
श्राद्ध हिन्दुओं द्वारा किये जाने वाले सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अनुष्ठानों में से एक है। प्रत्येक वर्ष में लगभग 96 दिन ऐसे होते हैं जिन्हें श्राद्ध कर्म करने हेतु उत्तम माना जाता है। श्राद्ध के विषय में भक्तों के मन में नाना प्रकार के प्रश्न उठते रहते हैं। जैसे कि, श्राद्ध क्या है? श्राद्ध न करने से क्या हानि होती है? पितरों को श्राद्ध की प्राप्ति कैसे होती है? श्राद्ध कितने प्रकार के होते हैं? कन्या का श्राद्ध किस प्रकार किया जाता है? तथा बालकों का श्राद्ध कैसे किया जाता है? आदि। यहाँ श्राद्ध कर्म से सम्बन्धित ऐसे ही विभिन्न प्रकार के प्रश्नों के उत्तर प्रदान किये गये हैं, जिनके माध्यम से श्राद्ध के विषय में होने वाली विभिन्न जिज्ञासाओं का समाधान किया गया है।
उत्तर: हिन्दु धर्मग्रन्थों में प्राप्त वर्णन के अनुसार पितरों के निमित्त श्रद्धापूर्वक किये गये कर्म को श्राद्ध कहते हैं। श्रद्धा से श्राद्ध शब्द की निष्पत्ति होती है। श्राद्ध को पितृयज्ञ भी कहा गया है, जिसका उल्लेख मनुस्मृति आदि धर्मग्रन्थों में भी प्राप्त होता है। महर्षि बृहस्पति एवं महर्षि पुलस्त्य के अनुसार - "जिस कर्म विशेष में दुग्ध, घृत तथा मधु से युक्त भली प्रकार पकाये हुये उत्तम व्यञ्जन को श्रद्धापूर्वक पितृगण के निमित्त ब्राह्मण को प्रदान किया जाता है, उसे श्राद्ध कहते हैं।"
उत्तर: गरुड़पुराण के अनुसार, मृत्यु के तेरह दिवस पश्चात्, आत्मा यमपुरी के लिये अपनी यात्रा आरम्भ करती है तथा वहाँ पहुँचने में उसे सत्रह दिवस का समय लगता है। आत्मा यमपुरी में ग्यारह माह तक यात्रा करती है तथा बारहवें माह में ही यमराज के दरबार में पहुँचती है। ग्यारह महीने की अवधि के समय उसे भोजन एवं जल नहीं मिलता है। मान्यताओं के अनुसार, पुत्र एवं परिवार के सदस्यों द्वारा किया गया पिण्डदान एवं तर्पण, यमराज के दरबार तक पहुँचने तक की यात्रा में आत्मा की क्षुधा एवं तृष्णा को शान्त करता है। इसीलिये, मृत्यु के उपरान्त प्रथम वर्ष के श्राद्ध कर्म को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
उत्तर: हिन्दु मान्यताओं के अनुसार मृत व्यक्ति अपने स्थूल शरीर का त्याग कर सूक्ष्म शरीर धारण कर आगे की यात्रा करता है, जहाँ अन्न-जल ले जाना भी सम्भव नहीं है। अतः उस मृतात्मा के सम्बन्धी आदि श्राद्ध कर्म द्वारा जो पदार्थ प्रदान करते हैं वही उसे प्राप्त होता है। यदि सम्बन्धी श्राद्ध नहीं करते हैं तो मृत जीव को क्षुधा एवं तृष्णा से अत्यन्त भयङ्कर कष्ट होता है। अतः श्राद्ध न करने वाले मनुष्य जीवन में पग-पग पर नाना प्रकार के दुःख एवं कष्ट सहते हैं। श्राद्ध न करने के कारण मृत पितर विवश होकर श्राद्ध न करने वाले सम्बन्धियों का रक्त चूसने लगते हैं। तदुपरान्त अभिशप्त परिवार आजीवन कष्ट में रहते हैं। उस परिवार में पुत्र उत्पन्न नहीं होता तथा मृत्योपरान्त नर्कगामी होता है। विभिन्न उपनिषदों में कहा गया है, देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्।, अर्थात् देवता तथा पितरों के कार्यों में मनुष्य को किञ्चित प्रमाद नहीं करना चाहिये, क्योंकि प्रमाद से हानि होती है।
