श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के षट्षष्टितम् सर्ग में प्राप्त वर्णन के अनुसार प्रातःकाल महामुनि विश्वामित्र, भगवान श्रीराम एवं श्रीलक्ष्मणजी के दर्शन होने पर उनका स्वागत-सत्कार एवं पूजन आदि करके राजा जनक कहते हैं - "हे महामुने! आपका हार्दिक स्वागत है, कृपया मुझे आज्ञा दें कि मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?"
राजा जनक के स्नेहपूर्ण वचन सुनकर महर्षि विश्वामित्र कहते हैं - "हे राजन्! ये राजा दशरथ के परम वीर क्षत्रिय पुत्र हैं, जिनकी कीर्ति सम्पूर्ण विश्व में है। ये आपके श्रेष्ठ धनुष का दर्शन करना चाहते हैं। आप उस धनुष का दर्शन इन्हें करा दीजिये। उस दिव्य धनुष के दर्शन से सन्तुष्ट होकर ये अपनी राजधानी को लौट जायेंगे।"
मुनि विश्वामित्र के ऐसा कहने पर राजा जनक कहते हैं - "हे मुनिश्रेष्ठ! इस धनुष से सम्बन्धित वृत्तान्त एवं उसको यहाँ रखने के उद्देश्य का श्रवण कीजिये, मैं तदनुसार वर्णन करता हूँ। हे भगवन्! मिथिला के राजा निमि के ज्येष्ठ पुत्र राजा देवरात के नाम से विख्यात थे। उन्हीं महात्मा देवरात को यह धनुष धरोहर के रूप में प्राप्त हुआ था। भगवान शिव के द्वारा त्रिपुरासुर का वध करने के उपरान्त देवताओं ने यह धनुष उन्हें सौंप दिया था।
किम्वदन्ती है कि पूर्वकाल में दक्ष-यज्ञ के विध्वंस के समय परम बलशाली भगवान शिव ने खेल-खेल में ही क्रोधपूर्वक इस धनुष को उठाकर देवताओं से कहा - 'हे देवगणों! मैं यज्ञ में भाग प्राप्त करने का इच्छुक था, किन्तु तुम लोगों ने मुझे यज्ञ-भाग प्रदान नहीं किया। इसीलिये मैं इस धनुष से तुम सभी को मस्तकविहीन कर दूँगा।'
यह सुनकर समस्त देवगण व्याकुल हो गये तथा स्तुति-गायन करते हुये देवाधिदेव महादेव को प्रसन्न करने का प्रयास करने लगे। अन्ततः भगवान शिव देवताओं की प्रार्थना से प्रसन्न हो गये। प्रसन्न होकर शिव जी ने वह अलौकिक धनुष देवताओं को प्रदान कर दिया। यह वही देवाधिदेव भगवान शिव का दुर्लभ धनुष-रत्न है, जो देवताओं ने मेरे पूर्वज राजा देवरात को धरोहर के रूप में प्रदान किया था।"
तदुपरान्त राजा जनक पुनः कहते हैं - "हे मुनिवर! पूर्वकाल में एक दिन मैं यज्ञ की कामना से भूमिशोधन करते हुये खेतों में हल चला रहा था। उसी समय हल के अग्रभाग से जोती गयी भूमि से एक अलौकिक दिव्य कन्या प्रकट हुयी। जोती गयी भूमि को सीता कहा जाता है, इसीलिये हल द्वारा खींची गयी रेखा से उत्पन्न होने के कारण उस कन्या का नाम भी सीता रखा गया। भूमि से प्रकट हुयी मेरी कन्या सीता कालान्तर में अत्यन्त सुन्दर, शीलवती, पतिव्रता एवं धर्मपरायण युवती हुयी। मैंने अपनी इस अयोनिजा कन्या के विषय में यह निर्णय किया था कि जो भी वीर अपने बाहुबल एवं पराक्रम से इस धनुष की प्रत्यञ्चा चढ़ा देगा, उसी से मैं इसका विवाह करूँगा।
इस प्रकार मैंने अपनी परम पराक्रमी पुत्री का लालन-पालन किया। हे मुनिश्रेष्ठ! भूमि से प्रकट होकर निरन्तर वृद्धि करने वाली मेरी पुत्री सीता को प्राप्त करने हेतु अनेक राजाओं ने मुझसे याचना की, किन्तु मैंने कन्या का वरण करने वाले उन राजाओं से कहा कि मेरी कन्या वीर्यशुल्का अर्थात् उचित पराक्रम प्रकट करने पर ही कोई पुरुष उससे विवाह करने के योग्य हो सकता है। यही कारण है कि मैंने अभी तक कन्यादान नहीं किया है।"
तदनन्तर राजा जनक से शिव धनुष का माहात्म्य ज्ञात करने के उपरान्त सीता स्वयंवर में भगवान श्रीराम ने धनुष भङ्ग करके देवी सीता का वरण किया था।
॥इस प्रकार श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण में वर्णित श्रीजानकी जन्म कथा सम्पूर्ण होती है॥