



देवी गायत्री हिन्दु धर्म में पूजे जाने वाले प्रमुख देवी-देवताओं में से एक हैं। देवी गायत्री को वेद माता के नाम से भी जाना जाता है। देवी गायत्री को देवी सरस्वती का ही एक रूप माना जाता है तथा वे भगवान ब्रह्मा की अर्धाङ्गिनी हैं।

देवी गायत्री के जन्मदिवस को गायत्री जयन्ती के रूप में मनाया जाता है। धर्मग्रन्थों में देवी गायत्री को देवताओं की माता के रूप में भी वर्णित किया गया है। आधुनिक भारत में, श्रावण पूर्णिमा की गायत्री जयन्ती का दिन संस्कृत दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।

ज्येष्ठ चन्द्र माह के समय शुक्ल पक्ष की एकादशी को गायत्री जयन्ती का पर्व मनाया जाता है। मतान्तर के कारण श्रावण पूर्णिमा पर भी गायत्री जयन्ती मनायी जाती है। देवी गायत्री को देवी सरस्वती, देवी पार्वती एवं देवी लक्ष्मी का अवतार भी माना जाता है।

गायत्री जापम दिवस उपाकर्म दिवस से सम्बन्धित है तथा यह श्रावणी उपाकर्म के अगले दिन मनाया जाता है। इस अवसर पर वेदों का अध्ययन करने वाले युवा विद्यार्थी, उपाकर्म अनुष्ठान के पश्चात् ही वेदाध्ययन आरम्भ करते हैं।

हिन्दु धर्म में गायत्री मन्त्र को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना जाता है। गायत्री मन्त्र का जाप सन्ध्या उपासना के लिये भी आवश्यक होता है। शास्त्रों में गायत्री मन्त्र को ब्रह्म के तेज के रूप में वर्णित किया गया है। उपनयन संस्कार में भी गायत्री दीक्षा दी जाती है।

जयति जय गायत्री माता, जयति जय गायत्री माता। सत् मारग पर हमें चलाओ, जो है सुखदाता॥ उक्त आरती हिन्दी बोल एवं वीडियो सहित प्रदान की गयी है। देवी गायत्री को समर्पित यह सर्वाधिक प्रचलित आरतियों में से एक है। देवी गायत्री को वेद माता अर्थात् सभी वेदों की जननी माना जाता है।

भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी। गायत्री नित कलिमल दहनी॥ अक्षर चौविस परम पुनीता। इनमें बसें शास्त्र श्रुति गीता॥ यह चालीसा देवी गायत्री को समर्पित एक अत्यन्त मधुर स्तुति है जिसे गायत्री चालीसा के रूप में जाना जाता है। चालीसा चौपाइयों से युक्त स्तुति को चालीसा कहा जाता है।




