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2026 जया पार्वती व्रत का समय लँकेस्टर, California, संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए

DeepakDeepak

2026 जयापार्वती व्रत

लँकेस्टर, संयुक्त राज्य अमेरिका
जयापार्वती व्रत
26वाँ
जुलाई 2026
Sunday / रविवार
भगवान शिव और देवी पार्वती
Gauri Puja

जया पार्वती व्रत मुहूर्त

जयापार्वती व्रत रविवार, जुलाई 26, 2026 को
जयापार्वती प्रदोष पूजा मुहूर्त - 07:59 पी एम से 09:59 पी एम
अवधि - 02 घण्टे 00 मिनट्स
जया पार्वती व्रत शनिवार, अगस्त 1, 2026 को समाप्त
गौरी व्रत शुक्रवार, जुलाई 24, 2026 को
त्रयोदशी तिथि प्रारम्भ - जुलाई 26, 2026 को 01:27 ए एम बजे
त्रयोदशी तिथि समाप्त - जुलाई 27, 2026 को 03:44 ए एम बजे

टिप्पणी: सभी समय १२-घण्टा प्रारूप में लँकेस्टर, संयुक्त राज्य अमेरिका के स्थानीय समय और डी.एस.टी समायोजित (यदि मान्य है) के साथ दर्शाये गए हैं।
आधी रात के बाद के समय जो आगामि दिन के समय को दर्शाते हैं, आगामि दिन से प्रत्यय कर दर्शाये गए हैं। पञ्चाङ्ग में दिन सूर्योदय से शुरू होता है और पूर्व दिन सूर्योदय के साथ ही समाप्त हो जाता है।

2026 जया पार्वती व्रत

जयापार्वती व्रत देवी जया को समर्पित एक महत्त्वपूर्ण उपवास दिवस है। देवी जया, देवी पार्वती के विभिन्न रूपों में से एक हैं। जयापार्वती व्रत मुख्य रूप से गुजरात में मनाया जाता है। जयापार्वती का व्रत अविवाहित कन्याओं के साथ-साथ विवाहित स्त्रियों द्वारा भी किया जाता है। अविवाहित कन्याएँ जयापार्वती व्रत का पालन सुयोग्य वर की प्राप्ति के लिये करती हैं तथा विवाहित स्त्रियाँ इस व्रत को अपने पति की दीर्घायु एवं सुखी वैवाहिक जीवन के लिये करती हैं।

जयापार्वती व्रत आषाढ़ मास में पाँच दिनों तक मनाया जाता है। यह व्रत शुक्ल पक्ष त्रयोदशी से आरम्भ होता है तथा पाँच दिवस पश्चात कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि पर समाप्त होता है। जयापार्वती व्रत को पाँच, सात, नौ, ग्यारह तथा अधिकतम बीस वर्षों तक करने का सुझाव दिया गया है।

जयापार्वती व्रत विधि

जयापार्वती व्रत पालन के समय भक्तगण, विशेष रूप से नमकीन भोजन ग्रहण करने से बचते हैं। इन पाँच दिनों की उपवास अवधि के दौरान नमक का प्रयोग पूर्ण रूप से वर्जित है। कुछ भक्तगण इन पाँच दिनों की उपवास अवधि के दौरान अनाज तथा सभी प्रकार की सब्जियों के उपयोग से भी बचते हैं।

उपवास के प्रथम दिवस पर, एक छोटे पात्र में ज्वार/गेहूँ के दानों को बोया जाता है तथा पूजन स्थान पर रखा जाता है। पाँच दिन तक इस पात्र की पूजा की जाती है। पूजा के समय, सूती ऊन से बने एक हार को कुमकुम अथवा सिन्दूर से सजाया जाता है। सूती ऊन से बने इस हार को नगला के नाम से जाना जाता है। यह अनुष्ठान पाँच दिनों तक निरन्तर चलता है तथा प्रत्येक सुबह ज्वार/गेहूँ के दानों को जल अर्पित किया जाता।

गौरी तृतीया पूजा के एक दिन पहले, अर्थात उपवास के अन्तिम दिन, जब प्रातःकाल की पूजा के पश्चात् उपवास तोड़ा जाता है, उस रात स्त्रियां जागरण करती हैं व पूरी रात भजन-कीर्तन करते हुए माँ की आराधना व ध्यान करती हैं। धार्मिक भजनों तथा रात्रि जागरण की इस प्रथा को जयापार्वती जागरण के नाम से जाना जाता है।

अगले दिन, प्रातःकाल में, गेहूँ अथवा ज्वार की बढ़ी हुई घास को पात्र से निकालकर पवित्र जल अथवा नदी में प्रवाहित किया जाता है। प्रातःकाल की पूजा के पश्चात, नमक, सब्जियों तथा गेहूँ से बनी रोटियों के भोजन से उपवास तोड़ा जाता है।

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