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इष्टकाल - वैदिक समय गणना | वैदिक हिन्दु कालगणना

DeepakDeepak

2026 वैदिक समय

Location
वैदिक समय
34:44:08
घटी : पल : विपल
सूर्योदयSunrise00:00:00
सूर्यास्तSunset30:00:00
आषाढ़, शुक्ल नवमी, 2083 विक्रम सम्वत
बुधवार
ग्रेगोरियन समय
21:35:56
घण्टा : मिनट : सेकण्ड
सूर्योदयSunrise05:55:31
सूर्यास्तSunset20:02:10
बुधवार, जुलाई 22, 2026
टिप्पणी: सभी समय लँकेस्टर, संयुक्त राज्य अमेरिका के स्थानीय समय और डी.एस.टी समायोजित (यदि मान्य है) के साथ दर्शाये गए हैं।घटी, पल और विपल समय की वैदिक इकाइयाँ हैं जो कि घण्टे, मिनट और सेकण्ड के समान हैं।

इष्टकाल - वैदिक समय गणना

हिन्दु पञ्चाङ्ग के अनुसार सूर्योदय से अगले दिन के सूर्योदय तक की समयावधि को एक दिवस माना जाता है। अतः सूर्योदय से दिवस का आरम्भ होता है तथा अगले दिन सूर्योदय पर उसका अन्त होता है।

अतः एक पूर्ण दिवस में 60 घटी होती हैं। घटी, पल तथा विपल को आधुनिक ग्रेगोरियन समय प्रारूप के अनुसार क्रमशः घण्टा, मिनट तथा सेकण्ड के समानान्तर माना जा सकता है।

  • एक पूर्ण दिवस = 60 घटी
  • 1 घटी = 60 पल
  • 1 पल = 60 विपल

इसी प्रकार 1 घटी में 60 पल होते हैं तथा 1 पल में 60 विपल होते हैं। आधुनिक समय प्रणाली के अनुसार 1 घटी में लगभग 24 मिनट होते हैं। सामान्यतः लोग एक घटी की समय अवधि को स्थायी समझते हैं तथा एक घण्टे को 2.5 (ढाई) घटी के समान मान लेते हैं, किन्तु यह उचित नहीं है। घटी की समयावधि स्थान के आधार पर भिन्न होती है। अतः निश्चित घटीकाल ज्ञात करने हेतु स्थान आधारित पञ्चाङ्ग जैसे द्रिक पञ्चाङ्ग का अनुसरण करना चाहिये।

वैदिक समय की गणना दो प्रकार से की जाती है -

1. 60-घटी घड़ी - वैदिक घड़ी के पहले प्रकार में, सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक की अवधि को 60 भागों में विभाजित किया जाता है और प्रत्येक भाग को घटी कहा जाता है। इस समय-गणना में सूर्योदय सदैव 00:00:00 पर होता है, जबकि सूर्यास्त का समय निश्चित नहीं होता और उसका समय देखने के लिये प्रतिदिन पञ्चाङ्ग का अवलोकन किया जाता है। चूँकि दिन के इस विभाजन में दिनमान और रात्रिमान की अवधि को नहीं माना जाता, इसीलिये सूर्यास्त का समय प्रतिदिन बदलता रहता है।

हालाँकि, इस प्रकार का समय कुण्डली निर्माण के लिये व्यक्ति के जन्म समय को निर्धारित करने के लिये उपयोगी है और मुख्यतः ज्योतिषियों द्वारा अपनाया जाता है। वैदिक समय की इस गणना को प्रायः इष्टकाल कहा जाता है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि 60 घटी की अवधि सदैव 24 घण्टों के बराबर नहीं होती, बल्कि वर्ष के विभिन्न दिनों में इसमें थोड़ा-बहुत अन्तर आता रहता है। अतः कोई भी वैदिक घड़ी जो 24 घण्टों को 60 घटी में विभाजित करके वैदिक घड़ी बनाती है, उसमें अहोरात्रि की अवधि को 24 घण्टे स्थिर मान लेने के कारण कुछ हद तक विकृति आ जाती है।

2. 30-घटी घड़ी - वैदिक घड़ी के दूसरे प्रकार में, सूर्योदय से सूर्यास्त तक की अवधि को 30 भागों में तथा सूर्यास्त से अगले सूर्योदय तक की अवधि को भी 30 भागों में विभाजित किया जाता है। इस समय-गणना में सूर्योदय सदैव 00:00:00 पर और सूर्यास्त सदैव 30:00:00 पर होता है। अहोरात्रि का यह विभाजन मुहूर्त-गणना के लिये उपयुक्त है।

पञ्चाङ्ग में दिनमान को 30 घटी में विभाजित किया जाता है। सूर्योदय से प्रथम 6 घटी को प्रातः काल, उसके पश्चात की 6 घटी को सङ्गव काल, उसके पश्चात की 6 घटी को मध्याह्न काल, उसके पश्चात की 6 घटी को अपराह्न काल तथा सूर्यास्त तक की अन्तिम 6 घटी को सायाह्न काल कहा जाता है। वैदिक समय-गणना का यह विभाजन हिन्दु धार्मिक कर्मकाण्डों के दैनिक समय निर्धारण में सहायक होता है।

पञ्चाङ्ग में ब्रह्म मुहूर्त, प्रातः सन्ध्या, सायाह्न सन्ध्या, प्रदोष काल, पारण समय आदि वैदिक घड़ी से निर्धारित होते हैं, जिसमें दिनमान और रात्रिमान की गणना अलग-अलग करके अहोरात्रि की 60 घटी निर्धारित की जाती हैं।

द्रिक पञ्चाङ्ग दोनों प्रकार की वैदिक घड़ियों का समर्थन करता है और द्रिक पञ्चाङ्ग द्वारा उपलब्ध करायी गयी सेटिंग्स की सहायता से उपयुक्त वैदिक घड़ी का चयन किया जा सकता है।

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