श्रीरामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड में प्राप्त वर्णन के अनुसार माता सीता की खोज करते हुये हनुमान जी लङ्का पहुँच जाते हैं। वहाँ उनकी भेंट विभीषण जी से होती है। विभीषण जी से परिचय एवं कुशल-क्षेम पूछने के पश्चात् हनुमान जी कहते हैं - "हे भ्राता! मैं माता जानकी का दर्शन करना चाहता हूँ।" तब विभीषण जी ने माता सीता लङ्का में किस अवस्था में एवं किस स्थान पर हैं, इसका वर्णन हनुमान जी के समक्ष किया। विभीषण जी ने माता के दर्शन के समस्त युक्तियाँ बतायीं। विभीषण जी से माता के विषय में ज्ञात करने के पश्चात् उनसे विदा लेकर हनुमान जी मसक अर्थात् मच्छर के समान रूप धारण कर अशोकवन के उस क्षेत्र की ओर चल दिये, जहाँ माता सीता विराजमान थीं।
हनुमान जी ने देखा कि अशोकवन में स्थित एक वाटिका में माता सीता विराजमान हैं। उनका दर्शन कर हनुमान जी ने उन्हें मन ही मन प्रणाम किया। माता का शरीर जीर्ण-क्षीर्ण हो गया है। उनके शीश पर जटाओं की एक वेणी अर्थात् चोटी है। वे निरन्तर हृदय में श्रीरघुनाथजी का स्मरण करती रहती हैं। उन्हें बैठे ही बैठे रात्रि के चारों पहर व्यतीत हो जाते हैं।
श्रीजानकीजी नेत्रों को अपने चरणों में लगाये हुये नीचे की ओर देख रही हैं तथा उनका मन श्रीरामजी के चरणकमलों में लीन है। जानकीजी को इस दीन-दुखी अवस्था में देख पवनपुत्र हनुमान जी अत्यन्त व्यथित हुये। हनुमान जी अशोक वृक्ष के पत्तों में छिपकर माता का दर्शन करते हुये विचार करने लगे कि हे प्रभो! क्या करूँ, मैं माता के कष्ट का निवारण किस प्रकार करूँ? उसी समय अनेक स्त्रियों सहित अलङ्कृत होकर लङ्कापति रावण वहाँ उपस्थित हुआ। वह दुष्ट रावण नाना प्रकार से साम, दान, भय एवं भेद द्वारा सीताजी को समझाने लगा।
रावण ने देवी सीता से कहा - "हे सुमुखि! मन्दोदरी आदि सभी रानियों को मैं तुम्हारी दासी बना दूँगा, यह मेरा प्रण है। तुम एक बार मेरी ओर देखो तो सही।"
अपने परम स्नेही कोसलाधीश श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण करके जानकीजी तिनके की आड़ करके बोलीं - "हे दशमुख! जुगनू के प्रकाश से कमलिनी नहीं खिल सकती, यदि मेरे स्वामी सूर्य हैं तो तू मात्र एक जुगनू ही है। तू अभी श्रीरघुनाथजी के बाहुबल से परिचित नहीं है।"
देवी सीता के कठोर वचनों को सुनकर तथा स्वयं की तुलना जुगनू से एवं श्रीरामचन्द्रजी को सूर्य के समान सुनकर रावण ने क्रोधवश शस्त्र निकालते हुये बोला - "सीता! तूने मेरा अपमान किया है। मैं इस खड्ग से तेरा शीश काट दूँगा। तू शीघ्र ही मेरा प्रस्ताव स्वीकार कर ले, अन्यथा तेरी जीवनलीला समाप्त हो जायेगी।"
