
टिप्पणी: सभी समय १२-घण्टा प्रारूप में लँकेस्टर, संयुक्त राज्य अमेरिका के स्थानीय समय और डी.एस.टी समायोजित (यदि मान्य है) के साथ दर्शाये गए हैं।
आधी रात के बाद के समय जो आगामि दिन के समय को दर्शाते हैं, आगामि दिन से प्रत्यय कर दर्शाये गए हैं। पञ्चाङ्ग में दिन सूर्योदय से शुरू होता है और पूर्व दिन सूर्योदय के साथ ही समाप्त हो जाता है।
सप्तमी श्राद्ध परिवार के उन मृतक सदस्यों के लिये किया जाता है, जिनकी मृत्यु सप्तमी तिथि पर हुयी हो। इस दिन शुक्ल पक्ष अथवा कृष्ण पक्ष दोनों ही पक्षों की सप्तमी तिथि का श्राद्ध किया जा सकता है।
पितृ पक्ष श्राद्ध पार्वण श्राद्ध होते हैं। इन श्राद्धों को सम्पन्न करने के लिये कुतुप, रौहिण आदि मुहूर्त शुभ मुहूर्त माने गये हैं। अपराह्न काल समाप्त होने तक श्राद्ध सम्बन्धी अनुष्ठान सम्पन्न कर लेने चाहिये। श्राद्ध के अन्त में तर्पण किया जाता है।
सप्तमी श्राद्ध पितृ पक्ष के सातवें दिन की तिथि पर किया जाने वाला एक तिथि-आधारित श्राद्ध है। हिन्दु धर्म में श्राद्ध एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कर्तव्य माना गया है, जिसका उद्देश्य पितरों की आत्मा की तृप्ति, शान्ति एवं मोक्ष की प्राप्ति करना होता है। धर्मशास्त्रों के अनुसार, पितृ का श्राद्ध उसी तिथि को करना सर्वश्रेष्ठ होता है, जिस तिथि को उनका निधन हुआ हो। यदि किसी पितृ का निधन शुक्ल या कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को हुआ हो, तो उनके लिये पितृ पक्ष की सप्तमी तिथि को श्राद्ध करना शास्त्रसम्मत एवं पुण्यदायक माना गया है।
गरुड़पुराण, मनुस्मृति, याज्ञवल्क्यस्मृति, विष्णु-धर्मसूत्र तथा धर्मसिन्धु आदि ग्रन्थों में तिथि के अनुसार श्राद्ध करने की स्पष्ट व्यवस्था वर्णित की गयी है। इन ग्रन्थों में यह उल्लेख प्राप्त होता है कि यदि उचित तिथि पर विधिपूर्वक श्राद्ध, तर्पण एवं पिण्डदान किया जाये, तो पितृगण उस कर्म से सन्तुष्ट होते हैं तथा वंशजों को आशीर्वाद प्रदान करते हैं। तिथि के अनुसार किया गया श्राद्ध ही पितृ को यथार्थ रूप में प्राप्त होता है, अन्यथा वह कर्म अधूरा माना जाता है।
यदि किसी कारणवश पितृ की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, तो धर्मशास्त्रों में सर्वपितृ अमावस्या के दिन समस्त पितृगणों के लिये सामूहिक रूप से श्राद्ध करने का प्रावधान भी वर्णित किया गया है। परन्तु जिन पितरों की मृत्यु सप्तमी तिथि को हुयी हो, उनके लिये विशेष रूप से इस दिन श्राद्ध करना उत्तम फलदायक होता है। सप्तमी श्राद्ध में पिण्डदान, तर्पण, ब्राह्मणभोज, दान तथा श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ आदि मुख्य अनुष्ठान होते हैं, जिन्हें श्रद्धापूर्वक सम्पन्न करने से पितरों को प्रसन्नता होती है। सप्तमी श्राद्ध पितृ ऋण से मुक्त होने का एक सशक्त साधन है। यह श्राद्ध वंश परम्परा को निभाने, पितरों का आशीर्वाद प्राप्त करने तथा पारिवारिक सुख-शान्ति की प्राप्ति हेतु आवश्यक माना गया है।