धर्मसिन्धु एवं निर्णयसिन्धु आदि धर्मग्रन्थों में प्राप्त उल्लेख के अनुसार सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक द्वादशी तिथि एवं रोहिणी नक्षत्र का संयोग होने पर पापनाशिनी महाद्वादशी व्रत किया जाता है। उपरोक्त ग्रन्थों में इस द्वादशी के लिये कृष्ण या शुक्ल पक्ष के विषय में स्पष्ट उल्लेख नहीं है। अतः द्रिक पञ्चाङ्ग शुक्ल पक्ष एवं कृष्ण पक्ष दोनों के लिये पापनाशिनी महाद्वादशी के दिन सूचिबद्ध करता है।
यदि एकादशी एवं द्वादशी एक ही दिन हों तो दोनों का उपवास एक ही दिन करके अगले दिन पारण करना चाहिये। ऐसा करने से दोनों व्रतों का पुण्यफल प्राप्त होता है।
किन्तु एकादशी एवं द्वादशी के पृथक-पृथक होने पर भगवान विष्णु के परम भक्तों एवं सामर्थ्यवान मनुष्यों को दोनों दिन उपवास करना चाहिये। जो भक्त असमर्थ अथवा शक्तिहीन हैं, उनको प्रथम दिवस, अर्थात् एकादशी को फलाहार तथा द्वितीय दिवस, अर्थात् द्वादशी को निराहार व्रत का पालन करना चाहिये। ऐसा करने से एकादशी का पारण न करने का दोष नहीं लगता है, क्योंकि दोनों व्रतों के देवता एक ही हैं।
मतान्तर से तथा वैष्णव परम्परा से कुछ विष्णु भक्त एकादशी को त्याग कर, केवल द्वादशी का व्रत करते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि द्वादशी व्रत का उल्लङ्घन नहीं करना चाहिये। हालाँकि धर्मसिन्धु में प्राप्त व्याख्या के अनुसार एकादशी व्रत का सम्पूर्ण त्याग नहीं करना चाहिये, अर्थात् एकादशी का त्याग करने के पश्चात् भी उस दिन अन्न भक्षण कदापि नहीं करना चाहिये।
हिन्दु धर्म में व्रत अथवा उपवास का विशेष महत्त्व माना जाता है। धर्मग्रन्थों में भिन्न-भिन्न मनोरथों की सिद्धि हेतु किये जाने वाले नाना प्रकार के व्रतों का वर्णन प्राप्त होता है। उन्हीं व्रतों में से द्वादशी व्रत भी हिन्दु धर्मावलम्बियों के मध्य अत्यन्त लोकप्रिय है।
यूँ तो वर्ष पर्यन्त प्रत्येक द्वादशी को व्रत की अपनी विशेष महिमा है, किन्तु उनमें से भी आठ द्वादशी व्रत के संयोग अत्यन्त दुर्लभ हैं, जिन्हें अष्ट महाद्वादशी कहा जाता है। उन्मीलिनी, वञ्जुली, त्रिस्पृशा, पक्षवर्धिनी, जया, विजया, जयन्ती तथा पापनाशिनी नामक यह आठ द्वादशी व्रत सभी व्रतों में श्रेष्ठ एवं महापुण्यशाली माने जाते हैं। इन्हीं महाद्वादशी तिथियों में से एक पापनाशिनी महाद्वादशी भी है, जिसके माहात्म्य का वर्णन विभिन्न हिन्दु धर्मग्रन्थों में प्राप्त होता है।