्रयकर मेघतोयविषापह।
रत्नवल्लभ देवेश लङ्कावास नमोऽस्तु ते॥
वातापी भक्षितो येन समुद्रः शोषितः पुरा।
लोपामुद्रापतिः श्रीमान् योऽसौ तस्मै नमो नमः॥
येनोदितेन पापानि विलयं यान्ति व्याधयः।
तस्मै नमोऽस्त्वगस्त्याय सशिष्याय च पुत्रिणे॥

मन्त्र अर्थ - हे काशपुष्पप्रतीकाश, बह्निमारुतसम्भव, मित्रावरुण के पुत्र अगस्त्य को नमस्कार है। हे विन्ध्यवृद्धिश्रयकर, (विन्ध्याचल पर्वत की वृद्ध का क्षय करने वाले) रत्नवल्लभ, (रत्नो से प्रेम करने बाले), मेघतोयविपापह, (मेघ के जल में विष को हटाने बाले), हे देवेश, हे लंकावास (लंका में निवास करने वाले), आपको नमस्कार है। जिसने वातापी (दानव) का भक्षण किया, पूर्वसमय में जिसने समुद्र का शोषण किया और जो लोपमुद्रा के पति है, उसके लिये नमस्कार है। जिसके उदय से सारे पाप और व्याधियाँ विलय को प्राप्त हो जाती है। शिष्य और पुत्र सहित उस अगस्त्य के लिये नमस्कार है।

अर्घ्य मन्त्रः -

इस मन्त्र को पढते हुये अगस्त्यमुनि के लिये अर्घ्य दें -

अगस्त्यः खनमानः खनित्रैः प्रजामपत्यं बलमिच्छमानः।
उभौ वर्णावृषिरुग्रः पुपोष सत्या देवेष्वाशिषो जगाम॥

विसर्जन मन्त्रः -

इस मन्त्र को पढते हुये अगस्त्यमुनि का विसर्जन करें -

राजपुत्रि महाभागे ऋषिपत्नि वरानने॥
लोपामुद्रे नमस्तुभ्यमर्घ्य मे प्रतिगृह्यताम्।

मन्त्र अर्थ - हे राज-पुत्रि, हे महाभागे, हे ऋषिपत्नि, हे वरानने, हे लोपामुद्रे, आपको नमस्कार है। मेरे अर्घ्य को ग्रहण कीजिये।

दानमन्त्रः -

अगस्त्यः सप्तजन्माघं नाशयित्वावयोरयम्।
अतुलं विमलं सौख्यं प्रयच्छ त्वं महामुने॥

मन्त्र अर्थ - दान का मन्त्र यह है कि अगस्त्य जी, सात जन्म के पापों को नाशकर, हे महामुने, आप हम दोनों को अतुल निर्मल सुख को दीजिये।

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