माता सीता कहती हैं - "हे दशग्रीव! या तो मेरे कण्ठ में मेरे प्रभु की सुन्दर एवं विशाल भुजा पड़ेगी या तेरे भीषण खड्ग। रे शठ! यही मेरा अटल प्रण है।"
सीताजी के वचन सुनते ही रावण उनकी ओर आक्रमण करने हेतु दौड़ा। उसी समय रावण की धर्मपत्नी मन्दोदरी ने नीतिपूर्वक वचनों से उसे समझाया। तदुपरान्त रावण ने भयानक राक्षसियों को यह आदेश देते हुये कहा - "हे राक्षसियों! इस सीता को विविध प्रकार से कष्ट देकर भयभीत करो। यदि ये एक माह में मेरा प्रस्ताव स्वीकार नहीं करती है, तो मैं इसका वध कर दूँगा।" ऐसा कहकर रावण अपने महल में चला गया तथा सभी राक्षसियाँ भीषण रूप धारण कर सीताजी को भयभीत करने लगीं।
उन राक्षसियों में त्रिजटा नाम की एक अत्यन्त ज्ञानी राक्षसी थी। वह श्रीरामचन्द्रजी की अनन्य भक्त थी। त्रिजटा ने सभी को अपना एक स्वप्न सुनाते हुये कहा - "सीताजी की सेवा करके अपना कल्याण कर लो। मैंने स्वप्न में देखा कि एक वानर ने लङ्का दहन करके राक्षसों की समस्त सेना का संहार कर दिया है। रावण नग्न एवं केश-विहीन अवस्था में गदर्भ अर्थात् गधे पर सवार है तथा उसकी बीसों भुजायें कटी हुयी हैं। इस प्रकार रावण दक्षिण में यमपुरी की ओर प्रस्थान कर रहा है तथा लङ्का का साम्राज्य विभीषण को प्राप्त हो गया है। नगर में श्रीरामचन्द्रजी का उद्घोष हो रहा है तथा उन्होंने सीताजी को बुलावा भेजा है। मैं निश्चय ही विश्वासपूर्वक कहती हूँ कि यह स्वप्न चार दिनों में अवश्य ही सत्य सिद्ध होगा।"
त्रिजटा के वचन सुनकर वे सभी राक्षसियाँ भयभीत हो गयीं तथा जानकीजी के चरणों में नमन करने लगीं। सीताजी मन में विचार करने लगीं कि एक माह व्यतीत होने पर यह नीच राक्षस रावण मेरा वध करेगा।
सीताजी हाथ जोड़कर त्रिजटा से बोलीं - "हे माता! तू मेरी विपत्ति की संगिनी है। शीघ्र ही कोई ऐसा उपाय कर जिससे मैं देह त्याग सकूँ। मेरे लिये यह विरह असहनीय हो गया है। कहीं से काठ लाकर मेरी चिता बना दे। हे माता! अनन्तर उसमें अग्नि प्रज्वलित कर दे। इस प्रकार तू मेरी प्रीति को सत्य सिद्ध कर दे। मैं रावण की शूल के समान दुःख देने वाली वाणी सहन नहीं कर सकती।"
सीताजी के वचन सुनकर त्रिजटा ने उनके चरण पकड़कर उन्हें समझाया एवं प्रभु का प्रताप, बल एवं सुयश का महिमामण्डन किया। उसने कहा - "हे सुकुमारी! सुनो, रात्रि के समय अग्नि नहीं प्राप्त होगी।" ऐसा कहकर वह अपने घर चली गयी।
सीताजी मन-ही-मन कहने लगीं - "हे प्रभो! मैं क्या करूँ? विधाता ही विपरीत हो गया। न अग्नि मिलेगी, न पीड़ा मिटेगी। हे अशोकवृक्ष! मेरी विनती सुन! मेरा शोक हर ले तथा अपना अशोक नाम सत्य सिद्ध कर। तेरे नये-नये कोमल पत्ते अग्नि के समान हैं। अग्नि प्रदान कर, विरह रोग का अन्त कर अर्थात् विरह-रोग को बढ़ाकर सीमा तक न पहुँचा।"
