धर्मसिन्धु में प्राप्त वर्णन के अनुसार यदि पूर्व दिन में एकादशी विद्धा द्वादशी हो तथा पर दिन में अनुवर्तित एवं दोनों दिन में श्रवण नक्षत्र का योग हो, तो इस स्थिति में पूर्व दिन में एकादशी, द्वादशी तथा श्रवण नक्षत्र इन तीनों के संयोग से विष्णुशृंखल योग से पूर्वविद्धा में उपवास करना चाहिये। एकादशी में श्रवण का योग नहीं होने पर भी श्रवण नक्षत्र से युक्त द्वादशी के स्पर्श मात्र करने से ही विष्णुशृंखल योग माना जाता है।
सरल शब्दों में कहें तो सूर्योदय से रात्रि के प्रथम प्रहर के मध्य द्वादशी, एकादशी एवं श्रवण नक्षत्र का संयोग होने पर विष्णुशृंखल योग निर्मित होता है। यह योग अत्यन्त ही दुर्लभ एवं पुण्यशाली माना जाता है। विष्णुशृंखल योग के दिन एकादशी एवं श्रवण द्वादशी दोनों व्रतों के उपवास एक तन्त्र से एकादशी तिथि में करके द्वादशी में विधिवत् पारण करना चाहिये।
पुरुषार्थ चिन्तामणि में प्राप्त वर्णन के अनुसार यह योग दिन में ही ग्रहण करना चाहिये तथा रात्रि में नहीं। निर्णयसिन्धु के अनुसार रात्रि में भी अर्धरात्रि के उपरान्त यह योग ग्रहण करना चाहिये। अन्य विद्वानों के मतानुसार रात्रि के प्रथम प्रहर पर्यन्त दोनों तिथियों में श्रवण नक्षत्र का योग होने पर स्वीकार करना चाहिये तथा दूसरे प्रहर आदि में ग्रहण नहीं करना चाहिये।
इस व्रत के विषय में शुक्ल पक्ष अथवा कृष्ण पक्ष का स्पष्टीकरण नहीं किया है। अतः द्रिक पञ्चाङ्ग दोनों पक्षों के लिये विष्णुशृंखल योग द्वादशी के दिन सूचिबद्ध करता है।