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जयन्ती महाद्वादशी

DeepakDeepak

जयन्ती महाद्वादशी

जयन्ती महाद्वादशी

हिन्दु पञ्चाङ्ग के अनुसार सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक द्वादशी तिथि एवं पुनर्वसु नक्षत्र का संयोग होने पर वह जयन्ती महाद्वादशी के नाम से जानी जाती है। विभिन्न धर्मग्रन्थों में इस द्वादशी के लिये कृष्ण या शुक्ल पक्ष के विषय में मतान्तर प्राप्त होता है। अतः द्रिक पञ्चाङ्ग शुक्ल पक्ष एवं कृष्ण पक्ष दोनों के लिये जयन्ती महाद्वादशी के दिन सूचिबद्ध करता है।

यदि एकादशी एवं द्वादशी एक ही दिन हों तो दोनों का उपवास एक ही दिन करके अगले दिन पारण करना चाहिये। ऐसा करने से दोनों व्रतों का पुण्यफल प्राप्त होता है।

किन्तु एकादशी एवं द्वादशी के पृथक-पृथक होने पर भगवान विष्णु के परम भक्तों एवं सामर्थ्यवान मनुष्यों को दोनों दिन उपवास करना चाहिये। जो भक्त असमर्थ अथवा शक्तिहीन हैं, उनको प्रथम दिवस, अर्थात् एकादशी को फलाहार तथा द्वितीय दिवस, अर्थात् द्वादशी को निराहार व्रत का पालन करना चाहिये। ऐसा करने से एकादशी का पारण न करने का दोष नहीं लगता है, क्योंकि दोनों व्रतों के देवता एक ही हैं।

मतान्तर से तथा वैष्णव परम्परा से कुछ विष्णु भक्त एकादशी को त्याग कर, केवल द्वादशी का व्रत करते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि द्वादशी व्रत का उल्लङ्घन नहीं करना चाहिये। हालाँकि धर्मसिन्धु में प्राप्त व्याख्या के अनुसार एकादशी व्रत का सम्पूर्ण त्याग नहीं करना चाहिये, अर्थात् एकादशी का त्याग करने के पश्चात् भी उस दिन अन्न भक्षण कदापि नहीं करना चाहिये।

धर्मसिन्धु में प्राप्त वर्णन के अनुसार शुक्लपक्ष की द्वादशी तिथि का संयोग पुनर्वसु नक्षत्र से होने पर जयन्ती महाद्वादशी का व्रत किया जाता है। जयन्ती महाद्वादशी हिन्दु धर्मग्रन्थों में वर्णित आठ महाद्वादशी तिथियों में से एक है। यह आठ महाद्वादशी उन्मीलिनी, वञ्जुली, त्रिस्पृशा, पक्षवर्धिनी, जया, विजया, जयन्ती तथा पापनाशिनी के नाम से जानी जाती है। जयन्ती महाद्वादशी व्रत करने वाले व्रती को सभी व्रतों का पुण्यफल सहज ही प्राप्त हो जाता है।

नारदपुराण एवं बृहन्नारदीयपुराण आदि धर्मग्रन्थों में प्राप्त वर्णन के अनुसार शुक्ल पक्ष की द्वादशी का संयोग प्रजापति नक्षत्र, अर्थात् रोहिणी नक्षत्र से होने पर उसे जयन्ती द्वादशी कहा जाता है। जयन्ती महाद्वादशी के समय मनुष्यों को सिद्धि प्रदान करने वाले भगवान वामन की पूजा-अर्चना करनी चाहिये। यह दिव्य तिथि पर उपवास करने से सम्पूर्ण व्रतों का फल प्रदान करती है, समस्त दानों का पुण्य प्रदान करती है तथा भोग एवं मोक्ष प्रदायक है।

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