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श्री पशुपति अष्टकम् | श्री पशुपत्यष्टकम् - संस्कृत गीतिकाव्य एवं वीडियो गीत

DeepakDeepak

श्री पशुपति अष्टकम्

श्री पशुपति अष्टकम् को श्री पशुपत्यष्टकम् के नाम से भी जाना जाता है। यह एक अत्यन्त लोकप्रिय अष्टकम् है जो भगवान शिव के पशुपति रूप को समर्पित है। भक्तगण शिवरात्रि सहित भगवान शिव से सम्बन्धित विभिन्न अवसरों पर इस अष्टकम् का पाठ करते हैं। शिव जी की प्रसन्नता हेतु नियमित रूप से दैनिक पूजन में श्री पशुपत्यष्टकम् का पाठ किया जाता है।

॥ श्री पशुपत्यष्टकम् ॥

॥ ध्यानम् ॥

ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं

रत्नाकल्पोज्ज्वलाङ्गं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्।

पद्मासीनं समन्तात्स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं

विश्वाद्यं विश्वबीजं निखिलभयहरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम्॥

॥ अथ स्तोत्रम् ॥

पशुपतिं द्युपतिं धरणीपतिं भुजगलोकपतिं च सतीपतिम्।

प्रणतभक्तजनार्तिहरं परं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम्॥1॥

न जनको जननी न च सोदरो न तनयो न च भूरिबलं कुलम्।

अवति कोऽपि न कालवशं गतं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम्॥2॥

मुरजडिण्डिमवाद्यविलक्षणं मधुरपञ्चमनादविशारदम्।

प्रमथभूतगणैरपि सेवितं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम्॥3॥

शरणदं सुखदं शरणान्वितं शिव शिवेति शिवेति नतं नृणाम्।

अभयदं करुणावरुणालयं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम्॥4॥

नरशिरोरचितं मणिकुण्डलं भुजगहारमुदं वृषभध्वजम्।

चितिरजोधवलीकृतविग्रहं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम्॥5॥

मखविनाशकरं शशिशेखरं सततमध्वरभाजिफलप्रदम्।

प्रलयदग्धसुरासुरमानवं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम्॥6॥

मदमपास्य चिरं हृदि संस्थितं मरणजन्मजराभयपीडितम्।

जगदुदीक्ष्य समीपभयाकुलं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम्॥7॥

हरिविरञ्चिसुराधिपपूजितं यमजनेशधनेशनमस्कृतम्।

त्रिनयनं भुवनत्रितयाधिपं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम्॥8॥

पशुपतेरिदमष्टकमद्भुतं विरचितं पृथिवीपतिसूरिणा ।

पठति संश‍ृणुते मनुजः सदा शिवपुरीं वसते लभते मुदम्॥9॥

॥ इति श्रीपृथिवीपतिसूरिविरचितं श्रीपशुपत्यष्टकम् सम्पूर्णम् ॥
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