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2027 युगादी का दिन नई दिल्ली, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, भारत के लिए

DeepakDeepak

2027 युगादी - कन्नड़ नव वर्ष

नई दिल्ली, भारत
युगादी - कन्नड़ नव वर्ष
7वाँ
अप्रैल 2027
Wednesday / बुधवार
युगादि उत्सव मनाने के लिये एकत्रित परिवारजन
Yugadi Celebration

युगादी का दिन और समय

कन्नड़ शक सम्वत 1949 प्रारम्भ
युगादी बुधवार, अप्रैल 7, 2027 को
पाड्य तिथि प्रारम्भ - अप्रैल 07, 2027 को 05:20 ए एम बजे
पाड्य तिथि समाप्त - अप्रैल 08, 2027 को 04:28 ए एम बजे

नव सम्वत मन्त्री मण्डल
👑राजा - बुध
बुधस्य राज्ये धनधान्यसंकुलं महीतलं वृष्टिरनुत्तमा च।
जना विवाहोत्सवयज्ञकाङ्क्षिणः सुभिक्षमस्मिन्बहुवातवृष्टिः॥
बुधदेव के राजा होने पर पृथ्वी धन-धान्य से परिपूर्ण होती है तथा उत्कृष्ट वर्षा होती है। लोग विवाह, उत्सव एवं यज्ञ आदि करने के लिये तत्पर रहते हैं। चारों ओर सुभिक्ष, अर्थात् सुख-समृद्धि रहती है तथा पर्याप्त मात्रा में वायु का प्रवाह एवं वर्षा होती है।
⚜️मन्त्री - बुध
बुधे प्रधाने कमलेक्षुदुग्धगोधूमसंपत्प्रचुरा च वृष्टिः।
कीलालधान्यानि पचेलिमानि नरेश्वराणामपि कोशवृद्धिः॥
बुधदेव के मन्त्री पद पर प्रतिष्ठित होने पर कमल, गन्ना, दुग्ध एवं गेहूँ की अधिकता होती है। वर्षा प्रचुर मात्रा में होती है। गुड़ आदि धान्य भली-भाँति पकते हैं तथा राजाओं के कोश में भी वृद्धि होती है।
⚔️सेनाधिपति - मंगल
अपलिजो मछनायकतां गतो विविध दुःख वियोग समन्वितः।
जनपदेषु जनाः क्रय-विक्रये भय विशेतया न फलं क्वचित॥
जब सेनाधिपति मङ्गल होते हैं, तब मनुष्य विभिन्न प्रकार के दुखों एवं वियोग से पीड़ित होता है। राजा एवं प्रजा के मध्य सङ्घर्ष, गतिरोध एवं असन्तोष की स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। व्यापारी उद्योग आदि में अल्प निवेश करते हैं। लाभ न्यूनतम होता है। भूलोक पर जल एवं धन-धान्य का अभाव होता है।
🌾सस्याधिपति - शनि
धान्यक्षयः कोशविहीनता स्यान्नरेश्वराणामपि मन्दवृष्टिः।
हुताशभीतिः प्रचुरामयः स्यात्सस्याधिनाथोऽर्कसुतो यदा स्यात्॥
जिस वर्ष सूर्यपुत्र शनिदेव सस्याधिपति होते हैं, उस वर्ष धान्य का क्षय होता है, यहाँ तक कि राजाओं के कोश भी रिक्त हो जाते हैं। वर्षा अल्प मात्रा में होती है, अग्नि का भय रहता है तथा अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं।
🌻धान्याधिपति - गुरु
यज्ञक्रियायां निरता द्विजाः स्युर्गावो बहुक्षीरयुता महिष्यः।
सुभिक्षकृद्वर्षति देवनाथो धान्याधिपो यत्र सुरेन्द्रमन्त्री॥
जब देवगुरु बृहस्पति धान्याधिपति होते हैं, तब द्विज यज्ञ-कर्म में निरत रहते हैं। गायें एवं भैंसें अधिक दुग्ध देती हैं। देवराज इन्द्र पर्याप्त वर्षा करते हैं तथा सुभिक्ष अर्थात् अन्नादि की प्रचुरता होती है।
💰धनाधिपति - शुक्र
द्रविणभो भृगुजो द्रविणेर्युताः समयताः सफलतानुगाः।
समसुखा क्रय-विक्रय जीविणो नृपतयो जनधान्य तत्पराः॥
जब भृगुपुत्र शुक्र धनाधिपति होते हैं, तब प्रजा धनवान होती है। सभी को समान सुख प्राप्त होता है। व्यापार-विपणन आदि में उत्तम सफलता प्राप्त होती है। शासन तन्त्र सुचारु रूप से संचालित होता है। चारों ओर सुख एवं आनन्द का संचार होता है। प्रजा में शुभ भावों का उदय होता है।
🌧मेघाधिपति - मंगल
वातः प्रचण्डोऽग्निभयं जनानामवृष्टिभीत्याकुलितं च धान्यम्।
व्याधिप्रकोपोपहताश्च सर्वे मेघाधिपो यत्र धरातनूजः॥
जब भूमिपुत्र मङ्गल मेघाधिपति होते हैं, तब प्रचण्ड वेग से वायु चलती है, प्राणियों को अग्नि का भय रहता है, अनावृष्टि के भय से अन्न अल्प मात्रा में होता है। समस्त प्रजा रोग के प्रकोप से पीड़ित होती है।
🍯रसाधिपति - सूर्य
कार्पासतैलेक्षुगुडादिकानां महर्घता शीतभयं जनानाम्।
वापीतडागादिषु तुच्छमम्बु रसाधिनाथो दिनकृद्यदा स्यात्॥
जब सूर्यदेव रसाधिपति होते हैं, तब कपास, तेल, गन्ना, गुड़ आदि वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि होती है। प्रजा को शीत का भय रहता है। तालाबों, सरोवरों एवं बावड़ियों आदि जल स्रोतों में जल बहुत अल्प मात्रा में रह जाता है।
🪙नीरसाधिपति - शुक्र
कपूर्रागरु गन्धानां हेम मौक्तिक वाससाम्।
अर्घवृद्धिः प्रजायेत नीरसेशो भृगुर्यदा॥
जब भृगुपुत्र शुक्र नीरसाधिपति के पद पर प्रतिष्ठित होते हैं, तब कपूर, अगर, तगर आदि अन्य सुगन्धित द्रव्यों एवं वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि होती है। इसके अतिरिक्त स्वर्ण, रजत, मोती एवं वस्त्र आदि के मूल्य भी बढ़ जाते हैं।
🍎फलाधिपति - मंगल
फलपतिर्यदि भूतनयोभवेन्न बहुपुष्प फलान्वित पादापाः।
गदभयान्वित देश जनास्तदा नृपतयो बहुविग्रह कारकाः॥
जब भूमिपुत्र मङ्गल फलाधिपति होते हैं, तब वृक्षों में फल-पुष्प कम उत्पन्न होते हैं। विभिन्न प्रकार के रोगों का उपद्रव होता है। महानगरों में भारी विघटन होता है। अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग अधिक होता है तथा प्रजा विचलित रहती है। खान-पान की वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि होती है।