सीताजी को इस प्रकार विरह से व्याकुल होता देखकर हनुमान जी को अत्यन्त पीड़ा हुयी। तब उन्होंने हृदय में विचारकर माता सीता के समक्ष श्रीरामजी की मुद्रिका डाल दी। देवी सीता ने समझा कि अशोकवृक्ष ने अङ्गारा प्रदान किया है तथा हर्षित होकर मुद्रिका को उठा लिया।
माता सीता ने राम-नाम से अङ्कित अत्यन्त सुन्दर एवं मनोहर मुद्रिका देखी। उसे पहचानकर सीताजी आश्चर्यचकित होकर उसे देखने लगीं तब हर्ष एवं विषाद से उनका हृदय अकुलाने लगा। वे विचार करने लगीं कि श्रीरघुनाथजी तो सर्वथा अजेय हैं, उन्हें कौन परास्त कर सकता है? तथा माया से ऐसी मुद्रिका निर्मित करना असम्भव है। सीताजी मन ही मन अनेक प्रकार के विचार कर रही थीं।
उसी समय हनुमान जी अशोकवृक्ष पर बैठे हुये मधुर स्वर में श्रीरामचन्द्रजी के गुणों का वर्णन करने लगे। श्रीरामजी की महिमा का बखान सुनकर सीताजी का दुःख दूर हो गया। वे ध्यानपूर्वक मन लगाकर रामकथा का श्रवण करने लगीं। हनुमान जी ने आरम्भ से लेकर सम्पूर्ण रामकथा माता को कह सुनायी।
कथा श्रवण कर माता सीता बोलीं - "हे भाई! जिसने अमृत रूप यह सुन्दर कथा सुनायी, वह मेरे समक्ष प्रकट क्यों नहीं होता?" यह सुनकर हनुमान जी उनके समक्ष प्रकट हो गये। हनुमान जी को देखकर सीताजी पुनः मुख फेरकर बैठ गयीं। यह देखकर हनुमान जी के मन में आश्चर्य हुआ।
उस समय हनुमान जी कहते हैं - "हे माता जानकी! मैं श्रीरामजी का दूत हूँ। मैं अपने स्वामी की सत्य शपथ लेकर कहता हूँ कि यह मुद्रिका मैं ही लाया हूँ। श्रीरामजी ने मुझे आपके लिये सहिदानी अर्थात् स्मृतिचिह्न प्रदान किया है।"
माता सीता ने जिज्ञासा प्रकट करते हुये पूछा - "हे वत्स! नर एवं वानर का सङ्ग किस प्रकार हुआ? अतः तुम्हारी श्रीरामजी से भेंट कैसे हुयी?" तदनन्तर हनुमान जी ने श्रीरामजी से भेंट का सम्पूर्ण वृत्तान्त वर्णित किया। हनुमान जी के प्रेमपूर्ण वचन सुनकर सीताजी के मन में विश्वास उत्पन्न हो गया। उन्हें यह ज्ञात हो गया कि हनुमान जी मन, कर्म एवं वचन से श्रीरघुनाथजी के दास हैं।
हनुमान जी ने जब अशोक वाटिका में विराजमान माता सीता को श्रीरामजी की मुद्रिका प्रदान की थी, वह चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी का ही पावन दिन था। उसी समय से समस्त लोकों में यह दिन अशोक अष्टमी के रूप में प्रसिद्ध हो गया। इस दिन अशोकवृक्ष का पूजन एवं व्रत किया जाता है। इस व्रत में अशोक वृक्ष की कलिकाओं का सेवन किया जाता है। मान्यताओं के अनुसार इस दिन अशोक की कलियों के रस का पान करने से शरीर के समस्त रोग नष्ट हो जाते हैं।
॥इस प्रकार श्रीरामचरितमानस में वर्णित अशोक अष्टमी व्रत कथा सम्पूर्ण होती है॥