भगवान वेदव्यास के समक्ष अपने पूर्वजन्म का वर्णन करते हुये देवर्षि नारद कहते हैं - "हे मुने! पिछले कल्प में मैं वेदवेत्ता ब्राह्मणों की सेवा करने वाली एक दासी का पुत्र था। वर्षा ऋतु में वे ब्राह्मण, योगी एवं मुनि आदि एक स्थान पर चातुर्मास्य विधान के अनुसार उपासना कर रहे थे। बाल्यकाल में ही मुझे उन सन्तों की सेवा में नियुक्त कर दिया गया था। यद्यपि मैं बालक था, किन्तु किसी प्रकार की चञ्चलता नहीं करता था, स्वभाव से जितेन्द्रिय था तथा अधिकांशतः मौन रहता था। बाल-मनोरञ्जन एवं क्रीड़ा आदि में मेरी रुचि नहीं थी तथा मैं आज्ञानुसार मुनियों की सेवा में तत्पर रहता था। मेरे इस शील स्वभाव से उन समदर्शी मुनियों का हृदय द्रवित हो गया तथा उन्होंने मुझ सेवक पर अत्यन्त अनुग्रह किया।
कालान्तर में एक समय सन्तों की अनुमति प्राप्त करके मैंने उनके पात्रों में शेष उच्छिष्ट प्रसाद का सेवन कर लिया। इससे मेरे पूर्वकृत समस्त सञ्चित पाप नष्ट हो गये तथा मेरा मन निर्मल हो गया। इस प्रकार उन ब्राह्मणों, साधु-सन्तों एवं योगियों की सेवा करते-करते मेरा हृदय शुद्ध हो गया तथा उन लोगों के भजन-पूजन, कीर्तन आदि में मेरी भी रुचि जागृत हो गयी।
प्रिय व्यासजी! लीलागान-परायण महात्माओं के अनुग्रह से मैं प्रतिदिन सत्सङ्ग में भगवान श्रीकृष्ण की मनोहर कथाओं का श्रवण करता था। श्रद्धापूर्वक एक-एक पद का श्रवण करते-करते भगवान के प्रिय चरणों के प्रति मेरा अनुराग बढ़ने लगा। महामुने! शरद एवं वर्षा दोनों ऋतुओं में तीनों काल मुनियों ने श्रीहरि के निर्मल चरित का गायन एवं सङ्कीर्तन किया तथा मैं प्रेमपूर्वक प्रत्येक उपदेश का श्रवण करता रहा। चित्त के रजोगुण एवं तमोगुण को नष्ट करने वाली भक्ति का मेरे हृदय में प्रादुर्भाव हो गया।
सन्तों की सेवा से मेरे पाप नष्ट हो चुके थे। मेरे हृदय में श्रद्धा एवं इन्द्रियों में संयम उत्पन्न हो गया था। मैं मन-क्रम-वचन से उनका आज्ञाकारी हो गया था। मेरी श्रद्धा से प्रसन्न होकर उन कृपालु महात्माओं ने प्रस्थान करते समय दया करके मुझे उस परम गुह्यतम ज्ञान का उपदेश किया, जिसका उपदेश स्वयं भगवान ने अपने श्रीमुख से किया है। उस उपदेश से ही जगत् निर्माता भगवान श्रीकृष्ण की उस अलौकिक माया के प्रभाव से मैं परिचित हुआ, जिसका ज्ञान होने पर परम पद की प्राप्ति हो जाती है।
हे सत्यसङ्कल्प व्यास जी! पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण के प्रति समस्त कर्मों को समर्पित कर देना ही संसार के त्रिविध तापों की एकमात्र औषधि है। यही गोपनीय ज्ञान मैंने आपको बतला दिया है। जिस पदार्थ से प्राणियों को रोग हो जाता है, वही पदार्थ चिकित्सा विधि के अनुसार प्रयोग करने पर उस रोग का उपचार करता है। इसी प्रकार यद्यपि सभी कर्म मनुष्यों को जन्म-मृत्यु रूपी संसार के चक्र में डालने वाले हैं, तथापि जब वे भगवान को समर्पित कर दिया जाते हैं, तब उनका कर्म-तत्व नष्ट हो जाता है।"
नारदजी पुनः कहते हैं - "हे ब्रह्मन्! जब मैंने भगवान की आज्ञा का पालन किया, तब यह ज्ञात होने पर भगवान श्रीकृष्ण ने मुझे आत्मज्ञान, ऐश्वर्य एवं अपनी प्रेमा-भक्ति का दान दिया।"
यह सुनकर सत्यवतीनन्दन भगवान व्यास जी ने उनसे प्रश्न करते हुये कहा - "हे नारदजी! जब आपको ज्ञानोपदेश करने वाले मुनिगण प्रस्थान कर गये, तब आपने क्या किया? उस समय तो आपकी अवस्था अत्यन्त छोटी थी। आपकी शेष आयु किस प्रकार व्यतीत हुयी? मृत्यु के समय आपने किस प्रकार अपनी देह का परित्याग किया? देवर्षे! काल तो सभी वस्तुओं को नष्ट कर देता है, उसने आपकी इस पूर्वकाल की स्मृति का कैसे नाश नहीं किया?"
