
टिप्पणी: सभी समय १२-घण्टा प्रारूप में लँकेस्टर, संयुक्त राज्य अमेरिका के स्थानीय समय और डी.एस.टी समायोजित (यदि मान्य है) के साथ दर्शाये गए हैं।
आधी रात के बाद के समय जो आगामि दिन के समय को दर्शाते हैं, आगामि दिन से प्रत्यय कर दर्शाये गए हैं। पञ्चाङ्ग में दिन सूर्योदय से शुरू होता है और पूर्व दिन सूर्योदय के साथ ही समाप्त हो जाता है।
द्वादशी श्राद्ध परिवार के उन मृतक सदस्यों के लिये किया जाता है, जिनकी मृत्यु द्वादशी तिथि पर हुयी हो। इस दिन शुक्ल पक्ष अथवा कृष्ण पक्ष दोनों ही पक्षों की द्वादशी तिथि का श्राद्ध किया जा सकता है। जो लोग मृत्यु से पूर्व सन्यास ग्रहण कर लेते हैं, उनके श्राद्ध के लिये भी द्वादशी तिथि उपयुक्त मानी जाती है।
द्वादशी श्राद्ध को बारस श्राद्ध के नाम से भी जाना जाता है।
पितृ पक्ष श्राद्ध पार्वण श्राद्ध होते हैं। इन श्राद्धों को सम्पन्न करने के लिये कुतुप, रौहिण आदि मुहूर्त शुभ मुहूर्त माने गये हैं। अपराह्न काल समाप्त होने तक श्राद्ध सम्बन्धी अनुष्ठान सम्पन्न कर लेने चाहिये। श्राद्ध के अन्त में तर्पण किया जाता है।
द्वादशी श्राद्ध पितृ पक्ष की द्वादशी तिथि को सम्पन्न किया जाने वाला श्राद्ध अनुष्ठान है। हिन्दु धर्मशास्त्रों में प्राप्त वर्णन के अनुसार श्राद्ध कर्म उसी तिथि को करना श्रेयस्कर होता है, जिस तिथि को पितर का निधन हुआ हो। अतः जिन पितरों का देहावसान शुक्ल अथवा कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को हुआ हो, उनके निमित्त पितृ पक्ष की द्वादशी तिथि को श्राद्ध, तर्पण एवं पिण्डदान करना चाहिये।
धर्मग्रन्थों में यह भी उल्लेख मिलता है कि द्वादशी श्राद्ध विशेष रूप से उन पितरों के लिये किया जाता है जिन्होंने धर्ममय, भक्तिपूर्ण तथा सात्विक जीवन व्यतीत करने हेतु सन्यास ग्रहण कर लिया हो। विशेषकर वैष्णव परम्परा से सम्बन्ध रखने वाले पितरों का श्राद्ध इस दिन करना अत्यन्त फलदायक माना गया है। इसीलिये द्वादशी श्राद्ध को सन्यासी श्राद्ध भी कहा जाता है। मान्यताओं के अनुसार इस दिन किया गया श्राद्ध कर्म पितरों की आत्मा को विष्णुलोक की प्राप्ति कराता है तथा उन्हें परम शान्ति प्रदान करता है।
विष्णु-धर्मसूत्र के अनुसार, द्वादशी के दिन ब्राह्मण भोज, वस्त्रदान, पात्रदान तथा भगवान विष्णु के नाम का स्मरण करते हुये श्राद्ध अनुष्ठान करने से श्रेष्ठ फल प्राप्त होता है। इस दिन यथाशक्ति श्री विष्णुसहस्रनाम का पाठ भी अवश्य करना चाहिये।
यदि किसी पितृ की मृत्यु की निश्चित तिथि ज्ञात न हो, तो सर्वपितृ अमावस्या के दिन सामूहिक श्राद्ध करने का विधान धर्मशास्त्रों में वर्णित है। तथापि, द्वादशी तिथि को दिवंगत हुये पितरों का श्राद्ध द्वादशी तिथि पर ही करना पूर्ण फलदायी माना गया है। द्वादशी श्राद्ध न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, अपितु यह पितृभक्ति, पारिवारिक दायित्व एवं आत्मिक चेतना की अभिव्यक्ति है। यह कर्म न केवल पितृगणों को तृप्त करता है, अपितु वंशजों के जीवन में सुख, समृद्धि एवं आध्यात्मिक उन्नति भी प्रदान करता है।