एक समय की बात है, आटपाट नामक एक समृद्ध नगर था। उस नगर में निर्धन ब्राह्मण परिवार निवास करता था। भाद्रपद मास का समय था, नगर में प्रत्येक घर में माता गौरी का आवाहन किया गया था। मार्ग में स्त्रियाँ गौरी माता के आगमन की तैयारी करती हुयी दिखायी दे रही थीं तथा चहुँओर घण्टियों की ध्वनि गुंजायमान हो रही थी।
उस निर्धन ब्राह्मण के बालकों ने सभी को ज्येष्ठ गौरी पूजन की तैयारी करते हुये देखा तथा घर आकर अपनी माँ से बोले - "माँ, माँ! हमारे घर भी गौरी माता को ले कर आओ।" माँ ने उत्तर दिया - "बच्चों, मैं देवी गौरी को लाकर क्या करूँगी? उनकी पूजा करनी होती है, नैवेद्य में घावन (चावल की रोटी) एवं घाटले (एक प्रकार का पारम्परिक मराठी मिष्टान्न) अर्पित करना होता है और हमारे घर में तो कुछ भी उपलब्ध नहीं है। ऐसा करो, अपने पिताजी से कहो कि बाजार से सामान लेकर आयें। यदि वे पूजन सामग्री लाते हैं, तो मैं गौरी माता का आवाहन करूँगी।"
बच्चे पिता के पास पहुँचे और बोले - "पिताजी, पिताजी! बाजार जाकर घावन-घाटले का सामान लेकर आइये ताकि माँ, गौरी माता को घर ला सकें।" ब्राह्मण ने घर में देखा, लेकिन उसके पास कुछ भी नहीं था। बालकों की बात सुनकर वह अत्यन्त दुखी हुआ एवं मन ही मन विचार करने लगा कि - "सोने जैसे मेरे बालक हैं, किन्तु उनकी इच्छा पूरी करने का कोई उपाय नहीं। न भिक्षाटन में कुछ प्राप्त होता है, न ही धन अर्जित करने की क्षमता है। इससे तो मेरा प्राण त्याग देना ही उचित प्रतीत होता है।"
अन्तर्मन में प्राण त्यागने का निश्चय कर आत्महत्या के उद्देश्य से वह ब्राह्मण तालाब की ओर चल पड़ा। मार्ग में सन्ध्या हो गयी। वहाँ तालाब के समीप में ही एक सुहागिन वृद्धा बैठी हुयी थी। उसने ब्राह्मण की समस्या भाँप ली एवं पूछा - "तुम कौन हो?" ब्राह्मण ने अपनी सम्पूर्ण व्यथा का वर्णन उस वृद्धा के समक्ष कर दिया। वृद्धा ने उसे सान्त्वना देते हुये कुछ उपदेशपूर्ण वचन कहे जिससे ब्राह्मण का मन शान्त हो गया। तदुपरान्त ब्राह्मण उस वृद्धा को अपने घर ले आया। ब्राह्मण की पत्नी ने दीपक प्रज्वलित करते हुये पूछा - "यह अतिथि महिला कौन हैं?" ब्राह्मण ने उत्तर दिया - "यह मेरी आजीबाई अर्थात् दादी के समान हैं।"
पत्नी रसोई में गयी एवं महाराष्ट्र का लोकप्रिय व्यञ्जन, आम्बील बनाने हेतु मटकी में अन्न खोजने लगी। उसकी पत्नी यह देखकर आश्चर्यचकित हो गयी कि मटकी में अनाज भरा हुआ था। उसने यह बात अपने पति को बताई, जिससे ब्राह्मण अत्यन्त प्रसन्न हुआ। उन्होंने पर्याप्त मात्रा में खिचड़ी आदि विभिन्न व्यञ्जन बनाये एवं सम्पूर्ण परिवार ने तृप्त होकर भोजन ग्रहण किया।
अगले दिन प्रातःकाल वृद्धा ने ब्राह्मण को पुकारते हुये कहा - "पुत्र, मुझे स्नान करवाओ तथा घावन-घाटले बनाकर भगवान को नैवेद्य अर्पित करो। कोई बहाना मत बनाना तथा न ही कोई रोने-धोने वाली बात करना।"
ब्राह्मण ने पत्नी से कहा - "अरि सुनती हो? आजीबाई को स्नान कराओ।" ऐसा कहकर वह स्वयं भिक्षाटन करने हेतु चला गया। उस दिन उसे सामान्य दिनों की अपेक्षा अधिक एवं प्रचुर मात्रा में भिक्षा प्राप्त हुयी जिसमें अत्यधिक मात्रा में गुड़ भी मिला। ब्राह्मण को अत्यन्त प्रसन्नता हुयी वह सम्पूर्ण सामग्री लेकर घर आया। उसकी पत्नी ने स्वादिष्ट भोजन बनाया तथा भगवान को घावन-घाटले का नैवेद्य अर्पित कर सभी ने भरपेट भोजन किया।
