
टिप्पणी: सभी समय १२-घण्टा प्रारूप में लँकेस्टर, संयुक्त राज्य अमेरिका के स्थानीय समय और डी.एस.टी समायोजित (यदि मान्य है) के साथ दर्शाये गए हैं।
आधी रात के बाद के समय जो आगामि दिन के समय को दर्शाते हैं, आगामि दिन से प्रत्यय कर दर्शाये गए हैं। पञ्चाङ्ग में दिन सूर्योदय से शुरू होता है और पूर्व दिन सूर्योदय के साथ ही समाप्त हो जाता है।
कर्णाटक में उगादी पर्व को युगादी के रूप में मनाया जाता है। कर्णाटक के हिन्दु धर्मानुयायियों के लिये यह एक अत्यधिक महत्त्वपूर्ण दिवस है। इस दिन कन्नड़ कैलेण्डर में नवीन संवत्सर आरम्भ होता है, जो साठ वर्षों का एक चक्र होता है। सभी साठ संवत्सर अपने एक विशेष नाम से जाने जाते हैं। कन्नड़ कृषि परम्परा के अनुसार भी युगादी विशेष पर्व माना जाता है। आन्ध्र प्रदेश तथा तेलंगाना आदि अन्य दक्षिण भारतीय क्षेत्रों में युगादी को उगादी के नाम से मनाया जाता है।
कर्णाटक में युगादी का पर्व अत्यन्त हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इस अवसर पर मुख्य द्वारा पर रंगोली बनायी जाती है, जिसे मुग्गुलु कहा जाता है। द्वारों एवं मन्दिर में आम के पत्तों के तोरण लटकाये जाते हैं। इसके अतिरिक्त पचड़ी नामक एक विशेष व्यञ्जन तैयार किया जाता है, जिसमें मीठा, खट्टा, नमकीन, कड़वा, कसैला तथा तीखा सभी स्वादों का मिश्रण होता है।
महाराष्ट्र के लोगों द्वारा युगादी उत्सव को गुड़ी पड़वा के रूप में मनाया जाता है। युगादी तथा गुड़ी पड़वा दोनों पर्व एक ही दिन मनाये जाते हैं।
चन्द्र-सौर कैलेण्डर के अनुसार, युगादी को नववर्ष माना जाता है। चन्द्र-सौर कैलेण्डर, चन्द्रमा की स्थिति तथा सूर्य की स्थिति को आधार मान कर वर्ष को माह एवं दिवस में विभाजित करता है। चन्द्र-सौर कैलेण्डर के समकक्ष एक अन्य कैलेण्डर है, जिसे सौर कैलेण्डर के नाम से जाना जाता है। सौर कैलेण्डर, वर्ष को माह एवं दिवस में विभाजित करने हेतु मात्र सूर्य की स्थिति को ही आधार मानता है। यही कारण है कि, हिन्दु नववर्ष को दो भिन्न-भिन्न नामों से तथा वर्ष के दो भिन्न-भिन्न समय पर मनाया जाता है। सौर कैलेण्डर पर आधारित हिन्दु नववर्ष को तमिलनाडु में पुथन्डु, असम में बिहू, पंजाब में वैसाखी, उड़ीसा में पणा संक्रान्ति तथा पश्चिम बंगाल में नब बरस के नाम से जाना जाता है।
युगादी उत्सव के दिन का आरम्भ अनुष्ठानिक तेल-स्नान से होता है, जिसके पश्चात प्रार्थना की जाती है। शास्त्रों के अनुसार, तेल-स्नान तथा नीम के पत्तों का सेवन करना एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अनुष्ठान है। उत्तर भारतीय भक्तगण, युगादी उत्सव नहीं मनाते हैं, किन्तु वह इस दिन से नौ दिवसीय चैत्र नवरात्रि पूजन आरम्भ करते हैं, जिसके प्रथम दिवस पर मिश्री के साथ नीम का सेवन किया जाता है।