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मुरुगन मङ्गलवार व्रत कथा | मुरुगन व्रत कथा

DeepakDeepak

मुरुगन मङ्गलवार व्रत कथा

मुरुगन मङ्गलवार व्रत कथा

कौशिक नामक निर्धन ब्राह्मण के धनवान होने की कथा

प्राचीन काल का वृत्तान्त है। तमिल नाडु के किसी ग्राम में कौशिक नामक एक निर्धन ब्राह्मण अपने कुटुम्ब सहित निवास करता था। वह अत्यन्त धार्मिक, सदाचारी एवं सरल स्वभाव का व्यक्ति था। कौशिक भगवान शिव का अनन्य भक्त था, किन्तु उसके जीवन में नाना प्रकार के कष्टों व कठिनाइयों का वास था। उसकी पत्नी अस्वस्थ रहती थी। सन्तान भी अति दुर्बल थी तथा उसके घर में अन्न आदि का पूर्णतः अभाव था। वह भिन्न-भिन्न देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना कर चुका था किन्तु उसकी समस्याओं का समाधान नहीं हो रहा था।

उस ब्राह्मण को कष्टपूर्ण जीवन व्यतीत करता देख एक दिन स्वयं भगवान मुरुगन वृद्ध सन्यासी का रूप लेकर उस ग्राम में भिक्षाटन करते हुये आये। कौशिक ने आदरपूर्वक उन्हें जल एवं फल प्रदान कर उनका सम्मान किया। उसके सन्त-सत्कार से प्रसन्न होकर साधु भगवान ने कहा - "हे वत्स! तुम प्रत्येक मङ्गलवार को भगवान मुरुगन का व्रत करो। वह सङ्कटमोचन हैं। उनकी कृपा से तुम्हारे समस्त कष्टों का शीघ्र ही निवारण हो जायेगा।"

साधु महाराज के वचनों को सुनकर कौशिक ने पूछा - "हे महात्मन्! मैं यह व्रत किस प्रकार करूँ? कृपया इसकी विधि वर्णित करने की कृपा करें।"

साधु महाराज ने मुरुगन व्रत का विधान वर्णित करते हुये कहा - "मङ्गलवार को प्रातः स्नानोपरान्त लाल अथवा पीले रङ्ग के स्वच्छ वस्त्र धारण करना। घर के पूजन-स्थल में भगवान मुरुगन का चित्र अथवा मूर्ति स्थापित करना। उन्हें वेल अर्थात् भाला, मोर पंख, केले तथा लाल गुड़हल का पुष्प अर्पित करना। तदुपरान्त ॐ शरवणभवाय नमः। मन्त्र का जाप तथा मुरुगन सहस्रनाम का पाठ करना। व्रत में एक समय फलाहार अथवा सात्त्विक भोजन ग्रहण करना। अन्ततः निर्धनों या बालकों को केले एवं गुड़ वितरित कर व्रत पूर्ण करना।" इस प्रकार व्रत का विधान वर्णित कर सन्यासी रूप में आये भगवान मुरुगन अन्तर्धान हो गये।

कौशिक एवं उसकी पत्नी ने नियमपूर्वक यह व्रत आरम्भ कर दिया। व्रत के प्रभाव से प्रथम मङ्गलवार को उन सभी के लिये पड़ोस में रहने वाली स्त्री उत्तम भोजन लेकर आयी जो स्वयं देवी माँ वल्ली का रूप थीं। तृतीय मङ्गलवार को उसकी पत्नी के समस्त रोगों का निवारण हो गया तथा वह पूर्ण रूप से स्वस्थ हो गयी। पञ्चम मङ्गलवार को उनके पुत्र के स्वास्थ्य में सुधार होने लगा और उसकी शिक्षा में रुचि बढ़ने लगी। ग्यारहवें मङ्गलवार को साक्षात् भगवान मुरुगन ने कौशिक को स्वप्न में दर्शन देते हुये कहा - "हे प्रिय भक्त! तुम्हारी श्रद्धा, निष्ठा एवं भक्ति से मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुम्हारे जीवन के समस्त कष्ट एवं पापकर्म समाप्त हुये। जो भी भक्त इस व्रत का श्रद्धापूर्वक पालन करेगा, मैं उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण करूँगा।"

इस प्रकार कौशिक को आशीर्वाद प्रदान कर भगवान अन्तर्धान हो गये। भगवान मुरुगन की कृपा से कौशिक एवं उसका परिवार आनन्दपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगा। उसी समय से मुरुगन मङ्गलवार व्रत समस्त संसार में लोकप्रिय हो गया।

॥इति श्री मुरुगन मङ्गलवार व्रत कथा सम्पूर्णः॥


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