देवर्षि नारद बोले - "हे भगवन्! मुझे ज्ञानोपदेश करने वाले मुनिगणों के प्रस्थान करने के उपरान्त मैंने इस प्रकार अपना जीवन व्यतीत किया, अब आप श्रवण करें। यद्यपि मेरी आयु उस समय केवल पाँच वर्ष की थी, तथापि मेरे विचारों में भक्ति एवं वैराग्य का भाव उत्पन्न हो गया। मेरे इन वैराग्यपूर्ण विचारों को वास्तविकता में परिणत होने के मार्ग में मेरी माँ का स्नेह बाधक सिद्ध हो रहा था। मैं मातृस्नेह के बन्धन को तोड़ने में असमर्थ था। मैं अपनी माँ का एकमात्र पुत्र था। एक तो वह स्त्री थी, ऊपर से भोली एवं एक दासी थी। मेरा भी उनके अतिरिक्त कोई अन्य आश्रय नहीं था। उसने भी स्वयं को मेरे मोहपाश में बाँध रखा था। वह मेरे योगक्षेम के प्रति अत्यन्त चिन्तित रहती थीं, परन्तु पराधीन होने के कारण कुछ कर नहीं पाती थीं।
मैं भी अपनी माँ के स्नेह बन्धन में बँधकर उस ब्राह्मण-बस्ती में निवास करने लगा। मेरी आयु केवल पाँच वर्ष की थी। मुझे दिशा, देश तथा काल के सम्बन्ध में कुछ भी ज्ञान नहीं था। एक समय का वृत्तान्त है, रात्रिकाल में मेरी माँ गाय दुहने के लिये गौशाला में गयी हुयी थीं। मार्ग में उनका चरण एक विषधर सर्प से स्पर्श हो गया, जिससे उस सर्प ने उनको डस लिया। उस सर्प का इसमें भला क्या दोष? काल की ऐसी ही प्रेरणा थी। सर्पदंश से मेरी माता की मृत्यु हो गयी। मैंने समझा कि यह भी भक्तवत्सल भगवान विष्णु का एक अनुग्रह ही है। मुझे मातृवियोग का शोक अवश्य हुआ, किन्तु यह प्रसन्नता भी हुयी कि मेरे त्यागमार्ग की बड़ी बाधा दूर हो गयी। मैं अब निर्द्वन्द्व हो गया। तदुपरान्त मैं तपोवन में तपस्या करने के विचार से उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा।
यात्रा करते-करते मेरा शरीर एवं इन्द्रियाँ शिथिल हो गयीं। क्षुधा एवं तृष्णा भी मुझे मेरे मार्ग में कष्ट प्रदान कर रही थीं, किन्तु भगवद्भक्ति की शक्ति का इन सभी कष्टों पर शासन था। मार्ग में मुझे नदी एवं कुण्ड दिखायी दिये। मैंने कुण्ड में स्नान, आचमन एवं जलपान आदि किया, जिससे मेरा सम्पूर्ण श्रम मिट गया। उस सघन वन में पीपल के नीचे मैं आसन लगाकर बैठ गया। उन महात्माओं के श्रीमुख से श्रवण किये गये उपदेश के अनुसार मैं हृदय में निवास करने वाले परमात्मा के उसी स्वरूप का अन्तर्मन में ध्यान करने लगा। भक्तिभाव से वशीकृत चित्त द्वारा भगवान के श्रीचरणों का ध्यान करते ही भगवद्प्राप्ति की उत्कट कामना से मेरे नेत्रों से अश्रु छलछला उठे। उसी समय मेरे हृदय में भगवान प्रकट हो गये।
