कल्कि अवतार, भगवान विष्णु का एक मात्र ऐसा अवतार है, जो अभी हुआ नहीं है, अपितु भविष्य में होने वाला है। हिन्दु धर्म के अनुसार वर्तमान कलियुग के अन्त में श्रावण शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को भगवान विष्णु, कल्कि भगवान के रूप में अवतरित होंगें। वैष्णवों के मध्य इस दिन को कल्कि जयन्ती के रूप में मनाया जाता है।

श्रीमद्भागवतम् एवं कल्किपुराण सहित विभिन्न धर्मग्रन्थों में भगवान कल्कि के सम्बन्ध में वर्णन प्राप्त होता है। भगवान कल्कि का अवतार विद्वानों के मध्य भी अत्यन्त विशेष चर्चा का विषय है तथा समय-समय पर इस अवतार सम्बन्धित विभिन्न मत विद्वानों द्वारा साझा किये जाते हैं।
श्रीमद्भागवत-महापुराण के 12वें स्कन्द में निम्नलिखित श्लोक द्वारा कल्कि अवतार की पुष्टि की गयी है,
सम्भलग्राममुख्यस्य ब्राह्मणस्य महात्मनः।
भवने विष्णुयशसः कल्किः प्रादुर्भविष्यति॥
अर्थात्, शम्भल नामक ग्राम में विष्णुयश नाम के एक ब्राह्मण होंगे। वह अति उदार हृदय एवं भक्तिभाव वाले होंगे। उन्हीं विष्णुयश नामक ब्राह्मण की पत्नी के गर्भ से भगवान कल्कि रूप में अवतरित होंगे।
कल्किपुराण में प्राप्त वर्णन के अनुसार भगवान कल्कि, भगवान परशुराम जी को गुरु रूप में स्वीकार करके उनसे युद्ध कौशल की शिक्षा ग्रहण करेंगे। तदुपरान्त भगवान कल्कि, भगवान शिव की तपस्या करके उनसे दिव्यास्त्र आदि प्राप्त करेंगे। ऋषि याज्ञवलक्य जी कल्कि भगवान के पुरोहित होंगे।
कल्किपुराण में भगवान कल्कि के जन्म का विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है, जिसके अनुसार, कलियुग के अन्त एवं सतयुग के आरम्भ में शम्भल नामक ग्राम में विष्णुयश नाम के एक ब्राह्मण होंगें। जिनका विवाह सुमति नाम की स्त्री से होगा। विष्णुयश एवं सुमति दोनों ही अत्यन्त धर्म पारायण एवं मांगलिक कर्मों को करने वाले होंगे। भगवान कल्कि सुमति के गर्भ से पुत्र रूप में प्रकट होंगे। भगवान कल्कि के तीन अन्य भ्राता भी होंगे, जो क्रमशः सुमन्त, प्राज्ञ एवं कवि के नाम से समस्त लोकों में विख्यात होंगे। कल्कि भगवान अपनी अल्पायु में ही वेद, पुराण, शास्त्र आदि धर्मग्रन्थों का अध्ययन करेंगे तथा प्रकाण्ड पण्डित के रूप में प्रतिष्ठित होंगे।
तदुपरान्त कलियुग के प्रभाव से आहत समस्त प्राणियों की पीड़ा का शमन करने हेतु भगवान कल्कि, महादेव की उपासना करेंगे एवं उनसे अस्त्रविद्या प्राप्त करेंगे। तत्पश्चात् अपने तीनों भ्राताओं सहित भगवान कल्कि धर्म की पुनर्स्थापना करेंगे।
भगवान कल्कि का एक विवाह बृहद्रथ की पुत्री पद्मादेवी से होगा तथा दूसरा विवाह देवी रमा से होगा। देवी रमा, वैष्णो देवी के रूप में भगवान विष्णु का वरण करने हेतु प्रतीक्षा कर रही हैं। कल्कि भगवान की दोनों पत्नियों से, उन्हें जय, विजय, मेघमाल तथा बलाहक नाम के पुत्र रत्न प्राप्त होंगे। भगवान कल्कि अश्व पर आरूढ़ होकर, तलवार से शत्रुओं का संहार करेंगे। उनके अश्व का नाम देवदत्त होगा। भगवान कल्कि नन्दक एवं रत्नत्सरू नामक खड्ग, सारङ्ग नामक धनुष, कुमौदिकी नामक गदा तथा पाञ्चजन्य नामक शङ्ख धारण करेंगे।
कल्कि अवतार में भगवान, जयत्र एवं गारूड़ी नामक रथ पर आरूढ़ होंगे। उनके सारथी का नाम दारूक होगा। इस प्रकार भगवान कल्कि विश्व का कल्याण करने हेतु अवतरित होंगे।
भगवान कल्कि के पिता का नाम विष्णुयश एवं माता का नाम देवी सुमति होगा। उनके तीन भ्राता होंगे, जिनका नाम सुमन्त, प्राज्ञ एवं कवि होगा। कल्कि भगवान की पद्मा देवी एवं रमा देवी नाम की दो धर्म पत्नियाँ होंगी। धर्मग्रन्थों में देवी पद्मा को देवी लक्ष्मी तथा देवी रमा को वैष्णो देवी के अवतार के रूप में वर्णित किया गया है। भगवान कल्कि के जय, विजय, मेघमाल तथा बलाहक नाम के चार पुत्र होंगे।
भगवान कल्कि के अधिकांश चित्रों में उन्हें एक श्वेत अश्व पर आरूढ़ दर्शाया जाता है। भगवान कल्कि चतुर्भुजधारी हैं और वे अपनी दो भुजाओं में खड्ग, अर्थात् तलवार एवं शङ्ख रखते हैं तथा अन्य दो भुजाओं से अश्व को नियन्त्रित करते हैं। भगवान कल्कि के कुछ अन्य रूपों में उन्हें नन्दक एवं रत्नत्सरू नामक खड्ग, सारङ्ग नामक धनुष, कुमौदिकी नामक गदा तथा पाञ्चजन्य नामक शङ्ख धारण किये हुये दर्शाया जाता है।
सामान्य मन्त्र -
ॐ नमो कल्किदेवाय क्लीं नमः।
ॐ श्रीकल्कि-अवताराय नमः।
ध्यान मन्त्र -
ध्याये नील-हयारूढ़ं, श्वेतोष्णीष-विराजितम्।
महा-मुद्राढ्य-हस्तं च, कौस्तुभोद्दाम-कण्ठकम्॥
मर्दयन्तं म्लेच्छ-गणं, क्रोध-पूरित-लोचनम्।
अन्तर्हितैर्देव-मुनि-गन्धर्वै-संस्तुतं हरिम्॥1॥
कल्कि गायत्री मन्त्र -
ॐ भूमिनेत्राय विद्महे महापुरुषाय धीमहि।
तन्नो कल्कि प्रचोदयात्॥