
टिप्पणी: सभी समय १२-घण्टा प्रारूप में लँकेस्टर, संयुक्त राज्य अमेरिका के स्थानीय समय और डी.एस.टी समायोजित (यदि मान्य है) के साथ दर्शाये गए हैं।
आधी रात के बाद के समय जो आगामि दिन के समय को दर्शाते हैं, आगामि दिन से प्रत्यय कर दर्शाये गए हैं। पञ्चाङ्ग में दिन सूर्योदय से शुरू होता है और पूर्व दिन सूर्योदय के साथ ही समाप्त हो जाता है।
पूर्णिमान्त हिन्दु पञ्चाङ्ग के अनुसार मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को बाला जयन्ती के रूप में मनाया जाता है। अमान्त पञ्चाङ्ग में यह तिथि कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में आती है। बाला जयन्ती का पर्व देवी बाला को समर्पित है जो द्वादश सिद्धिविद्या देवियों में से एक हैं। हिन्दु धर्मग्रन्थों में देवी बाला सिद्धिविद्या को श्रीविद्या तन्त्र की अत्यन्त गूढ़ एवं पवित्र विद्या माना गया है।
देवी बाला की उपासना करने से साधक को विद्या, बुद्धि, वाक्शक्ति, स्मृति एवं तेज की प्राप्ति होती है। देवी को बालिका रूपिणी ब्रह्मविद्या कहा गया है, जो ब्रह्मज्ञान के प्रथम सोपान का प्रतीक हैं।
देवी बाला द्वादश सिद्धिविद्याओं में से एक प्रमुख देवी हैं, जिन्हें ज्ञान, पवित्रता, सहजता तथा आध्यात्मिक तेज की अधिष्ठात्री शक्ति कहा गया है। देवी बाला का स्वरूप बालिका के समान निर्मल एवं कोमल है, परन्तु उनकी शक्ति अपरिमित एवं सर्वोच्च मानी गयी है। श्रीविद्या साधना के अन्तर्गत आरम्भिक उपासना के रूप में देवी बाला की ही पूजा-अर्चना की जाती हैं।
श्रीविद्यार्णवतन्त्र के अन्तर्गत देवी बाला को देवी त्रिपुर सुन्दरी की बाल्यावस्था के रूप में वर्णित किया है। देवी बाला इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया नामक तीन शक्तियों का समन्वय करती हैं। उनकी आराधना से साधक के अन्तर्मन स्थित निष्कपटता, सरलता एवं शुद्ध चेतना जाग्रत होती है।
जो मनुष्य बाला जयन्ती के दिन श्रद्धा एवं संयमपूर्वक देवी बाला की उपासना करता है, वह जीवन में न केवल सांसारिक समृद्धि प्राप्त करता है, अपितु उसे आत्मज्ञान एवं मोक्ष फल भी प्राप्त होता है।