हे व्यासजी! उस समय प्रेम-भाव के वेग से मेरा रोम-रोम पुलकित हो उठा। हृदय अत्यन्त शान्त एवं शीतल हो गया। उस आनन्द के वेग में मैं इस प्रकार लीन हो गया कि मुझे अपना तनिक भी भान नहीं रहा। शोकों का नाश करने वाले भगवान के उस अलौकिक रूप का दर्शन कर मैं विकल गया तथा आसन से उठ खड़ा हुआ। मैंने पुनः उस स्वरूप का दर्शन करने का प्रयास किया, किन्तु मन को हृदय में समाहित करके बारम्बार उनके दर्शन की चेष्टा करने पर भी मुझे उनका दर्शन नहीं हुआ। मैं अतृप्त जीव के समान आतुर हो उठा।
इस प्रकार निर्जन वन में मुझे विकलतापूर्वक प्रयत्न करते देख स्वयं भगवान ने अत्यन्त गम्भीर एवं मधुर वाणी से मेरे शोक को शान्त करते हुये आकाशवाणी के माध्यम से मुझसे कहा - 'हे नारद! खेद है कि इस जन्म में तथा इस देह से अब तुम मेरा दर्शन नहीं कर सकोगे। जिनके कामादि मल भस्म नहीं होते, जिनकी वासनायें पूर्णतया शान्त नहीं हुयीं हैं, उन अज्ञानी योगियों को मेरा दर्शन अत्यन्त दुर्लभ है। हे निष्पाप बालक! तुम्हारे हृदय में मुझे प्राप्त करने की लालसा जागृत करने के लिये ही मैंने इस समय तुम्हें अपने रूप की झलक दिखायी है। मुझे प्राप्त करने की आकांक्षा से युक्त साधक धीरे-धीरे हृदय की सम्पूर्ण वासनाओं का भलीभाँति त्याग कर देता है।
अल्पकालीन सन्त-सेवा से ही तुम्हारी चित्तवृत्ति मुझमें स्थिर हो गयी है। अब तुम इस देह को त्यागकर मेरे पार्षद हो जाओगे। मुझे प्राप्त करने का तुम्हारा यह दृढ़ निश्चय कभी किसी प्रकार से भङ्ग नहीं होगा। समस्त सृष्टि में प्रलय हो जाने पर भी मेरी कृपा से तुम्हें मेरी स्मृति बनी रहेगी।' आकाश के समान अव्यक्त सर्वशक्तिमान महान परमात्मा इतना कहकर मौन हो गये। उनकी इस कृपा का अनुभव करके मैंने उन सर्वश्रेष्ठ भगवान को नतमस्तक प्रणाम किया।
उसी समय से मैं लज्जा-सङ्कोच आदि को त्यागकर भगवान के अत्यन्त रहस्यमय एवं मङ्गलमय मधुर नामों एवं लीलाओं का कीर्तन-स्मरण करने लगा। स्पृहा, अर्थात् कामना एवं मद-मत्सर मेरे हृदय से पहले ही निवृत्त हो चुके थे, अब मैं आनन्द से काल की प्रतीक्षा करता हुआ पृथ्वी पर विचरने लगा। मैं साधु-सेवा एवं भगवद्भजन द्वारा अपना शेष जीवन व्यतीत करने लगा।
व्यासजी! इस प्रकार भगवान की कृपा से मेरा हृदय शुद्ध हो गया, आसक्ति मिट गयी तथा मैं श्रीकृष्णपरायण हो गया। कुछ समय पश्चात् जिस प्रकार एकाएक वज्रपात होता है, उसी प्रकार यथासमय मेरी मृत्यु उपस्थित हुयी। शुद्ध भगवत्पार्षद देह प्राप्त होने का अवसर आने पर प्रारब्ध कर्म समाप्त हो जाने के कारण पाञ्चभौतिक शरीर नष्ट हो गया। तदुपरान्त मुझे दिव्य भगवत्पार्षद शरीर प्राप्त हुआ। गत कल्प तक मैं उसी पार्षद रूप में भगवान का कैङ्कर्य अर्थात् सेवा-शुश्रूषा करता रहा।
