हिन्दु धर्म में शरद पूर्णिमा का पर्व अत्यधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन चन्द्र देव की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। शरद पूर्णिमा के अवसर पर पारम्परिक रूप से गौ-दुग्ध और चावल की खीर बनायी जाती है तथा उसे सम्पूर्ण रात्रि के लिये चाँदनी में रखा जाता है, जिससे उस खीर में चन्द्रमा के औषधीय व दैवीय गुण समाहित हो जाते हैं।
कुछ वर्षों में शरद पूर्णिमा के दिन चन्द्र ग्रहण भी पड़ जाता है और सूतक दोपहर से ही प्रारम्भ हो जाता है। सूतक में भोजन बनाना व ग्रहण करना दोनों ही निषेध होते हैं। जिसके कारण अनेक प्रकार के संशय लोगों के मन में उत्पन्न हो जाते हैं, जैसे कि ग्रहण काल में खीर बनायें या नहीं अथवा चाँदनी में रखने पर खीर ग्रहण के प्रभाव से दूषित तो नहीं हो जायेगी। धर्मशास्त्रियों के मतानुसार सूतक से ग्रहण तक न ही खीर बनानी चाहिये और न ही चाँदनी में रखनी चाहिये।
धर्मानुसार सूतक आरम्भ होने से पूर्व ही गाय के दूध को कुशा डालकर किसी ऐसे स्थान पर रख देना चाहिये जहाँ ग्रहण से पीड़ित चन्द्रमा की चाँदनी उसे दूषित न कर सके। जब ग्रहण पूर्ण हो जाये उसके पश्चात स्नान आदि से निवृत्त होकर खीर बनानी चाहिये और जितनी भी रात्रि शेष हो उतने समय के लिये खीर को चन्द्रमा की रोशनी में छोड़ दें। चन्द्रास्त के पश्चात उस खीर को प्रसाद के रूप में परिवार एवं प्रियजनों में वितरित करें और स्वयं भी ग्रहण करें।
इस प्रकार आप ग्रहण के नकारात्मक प्रभावों से बचते हुये शरद पूर्णिमा का पर्व पारम्परिक रूप से मना सकते हैं तथा दैवीय गुणों से युक्त खीर का भी लाभ उठा सकते हैं।
शरद पुर्णिमा को कोजागर पूजा के रूप में भी मनाया जाता है। कोजागर पूजा का व्रत माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने हेतु किया जाता है तथा इस व्रत में नारियल पानी पीने एवं चौसर खेलने का विधान है। हिन्दु धर्म में सूतक लग जाने के बाद से ग्रहण मोक्ष होने तक किसी भी प्रकार की दैवीय व सात्विक पूजा निषेध होती है तथा इस दौरान देवालयों के कपाट भी बन्द रहते हैं। अतः इस समयावधि में लक्ष्मी जी का पूजन नहीं करना चाहिये और न ही नारियल पानी पीना व चौसर खेलना चाहिये। जब ग्रहण समाप्त हो जाये और जितनी रात्रि शेष हो उस समय लक्ष्मी पूजन और सम्बन्धित विधान सम्पन्न करना चाहिये।
कुछ दुर्लभ वर्षों में ऐसा भी सम्भव है कि, चन्द्रास्त तक ग्रहण लगा रहे। यदि ऐसा हो तो सम्पूर्ण शरद पूर्णिमा और कोजागर व्रत खण्डित समझना चाहिये।