
करवा चौथ, विशेषतः उत्तर भारत में हिन्दु स्त्रियों द्वारा मनाया जाने वाला अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पर्व है। करवा चौथ पर्व मुख्यतः उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश तथा हिमाचल प्रदेश के क्षेत्रों में मनाया जाता है। दिल्ली सहित राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में भी यह दिन अत्यधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि बहुतायत पंजाबी परिवार पूर्ण श्रद्धा से करवा चौथ की परम्परा का पालन करते हैं। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि, उत्तर भारत में करवाचौथ से सम्बन्धित जो विभिन्न प्रथायें प्रचलित हैं, वे दिल्ली की स्थानीय संस्कृति से प्रभावित हैं।
करवा चौथ के पर्व को लोकप्रिय करने में सिनेमा जगत का भी योगदान है। उत्तर भारत में वर्तमान में प्रचलित करवा चौथ की ऐसी अनेक परम्परायें प्रचलित हैं, जो लोकप्रिय दैनिक धारावाहिकों द्वारा किये गये करवा चौथ के चित्रण से प्रभावित हैं। इन धारावाहिकों के कारण, करवा चौथ से सम्बन्धित अनेक नवीन परम्पराओं ने भी जन्म ले लिया है। सिनेमा, दूरदर्शन तथा विज्ञापनों में करवाचौथ की लोकप्रियता वृद्धि के कारण, यह त्यौहार गुजरात, पश्चिम बंगाल तथा बिहार जैसे उन राज्यों में भी लोकप्रिय हो चुका है जहाँ पूर्व में यह पर्व प्रचलित नहीं था।
करवा चौथ व्रत का पालन मात्र विवाहित स्त्रियों द्वारा ही किया जाता है। इस अवसर पर विवाहित स्त्रियाँ अपने पति की दीर्घायु एवं सकुशलता हेतु एक दिवसीय उपवास धारण करती हैं। यह उपवास पूर्णतः निराहार किया जाता है। अधिकांश स्त्रियाँ निर्जला उपवास का पालन करती हैं तथा रात्रिकाल में चन्द्र दर्शन के उपरान्त ही जल ग्रहण करती हैं। परम्परओं के विपरीत, कुछ पति भी अपनी पत्नियों की कुशलता तथा मनोबल में वृद्धि हेतु करवाचौथ व्रत का पालन करते हैं। पारम्परिक रूप से करवा चौथ व्रत मात्र विवाहित स्त्रियों द्वारा ही किया जाता है, किन्तु अनेकों अविवाहित कन्याओं ने भी भविष्य में सुयोग्य वर की प्राप्ति हेतु इस व्रत का पालन आरम्भ कर दिया है। समय के साथ नवीन प्रथाओं एवं परम्पराओं का सम्मिलित होना इस पर्व के महत्त्व व लोकप्रियता को दर्शाता है।
उत्तर भारत में प्रचलित पूर्णिमान्त कैलेण्डर के अनुसार करवा चौथ पर्व, कार्तिक माह की संकष्टी चतुर्थी पर मनाया जाता है। धर्म-सिन्धु, निर्णय-सिन्धु तथा व्रतराज जैसे धर्म ग्रन्थों में करवा चौथ को करक चतुर्थी के रूप में उल्लेखित किया गया है।
करक अथवा करवा मिट्टी से निर्मित एक पात्र होता है, जिसका उपयोग करवा चौथ पूजन, अर्घ्य तथा पारवारिक कुशलता हेतु दान के रूप में किया जाता है। धर्म ग्रन्थों में मात्र स्त्रियों को ही इस व्रत के पालन का अधिकार दिया गया है, क्योंकि करक चतुर्थी पर किये जाने वाले इस करवा चौथ व्रत के परिणाम स्त्रियों को ही फलीभूत होते हैं। करवा चौथ व्रत का पालन पति की दीर्घायु एवं सकुशलता के साथ ही पुत्रों, पौत्रों, सम्पत्ति तथा परिवार की अनन्त समृद्धि हेतु भी किया जाता है।
करक चतुर्थी पर की जाने वाली विशेष पूजा मुख्यतः देवी पार्वती को समर्पित है। अखण्ड सौभग्यवती होने के कारण सर्वप्रथम देवी पार्वती की पूजा की जाती है, तत्पश्चात् भगवान शिव, भगवान कार्तिकेय एवं भगवान गणेश की पूजा की जाती है। करवा चौथ के अवसर पर स्त्रियाँ देवी गौरा तथा देवी चौथ माता का पूजन भी करती हैं, जिन्हें स्वयं देवी पार्वती का रूप माना जाता है।
देवी पार्वती करवा चौथ व्रत की मुख्य आराध्य हैं। देवी पार्वती के अतिरिक्त उनके कुटुम्ब के अन्य सदस्यों को भी पूजा जाता है, जिनमें उनके पति भगवान शिव तथा उनके पुत्र भगवान कार्तिकेय एवं भगवान गणेश सम्मिलित हैं।
उत्तर भारतीय राज्यों में प्रचलित पूर्णिमान्त कैलेण्डर के अनुसार -
कार्तिक माह (आठवाँ चन्द्र माह) की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि (चतुर्थ दिवस)
अमान्त हिन्दु कैलेण्डर के अनुसार -
आश्विन माह (सातवाँ चन्द्र माह) के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि (चतुर्थ दिवस)
अटला तद्दे पर्व, जो आन्ध्र प्रदेश एवं तेलंगाना में मनाया जाता है।