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विष्णु अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् | पद्मपुराण वर्णित भगवान विष्णु 108 नाम स्तोत्रम्

DeepakDeepak

श्रीविष्णु अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

पद्मपुराण वर्णित भगवान विष्णु अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

श्रीविष्णु अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्, भगवान विष्णु को समर्पित सर्वाधिक प्रचलित स्तोत्रमों में से एक है। पद्मपुराण के उत्तर खण्ड में इस अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् का वर्णन प्राप्त होता है। इस स्तोत्र में भगवान विष्णु के 108 पवित्र नाम श्लोकबद्ध किये गये हैं। भगवान विष्णु के भक्त इस स्तोत्र का पाठ एकादशी के दिन विशेष रूप से करते हैं। दैनिक पूजन में विष्णु अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् का पाठ किया जाता है। भगवान विष्णु के पावन नामों से युक्त इस स्तोत्र का पाठ भक्तिपूर्वक करने से विष्णु जी के चरण कमलों के प्रति श्रद्धा एवं समर्पण में वृद्धि होती है।

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॥ ध्यानम् ॥

सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम्।

सहारवक्षःस्थलकौस्तुभश्रियं नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम्॥

॥ स्तोत्रम् ॥

अष्टोत्तरशतं नाम्नां विष्णोरतुलतेजसः।

यस्य श्रवणमात्रेण नरो नारायणो भवेत्॥1॥

विष्णुर्जिष्णुर्वषट्कारो देवदेवो वृषाकपिः।

दामोदरो दीनबन्धुरादिदेवोऽदितेः सुतः॥2॥

पुण्डरीकः परानन्दः परमात्मा परात्परः।

परशुधारी विश्वात्मा कृष्णः कलिमलापहः॥3॥

कौस्तुभोद्भासितोरस्को नरो नारायणो हरिः।

हरो हरप्रियः स्वामी वैकुण्ठो विश्वतोमुखः॥4॥

हृषीकेशोऽप्रमेयात्मा वराहो धरणीधरः।

वामनो वेदवक्ता च वासुदेवः सनातनः॥5॥

रामो विरामो विरतो रावणारी रमापतिः।

वैकुण्ठवासी वसुमान् धनदो धरणीधरः॥6॥

धर्मेशो धरणीनाथो ध्येयो धर्मभृतां वरः।

सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्॥7॥

सर्वगः सर्ववित् सर्वशरण्यः साधुवल्लभः।

कौसल्यानन्दनः श्रीमान् रक्षःकुलविनाशकः॥8॥

जगत्कर्ता जगद्धर्ता जगज्जेता जनार्तिहा।

जानकीवल्लभो देवो जयरूपो जलेश्वरः॥9॥

क्षीराब्धिवासी क्षीराब्धितनयावल्लभस्तथा।

शेषशायी पन्नगारिवाहनो विष्टरश्रवाः॥10॥

माधवो मथुरानाथो मोहदो मोहनाशनः।

दैत्यारिः पुण्डरीकाक्षो ह्यच्युतो मधुसूदनः॥11॥

सोमः सूर्याग्निनयनो नृसिंहो भक्तवत्सलः।

नित्यो निरामयः शुद्धो नरदेवो जगत्प्रभुः॥12॥

हयग्रीवो जितरिपुरुपेन्द्रो रुक्मिणीपतिः।

सर्वदेवमयः श्रीशः सर्वाधारः सनातनः॥13॥

सौम्यः सौम्यप्रदः स्रष्टा विष्वक्सेनो जनार्दनः।

यशोदातनयो योगी योगशास्त्रपरायणः॥14॥

रुद्रात्मको रुद्रमूर्ती राघवो मधुसूदनः।

इति ते कथितं दिव्यं नाम्नामष्टोत्तरं शतम्॥15॥

सर्वपापहरं पुण्यं विष्णोरमिततेजसः।

दुःखदारिद्र्यदौर्भाग्यनाशनं सुखवर्धनम्॥16॥

सर्वसम्पत्करं सौम्यं महापातकनाशनम्।

प्रातरुत्थाय विप्रेन्द्र पठेदेकाग्रमानसः।

तस्य नश्यन्ति विपदां राशयः सिद्धिमाप्नुयात्॥17॥

॥ इति श्रीपद्मपुराणे उत्तरखण्डे श्रीविष्णोरष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
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