कल्प के अन्त में जिस समय भगवान नारायण एकार्णव अर्थात् प्रलय-कालीन समुद्र के जल में शयन करते हैं। उस समय उनके हृदय में शयन करने की इच्छा से इस सम्पूर्ण सृष्टि को समाहित कर ब्रह्माजी जब प्रवेश करने लगे, तब उनके श्वास के साथ मैं भी उनके हृदय में प्रवेश कर गया। एक सहस्र चतुर्युगी व्यतीत होने पर जब भगवान ब्रह्मा जागे तथा उन्होंने सृष्टि सृजन करने की कामना की, उस समय उनकी इन्द्रियों से मरीचि आदि ऋषियों सहित मैं भी प्रकट हो गया।
तभी से मैं भगवान की कृपा से वैकुण्ठ आदि में तथा तीनों लोकों में निर्बाध विचरण करता हूँ। जहाँ अन्यान्य ऋषियों एवं तपस्वियों की गति नहीं है, वहाँ त्रिलोकी में बाहर-भीतर-सर्वत्र मेरी अप्रतिहत अर्थात् निर्बाध गति है। भगवान की मुझ पर विशेष कृपा है तथा उनकी कृपा से ही मैं अखण्ड ब्रह्मचर्य धारण कर सर्वत्र पर्यटन करता हूँ। भगवान विष्णु के द्वारा वर्णित षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत तथा निषाद नाम से "सा रे ग म प धा नी" संगीत के साक्षात् ब्रह्मस्वरूप सात स्वरों एवं उनकी रागिनियों को मैं उनके द्वारा प्रदत्त इस स्वरब्रह्म से विभूषित वीणा की तान द्वारा लयबद्ध करता हूँ तथा संसार में विचरते हुये उनकी दिव्य लीलाओं का गायन करता हूँ।
वे प्रभु, जिनके चरणकमल समस्त तीर्थों के उद्गम स्थल हैं, जिनका यशोगान मुझे अत्यन्त प्रिय प्रतीत होता है, जब मैं उनकी लीला का गायन करता हूँ, तब वे प्रभु मानो आमन्त्रित आत्मीयजन की भाँति तुरन्त मेरे हृदय में प्रकट होकर दर्शन देते हैं। जिन लोगों का चित्त निरन्तर विषय-भोगों की कामना से आतुर है, उनके संसार रूपी अपार एवं अगाध भवसागर से पार होने के लिये भगवान की लीलाओं के कीर्तन रूपी नौका ही सर्वाधिक सुलभ एवं सर्वश्रेष्ठ साधन है। काम, क्रोध, लोभ एवं मोह आदि शत्रुओं से ग्रसित प्राणियों को हठयोग में वर्णित यम-नियम आदि द्वारा वैसी शान्ति नहीं प्राप्त होती, जैसी प्रत्यक्ष शान्ति की अनुभूति श्रीकृष्ण की सेवा से होती है।
हे व्यासजी! आप निष्पाप हैं! आपने मुझसे जो मेरे देवर्षि नारद के रूप में प्रतिष्ठित होने पर प्रश्न किया था, उसके उत्तर में मैंने स्वयं के जन्म का, साधना का तथा अपनी आत्मसन्तुष्टि का उपाय वर्णित कर दिया है।"
श्रीसूतजी कहते हैं - "शौनकादि ऋषियों! देवर्षि नारद ने व्यासजी से इस प्रकार कहकर प्रस्थान करने की अनुमति ली तथा वीणा-वादन करते हुये स्वच्छन्द विचरण हेतु वे चल पड़े। अहो! ये देवर्षि नारद धन्य हैं, क्योंकि ये शारङ्गपाणि भगवान की कीर्ति को अपनी वीणा पर गायन करते हुये स्वयं तो आनन्दमग्न होते ही हैं, साथ ही इस त्रिविध तापों से तप्त जगत् को भी आनन्दित करते रहते हैं।"
॥इस प्रकार श्रीमद्भागवतमहापुराण में वर्णित नारद जयन्ती कथा सम्पूर्ण होती है॥