उत्तर: हिन्दु धर्म में किसी व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात् पिण्डदान करना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना जाता है। सर्वप्रथम व्यक्ति की शवयात्रा में छः पिण्ड दिये जाते हैं, जिनके द्वारा भूमि के अधिष्ठातृ देवता प्रसन्न होते हैं तथा भूत, पिशाच एवं प्रेत बाधा आदि से मुक्ति प्राप्त होती है। इसी प्रकार दशगात्र में दश पिण्ड दिये जाते हैं, जिसके द्वारा मृत जीव को सूक्ष्म देह की प्राप्ति होती है। यहाँ से आरम्भ महायात्रा के मार्ग में जीव को अन्न-जल की आवश्यकता होती है, जो उसे उत्तमषोडशी में दिये गये पिण्डदान से प्राप्त होता है।
उत्तर: अनेक लोगों के मन में यह जिज्ञासा उठती है कि श्राद्ध में अर्पण किये गये अन्न, वस्त्र आदि पितरों को कैसे प्राप्त होता है? शास्त्रों के अनुसार नाम एवं गोत्र आदि के माध्यम से समस्त सामग्री पूर्वजों के समक्ष पहुँच जाती है। विश्वदेव एवं अग्निष्वात्त आदि उत्तम पितरों से जीवन सुखमय हो जाता है। यदि जीवात्मा देवयोनि में गया हो तो श्राद्ध में अर्पित अन्न उसे अमृत के रूप में प्राप्त होता है। मनुष्य योनि में अन्न के रूप में तथा पशु योनि में तृण के रूप में, नागादि योनियों में वायु रूप से, यक्ष योनि में पान रूप में तथा अन्य योनियों में भी विभिन्न प्रकार से श्राद्धीय वस्तु की प्राप्ति होती है। जीव भले ही सैकड़ों योनियों के पार पहुँच गया हो किन्तु नाम, गोत्र, श्रद्धा तथा सङ्कल्प पूर्वक किये गये श्राद्ध एवं मन्त्रोच्चारण द्वारा अर्पित पदार्थ उस जीव को प्राप्त हो ही जाता है।
उत्तर: धर्मग्रन्थों में श्राद्ध के अनेक प्रकार अथवा भेद वर्णित किये गये हैं, उनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण श्राद्ध निम्नलिखित हैं। मत्स्यपुराण में श्राद्ध के तीन भेद वर्णित किये गये हैं, नित्यं नैमित्तिकं काम्यं त्रिविधं श्राद्धमुच्यते।, अर्थात् श्राद्ध तीन प्रकार के होते हैं, नित्य, नैमित्तिक तथा त्रिविध श्राद्ध।
यमस्मृति में श्राद्ध के पाँच भेद वर्णित किये गये हैं, नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि तथा पार्वण श्राद्ध। विश्वामित्रस्मृति तथा भविष्यपुराण में नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि, पार्वण, सपिण्डन, गोष्ठी, शुद्ध्यर्थ, कर्मांग, दैविक, यात्रार्थ, तथा पुष्ट्यर्थ आदि बारह प्रकार के श्राद्ध वर्णित किये गये हैं।
