हरतालिका तीज को यह नाम, इस पर्व से सम्बन्धित एक पौराणिक कथा के कारण प्राप्त हुआ है। हरतालिका शब्द "हरत" एवं "आलिका" का संयोजन है। हरत का अर्थ "अपहरण" तथा आलिका का अर्थ "महिला मित्र" होता है। हरतालिका तीज की पौराणिक कथा के अनुसार, देवी पार्वती के मन में भगवान शिव से विवाह की कामना थी, किन्तु देवी पार्वती के पिता हिमवान उनका विवाह भगवान विष्णु से करवाने वाले थे। इसीलिये देवी पार्वती की एक सखी ने उन्हें घने वन में ले जाकर छुपा लिया था।
देवी पार्वती के अकस्मात् कहीं चले जाने के कारण उनके पिता के मन में यह विचार आया कि, किसी ने उनकी पुत्री का अपहरण कर लिया है। इसीलिये, इस दिन को हरतालिका अथवा हरितालिका के नाम से जाना जाता है।
जैसा कि, पौराणिक कथाओं में वर्णित है, कि देवी पार्वती ने भगवान शिव को प्रसन्न करने की कामना से वन में कठोर तपस्या की थी। देवी पार्वती के दृढ़ सङ्कल्प के कारण भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया कि, शिव जी के साथ विवाह करने की उनकी इच्छा अवश्य पूर्ण होगी। देवी पार्वती की सखी ने उन्हें भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने में सहायता की थी, इसीलिये यह दिन स्त्री मित्रों के मध्य मित्रता एवं एकजुटता के रूप में भी प्रसिद्ध है।

हरतालिका तीज व्रत, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि पर मनाया जाता है। इस दिन, बालू अथवा रेत द्वारा भगवान शिव एवं देवी पार्वती की पार्थिव प्रतिमाओं का निर्माण किया जाता है तथा वैवाहिक सुख एवं सन्तान की प्राप्ति हेतु उनकी पूजा-अर्चना की जाती है।
हरतालिका पूजा करने के लिये प्रातःकाल का समय उत्तम माना जाता है। यदि किसी कारणवश प्रातःकालीन पूजा सम्भव नहीं है, तो प्रदोष काल में भी भगवान शिव एवं देवी पार्वती की पूजा की जा सकती है। तीज की पूजा, प्रातः स्नान करके एवं स्वच्छ वस्त्र धारण करके करनी चाहिये। बालू से निर्मित भगवान शिव एवं देवी पार्वती की पूजा करनी चाहिये तथा पूजा के समय हरतालिका व्रत कथा सुननी-सुनानी चाहिये।
व्रतराज नामक धार्मिक ग्रन्थ में हरतालिका पूजा करने की विस्तृत विधि वर्णित है। सामान्यतः, हरतालिका तीज को केवल स्त्रियों का त्यौहार माना जाता है। हालाँकि, व्रतराज में कहीं भी यह उल्लेख नहीं है कि, यह मात्र स्त्रियों द्वारा की जाने वाली पूजा है। व्रतराज में वर्णित मुख्य पूजा चरण निम्नलिखित हैं -