राखी थाली में सम्मिलित की जाने वाली वस्तुयें अथवा राखी अनुष्ठान के लिये आवश्यक वस्तुयें निम्नलिखित सूचि में वर्णित की गयी हैं।

एक थाली - रक्षाबन्धन के समय चाँदी की थाली का प्रयोग सर्वाधिक लोकप्रिय है तथा अधिकांश ऑनलाइन उपहार विक्रेता अन्य अत्यधिक अलङ्कृत थाली के साथ चाँदी की थाली चुनने का विकल्प देते हैं। सामान्यतः पूजा की थाली के केन्द्र में ॐ एवं स्वास्तिक आदि हिन्दु प्रतीक चिह्न अङ्कित किये जाते हैं।
घर पर, घर की रसोई से थाली पर नवीन सूती वस्त्र अथवा केले का पत्ता बिछाकर तदर्थ पूजा थाली अर्थात् अस्थायी पूजा की थाली निर्मित की जा सकती है। थाली के केन्द्र में स्वास्तिक बनाया जा सकता है।
पूजा के चावल - पूजा के चावलों को अक्षत कहा जाता है, जो बिना टूटे श्वेत चावल होते हैं। चावल को बट्टी अथवा छोटी कटोरी में रखा जा सकता है। पूजा की थाली में चावल का एक छोटा ढेर भी देखने में अच्छा लगता है। पूजा के समय मस्तक पर किये जाने वाले तिलक के ऊपर अक्षत चावल लगाये जाते हैं।
पूजा रोली - पूजा रोली, अर्थात लाल रंग के महीन पूजा चूर्ण को भी चावल के साथ एक बट्टी या छोटे कटोरे में रखा जाता है। चावल के बगल में रोली का एक छोटा ढेर भी पूजा की थाली में अच्छा लगता है। मस्तक पर तिलक लगाने के लिये रोली का उपयोग किया जाता है। रोली एक जैविक पाउडर है, जिसका उपयोग सदियों से पूजा में होता रहा है तथा रक्षा बन्धन अनुष्ठान में सर्वप्रथम मस्तक पर रोली का तिलक किया जाता है। रोली का निर्माण हल्दी एवं चूना मिश्रित करके किया जाता है तथा इसे कुमकुम भी कहा जाता है।
एक नारियल - पारम्परिक रूप से बिना छिला एवं टूटा हुआ नारियल, पूजा में प्रयुक्त किया जाता है तथा बहनें पूजा के समय अपने भाइयों को इसे भेंट करती हैं। ऑनलाइन उपलब्ध अधिकांश पूजा थाली में एक सुसज्जित नारियल सम्मिलित होता है। पूजा थाली में साबुत अर्थात् बिना टूटी सुपारी का भी उपयोग किया जा सकता है।
एक छोटा कलश - स्वच्छ जल से भरा हुआ एक छोटा कलश भी पूजा थाली में रखा जाता है। हिन्दु धर्म में कलश को अत्यन्त पवित्र माना जाता है। जल से भरा कलश समृद्धि, प्रचुरता एवं पूर्णता का प्रतीक माना जाता है। स्वस्तिक रचना एवं रक्षा तिलक करने के लिये रोली में कलश के जल को मिलाया जाता है।
रक्षा पोटली - हालाँकि, यह लोकप्रिय नहीं है, किन्तु एक छोटी रक्षा पोटली होती है, जिसे कलाई पर बाँधा जाना चाहिये। धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार, भगवान इन्द्र की कलाई पर रक्षा पोटली को बाँधा गया था। रक्षा बन्धन के लिये उपहार हेतु उपलब्ध अनेक थालियों में पोटली भी सम्मिलित होती है, किन्तु यह छोटे नारियल से भरी होती है।
धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार, रक्षा पोटली को चावल, श्वेत सरसों तथा स्वर्ण या स्वर्ण के धागे से भरा जाना चाहिये। क्योंकि पारम्परिक रक्षा पोटली अब प्रचलन में नहीं है, इसीलिये घर पर निर्मित एक छोटी सी पोटली को बाजार में उपलब्ध डिजाइनर राखी के साथ बाँधा जा सकता है।
राखी - राखी, रक्षा पोटली का आसान विकल्प है। सम संख्या में राखी को शुभ माना जाता है, इसीलिये पूजा की थाली में जोड़ी में राखी होनी चाहिये। अनेक उपहार थाली में दो राखी होती हैं, एक भैया के लिये और दूसरी भाभी के लिये।
उत्तर भारत में, पूजा की थाली में कुछ अतिरिक्त सोना राखी भी रखी जाती हैं। सोना राखी के मध्य में एक रंगीन कपास का गोल टुकड़ा होता है, जिसके कारण राखी पूजा के समय इसे सरलता से देवी-देवताओं पर चिपकाया जा सकता है।
राखी मिष्टान्न - घेवर, पूजा की थाली का अति आवश्यक मिष्टान्न है, जो राजस्थान एवं उत्तर प्रदेश जैसे उत्तर भारतीय राज्यों में अत्यन्त लोकप्रिय है। यदि घेवर उपलब्ध न हो, तो पूजा की थाली में कोई अन्य मिष्टान्न भी सम्मिलित किया जा सकता है। तिलक करने एवं रक्षा सूत्र बाँधने के पश्चात् भाइयों को मिठाई दी जाती है।