
टिप्पणी: सभी समय १२-घण्टा प्रारूप में लँकेस्टर, संयुक्त राज्य अमेरिका के स्थानीय समय और डी.एस.टी समायोजित (यदि मान्य है) के साथ दर्शाये गए हैं।
आधी रात के बाद के समय जो आगामि दिन के समय को दर्शाते हैं, आगामि दिन से प्रत्यय कर दर्शाये गए हैं। पञ्चाङ्ग में दिन सूर्योदय से शुरू होता है और पूर्व दिन सूर्योदय के साथ ही समाप्त हो जाता है।
हिन्दु पञ्चाङ्ग के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को पराशर ऋषि जयन्ती मनायी जाती है। ऋषि पराशर के अवतरण दिवस की वर्षगाँठ के रूप में पराशर जयन्ती मनायी जाती है। इस दिन श्रद्धालुजन ऋषि पराशर के निमित्त व्रत, पूजन एवं हवन आदि कर्म करते हैं। धर्मग्रन्थों में प्राप्त वर्णन के अनुसार ऋषि पराशर छब्बीसवें द्वापर के व्यास थे।
महर्षि पराशर के पिता शक्ति मुनि थे तथा उनकी माता देवी अदृश्यन्ती थीं, जो उतथ्य मुनि की पुत्री थीं। महाभारत आदि दिव्य ग्रन्थों की रचना करने वाले महर्षि वेदव्यास ऋषि पराशर के ही पुत्र हैं, जिनका जन्म ऋषि पराशर एवं देवी सत्यवती के संयोग से हुआ था।
ऋषि पराशर ने पराशर स्मृति की रचना की थी, जिसे पराशर धर्म संहिता भी कहा जाता है। वे वृक्षायुर्वेद के वक्ता थे, जो वनस्पति विज्ञान के सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थों में से एक है। ऋषि पराशर को धर्मग्रन्थों में मन्त्रद्रष्टा, शास्त्रवेत्ता, ब्रह्मज्ञानी एवं स्मृतिकार ऋषि के रूप में वर्णित किया गया है। ऋषि पराशर महर्षि वसिष्ठ के पौत्र, गोत्र-प्रवर्तक, वैदिक सूक्तों के द्रष्टा तथा ग्रन्थकार भी हैं।
जिस समय पितामह भीष्म शर-शय्या पर लेटे हुये थे उस समय ऋषि पराशर उनसे भेंट करने गये थे। राजा परीक्षित् के प्रायोपवेश, अर्थात् अनशन के समय भी उपस्थित अनेक ऋषि-मुनियों में भी वे सम्मिलित थे तथा राजा जनमेजय के सर्पयज्ञ में भी वे विराजमान थे। अतः ऋषि पराशर का स्थान सदैव अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रहा है। इसीलिये पराशर जयन्ती के अवसर पर यथाशक्ति उनका पूजन एवं व्रत करना चाहिये।
हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में 2,730 मीटर की ऊँचाई पर मीठे पानी की झील है, जिसे पराशर झील के नाम से जाना जाता है। इस झील के तट पर ऋषि पराशर को समर्पित एक तीन तल का शिवालय स्थित है। मान्यताओं के अनुसार ऋषि पराशर ने इसी स्थान पर तपस्या की थी। पराशर ऋषि जयन्ती के अवसर पर यहाँ विशाल उत्सव का आयोजन किया जाता है।