
टिप्पणी: सभी समय २४-घण्टा प्रारूप में लँकेस्टर, संयुक्त राज्य अमेरिका के स्थानीय समय और डी.एस.टी समायोजित (यदि मान्य है) के साथ दर्शाये गए हैं।
आधी रात के बाद के समय जो आगामि दिन के समय को दर्शाते हैं, आगामि दिन से प्रत्यय कर दर्शाये गए हैं। पञ्चाङ्ग में दिन सूर्योदय से शुरू होता है और पूर्व दिन सूर्योदय के साथ ही समाप्त हो जाता है।
हिन्दु पञ्चाङ्ग के अनुसार आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की नवमी तिथि पर भड़ली नवमी मनायी जाती है। इस दिन आषाढ़ गुप्त नवरात्रि का समापन होता है। यह दिन अबूझ मुहूर्त माना जाता है, जिसका अर्थ है कि इस दिन बिना शुभ मुहूर्त देखे किसी भी मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश, मुण्डन, वाहन अथवा भूमि क्रय आदि कार्य सम्पन्न किये जा सकते हैं। यह तिथि प्रत्येक प्रकार के मंगल कार्य हेतु अत्यन्त शुभ मानी जाती है।
भड़ली नवमी उपासना करने से भक्त को देवी पार्वती की विशेष कृपा प्राप्त होती है। देवी माँ का यह रूप सभी दुर्लभ गुणों से युक्त एवं मंगलमयी है। उनकी आराधना से धन-धान्य एवं सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। वैष्णव अथवा भगवान विष्णु के भक्त इस दिन अपने आराध्य के निमित्त पूजन, हवन तथा व्रत आदि कर्म करते हैं।
भड़ली नवमी अथवा भड़रिया नवमी को विभिन्न भाषाओं एवं क्षेत्रों के अनुसार भड़ल्या नवमी, भढली नवमी, भड़ली नवमी, भादरिया नवमी, भदरिया नवमी, कन्दर्प नवमी तथा बदरिया नवमी आदि भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है।
हिन्दु धर्मावलम्बियों के मध्य भड़ली नवमी का पर्व अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना जाता है। धर्मग्रन्थों में प्राप्त वर्णन के अनुसार जिन लोगों के विवाह हेतु कोई शुभ मुहूर्त नहीं निकलता है उनका विवाह भड़ली नवमी के अवसर पर किया सकता है।
हिन्दु पञ्चाङ्ग के अनुसार भड़ली नवमी के उपरान्त चातुर्मास्य प्रारम्भ हो जाता है, जिसके कारण आगामी 4-5 माह तक सभी प्रकार के मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं। इसीलिये चातुर्मास्य से पूर्व अन्तिम सर्वोत्तम अवसर के रूप में किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्य हेतु भड़ली नवमी का दिन उपयुक्त माना जाता है।