तदुपरान्त वृद्धा ने पुनः कहा - "पुत्र, कल भोजन में खीर बनाना।" ब्राह्मण ने दुःखी हृदय से कहा - "आजीबाई! खीर के लिये दूध कहाँ से लाऊँ?" वृद्धा बोली - "चिन्ता मत करो। अभी उठो, जितनी गायें चाहिये, उतने खूँटे तैयार करो, रस्सियाँ बाँधो। सन्ध्या के शुभ मुहूर्त में गायों के नाम लेकर पुकारना वे स्वयं आ जायेंगी तथा तुम्हारी गोशाला भर जायेगी।"
ब्राह्मण ने ठीक वैसा ही किया। उसने गौशाला में खूँटे गाड़ के सन्ध्याकाल में जैसे ही गायों के नाम लेकर पुकारा, वैसे ही अनेक गायें बछड़ों सहित दौड़ती हुयी आ गयीं तथा उसकी गोशाला गोधन से परिपूर्ण हो गयी। ब्राह्मण ने दूध दुहा तथा अगले दिन खीर बनायी। वृद्धा एवं ब्राह्मण के सम्पूर्ण परिवार ने खीर का भोग लगाकर उसका आनन्द लिया।
सन्ध्याकाल होते ही वृद्धा बोली - "पुत्र, अब मुझे विदा करो।" ब्राह्मण बोला - "आजीबाई! आपकी कृपा से मुझे यह सब कुछ प्राप्त हुआ है। मैं आपको कैसे विदा करूँ, अब आप चली गयीं तो यह सब भी चला जायेगा।"
वृद्धा मन्द-मन्द मुस्कायी एवं बोली - "पुत्र! भयभीत मत हो, तुम निश्चिन्त रहो, मेरे आशीर्वाद से तुम्हें किसी भी वस्तु का अभाव नहीं होगा। मैं ही वह हूँ जिसे सभी ज्येष्ठ गौरी के रूप में पूजते हैं। अब तुम मुझे सम्मानपूर्वक विदा करो।"
ब्राह्मण देवी माँ के श्रीचरणों में नमन करता हुआ बोला - "माँ, कोई ऐसा उपाय बताने की कृपा करें जिससे यह समृद्धि निरन्तर इसी प्रकार बनी रहे।"
माता गौरी ने कहा - "मेरे प्रस्थान करने के समय मैं तुम्हें रेत (वाळू) दूँगी। उसे तुम रसोई में, मटकों में, सन्दूक में तथा गोशाला आदि सहित सम्पूर्ण घर में छिड़क देना। यदि तुम ऐसा करोगे तो यह वैभव कभी कम नहीं होगा।" ब्राह्मण ने कहा - "जैसी आपकी आज्ञा माँ।" तदुपरान्त उसने देवी गौरी की विधिवत् पूजा-अर्चना की।
ब्राह्मण की श्रद्धा एवं भक्ति से माता ने प्रसन्न होकर उसे अपने व्रत का विधान वर्णित करते हुये कहा - "भाद्रपद मास में तालाब की पाली पर जाकर दो पाषाण लाओ, तदुपरान्त उन्हें सूर्य की किरणों एवं जल से स्नान कराकर ज्येष्ठ गौरी एवं कनिष्ठ गौरी के रूप में उनकी स्थापना करो। पूर्ण भक्तिभाव से उनकी पूजा-अर्चना करो। प्रथम दिवस घावन-घाटले, अर्थात् चावल की रोटी एवं मिष्टान्न तथा द्वितीय दिवस खीर-पूरी का नैवेद्य अर्पित करो। किसी सुहागिन स्त्री को शृङ्गार की सामग्री प्रदान करो, उन्हें भोजन कराओ। सन्ध्याकाल में हल्दी-कुमकुम देकर सम्मानपूर्वक विदा करो। ऐसा करने से तुम्हें अक्षय सुख-समृद्धि एवं सन्तान की प्राप्ति होगी।" इस प्रकार ब्राह्मण को ज्येष्ठ गौरी व्रत का विधान बताकर माता वहाँ से अन्तर्धान हो गयीं एवं ब्राह्मण कुटुम्ब सहित माता की भक्ति में आनन्दपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगा। यहीं इस ज्येष्ठ गौरी व्रत की पौराणिक कथा पूर्ण होती है। मान्यताओं के अनुसार ईश्वर के द्वार पर, गौशाला के मध्य तथा पीपल के वृक्ष के नीचे इस कथा का पाठ एवं श्रवण करने से इस कथा का सम्पूर्ण फल प्राप्त होता है।
॥इति श्री ज्येष्ठ गौरी व्रत कथा सम्पूर्णः॥