टिप्पणी: सभी समय १२-घण्टा प्रारूप में नई दिल्ली, भारत के स्थानीय समय और डी.एस.टी समायोजित (यदि मान्य है) के साथ दर्शाये गए हैं।
आधी रात के बाद के समय जो आगामि दिन के समय को दर्शाते हैं, आगामि दिन से प्रत्यय कर दर्शाये गए हैं। पञ्चाङ्ग में दिन सूर्योदय से शुरू होता है और पूर्व दिन सूर्योदय के साथ ही समाप्त हो जाता है।

युगादी 2027

कर्णाटक में उगादी पर्व को युगादी के रूप में मनाया जाता है। कर्णाटक के हिन्दु धर्मानुयायियों के लिये यह एक अत्यधिक महत्त्वपूर्ण दिवस है। इस दिन कन्नड़ कैलेण्डर में नवीन संवत्सर आरम्भ होता है, जो साठ वर्षों का एक चक्र होता है। सभी साठ संवत्सर अपने एक विशेष नाम से जाने जाते हैं। कन्नड़ कृषि परम्परा के अनुसार भी युगादी विशेष पर्व माना जाता है। आन्ध्र प्रदेश तथा तेलंगाना आदि अन्य दक्षिण भारतीय क्षेत्रों में युगादी को उगादी के नाम से मनाया जाता है।

कर्णाटक में युगादी का पर्व अत्यन्त हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इस अवसर पर मुख्य द्वारा पर रंगोली बनायी जाती है, जिसे मुग्गुलु कहा जाता है। द्वारों एवं मन्दिर में आम के पत्तों के तोरण लटकाये जाते हैं। इसके अतिरिक्त पचड़ी नामक एक विशेष व्यञ्जन तैयार किया जाता है, जिसमें मीठा, खट्टा, नमकीन, कड़वा, कसैला तथा तीखा सभी स्वादों का मिश्रण होता है।

महाराष्ट्र के लोगों द्वारा युगादी उत्सव को गुड़ी पड़वा के रूप में मनाया जाता है। युगादी तथा गुड़ी पड़वा दोनों पर्व एक ही दिन मनाये जाते हैं।

चन्द्र-सौर कैलेण्डर के अनुसार, युगादी को नववर्ष माना जाता है। चन्द्र-सौर कैलेण्डर, चन्द्रमा की स्थिति तथा सूर्य की स्थिति को आधार मान कर वर्ष को माह एवं दिवस में विभाजित करता है। चन्द्र-सौर कैलेण्डर के समकक्ष एक अन्य कैलेण्डर है, जिसे सौर कैलेण्डर के नाम से जाना जाता है। सौर कैलेण्डर, वर्ष को माह एवं दिवस में विभाजित करने हेतु मात्र सूर्य की स्थिति को ही आधार मानता है। यही कारण है कि, हिन्दु नववर्ष को दो भिन्न-भिन्न नामों से तथा वर्ष के दो भिन्न-भिन्न समय पर मनाया जाता है। सौर कैलेण्डर पर आधारित हिन्दु नववर्ष को तमिलनाडु में पुथन्डु, असम में बिहू, पंजाब में वैसाखी, उड़ीसा में पणा संक्रान्ति तथा पश्चिम बंगाल में नब बरस के नाम से जाना जाता है।

युगादी उत्सव के दिन का आरम्भ अनुष्ठानिक तेल-स्नान से होता है, जिसके पश्चात प्रार्थना की जाती है। शास्त्रों के अनुसार, तेल-स्नान तथा नीम के पत्तों का सेवन करना एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अनुष्ठान है। उत्तर भारतीय भक्तगण, युगादी उत्सव नहीं मनाते हैं, किन्तु वह इस दिन से नौ दिवसीय चैत्र नवरात्रि पूजन आरम्भ करते हैं, जिसके प्रथम दिवस पर मिश्री के साथ नीम का सेवन किया जाता है।

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