उत्तर: गरुड़पुराण आदि धर्मग्रन्थों में प्राप्त वर्णन के अनुसार दो वर्ष से कम आयु के बालक के लिये श्राद्ध एवं जलाञ्जलि आदि क्रियायें करना आवश्यक नहीं है। दो वर्ष से छः वर्ष की आयु के बालक के लिये मात्र श्राद्ध की पूर्व-क्रिया, अर्थात् मलिन-षोडशी तक की क्रिया करनी चाहिये। तदुपरान्त एकादशाह तथा द्वादशाह क्रिया आवश्यक नहीं है। छः वर्ष से अधिक आयु होने पर श्राद्ध की सम्पूर्ण क्रिया, अतः मलिन-षोडशी, एकादशाह, द्वादशाह तथा सपिण्डन आदि क्रियायें करनी चाहिये।
उत्तर: विभिन्न शास्त्रों में प्राप्त वर्णन के अनुसार दो वर्ष से दश वर्ष तक की कन्या के लिये श्राद्ध की पूर्वक्रिया, अर्थात् मलिन-षोडशी तक की क्रिया करनी चाहिये। यदि कन्या का विवाह हो गया हो अथवा उसकी आयु दस वर्ष से अधिक हो, तो श्राद्ध की सम्पूर्ण क्रियायें - मलिन-षोडशी, एकादशाह, द्वादशाह तथा सपिण्डन आदि विधिपूर्वक करनी चाहिये।
उत्तर: धर्मग्रन्थों के अनुसार दन्तधावन, तेल-मर्दन, औषधि, ताम्बूल एवं परान्न का सेवन, पुनः भोजन, यात्रा, अति-परिश्रम तथा मैथुन आदि कर्म श्राद्धकर्ता के लिये निषिद्ध माने जाते हैं। श्राद्ध कर्म में लोह पात्रों का उपयोग नहीं करना चाहिये। कस्तूरी, रक्त-चन्दन, गोरोचन आदि गन्ध का प्रयोग श्राद्ध में वर्जित है। इनके स्थान पर चन्दन, श्रीखण्ड, खस, कर्पूर, तथा श्वेत चन्दन की गन्ध पितृ कार्य हेतु उत्तम मानी जाती है। श्राद्ध में कदम्ब, केवड़ा, मौलश्री, बेलपत्र, करवीर, गहरे रङ्ग वाले, तीव्र गन्ध वाले अथवा गन्ध रहित पुष्पों का प्रयोग नहीं करना चाहिये।
उत्तर: श्रीमद्भागवत के अनुसार मनुष्य को न मांस भक्षण करना चाहिये तथा न ही श्राद्ध में इसका उपयोग करना चाहिये। सात्विक अन्न एवं फल आदि द्वारा श्राद्ध अनुष्ठान करने से ही पितृ तृप्त होते हैं। जिस अन्न में बाल गिर गया हो, घुन आदि कीड़े पड़ गये हों, कुत्ते की दृष्टि पड़ गयी हो, बासे तथा दुर्गन्धित अन्न का प्रयोग श्राद्ध में कदापि नहीं करना चाहिये। इसके अतिरिक्त जिस अन्न पर अपने पहने हुये वस्त्र की हवा लग जाये, वह भी श्राद्ध में वर्जित माना गया है। चना, मसूर, अरहर, प्याज, लहसुन, गाजर, कुम्हड़ा, गोल लौकी, बैंगन, शलजम, सिंघाड़ा, जामुन, कैथ, महुआ, अलसी, पिप्पली, सुपारी, कुलथी, हींग, जीरा, काला नमक तथा पीली सरसों आदि भी श्राद्ध कर्म में पूर्णतः निषिद्ध होते हैं।
उत्तर: श्राद्ध में केवल गाय के दुग्ध, दही एवं घृत का उपयोग ही करना चाहिये। जौ, धान, तिल, गेहूँ, मूँग, साँवाँ, कँगनी, सरसों का तेल तथा तिन्नी का चावल आदि द्वारा पितरों को तृप्त करना चाहिये। आम, अमड़ा, बेल, अनार, बिजौरा, पुराना आँवला, खीर, नारियल, फालसा, नारंगी, खजूर, अंगूर, नीलकैथ, परवल, चिरौंजी, बेर, जंगली बेर, इन्द्रजौ तथा भतुआ आदि का प्रयोग भी श्राद्ध में करना चाहिये। जौ, कँगनी, मूँग, गेहूँ, धान, तिल, मटर, कचनार तथा सरसों का प्रयोग श्राद्ध में उत्तम माना जाता है।