धर्मसिन्धु एवं निर्णयसिन्धु के अनुसार जब सूर्योदय के समय एकादशी हो, तदुपरान्त क्षययुक्त द्वादशी हो तथा अगले दिन पुनः सूर्योदय में त्रयोदशी हो, इस प्रकार एक ही दिन एवं रात्रि में तीन तिथियों के स्पर्श को त्रिस्पर्शा द्वादशी कहा जाता है। उदाहरण के लिये -
| 10 दशमी | (11एकादशी, त्रिस्पर्शा) | 13 त्रयोदशी |
उपरोक्त उदाहरण में द्वादशी तिथि का क्षय हो रहा है। सरल शब्दों में कहें तो यहाँ सूर्योदय से सूर्योदय के मध्य एकादशी, द्वादशी तथा त्रयोदशी, अर्थात् तीन तिथियों का संयोग होने से वह त्रिस्पर्शा द्वादशी कहलाती है।
यदि एकादशी एवं द्वादशी एक ही दिन हों तो दोनों का उपवास एक ही दिन करके अगले दिन पारण करना चाहिये। ऐसा करने से दोनों व्रतों का पुण्यफल प्राप्त होता है।
किन्तु एकादशी एवं द्वादशी के पृथक-पृथक होने पर भगवान विष्णु के परम भक्तों एवं सामर्थ्यवान मनुष्यों को दोनों दिन उपवास करना चाहिये। जो भक्त असमर्थ अथवा शक्तिहीन हैं, उनको प्रथम दिवस, अर्थात् एकादशी को फलाहार तथा द्वितीय दिवस, अर्थात् द्वादशी को निराहार व्रत का पालन करना चाहिये। ऐसा करने से एकादशी का पारण न करने का दोष नहीं लगता है, क्योंकि दोनों व्रतों के देवता एक ही हैं।
मतान्तर से तथा वैष्णव परम्परा से कुछ विष्णु भक्त एकादशी को त्याग कर, केवल द्वादशी का व्रत करते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि द्वादशी व्रत का उल्लङ्घन नहीं करना चाहिये। हालाँकि धर्मसिन्धु में प्राप्त व्याख्या के अनुसार एकादशी व्रत का सम्पूर्ण त्याग नहीं करना चाहिये, अर्थात् एकादशी का त्याग करने के पश्चात् भी उस दिन अन्न भक्षण कदापि नहीं करना चाहिये।
नारदपुराण में प्राप्त उल्लेख के अनुसार जिस दिन एकादशी सूर्योदय से पूर्व, अरुणोदयकाल में ही निवृत्त हो गयी हो, दिन भर द्वादशी हो तथा रात्रि के अन्तिम भाग में त्रयोदशी आ गयी हो, उस दिन त्रिस्पृशा नामक द्वादशी होती है। त्रिस्पृशा द्वादशी महान फल प्रदायक होती है। जो मनुष्य त्रिस्पृशा द्वादशी के अवसर पर उपवास करके भगवान गोविन्द का पूजन करता है, उसे निश्चित ही एक सहस्र अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।
हिन्दु धर्मग्रन्थों में विभिन्न तिथियों पर किये जाने वाले महत्त्वपूर्ण व्रतों का वर्णन प्राप्त होता है। इसी प्रकार भविष्यपुराण, नारदपुराण तथा मत्स्यपुराण आदि विभिन्न धर्मग्रन्थों में द्वादशी तिथि पर किये जाने व्रत का विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है। वर्ष पर्यन्त आने वाली द्वादशी तिथियों पर विभिन्न व्रत किये जाते हैं। इन सभी व्रतों की महिमा का वर्णन हिन्दु धर्मग्रन्थों में प्राप्त होता है।
हिन्दु वैदिक ज्योतिष के अनुसार द्वादशी तिथि का संयोग कुछ विशेष नक्षत्रों एवं तिथियों से होने पर आठ विशेष द्वादशी निर्मित होती हैं, जिन्हें महाद्वादशी कहा जाता है। उन्मीलिनी, वञ्जुली, त्रिस्पृशा, पक्षवर्धिनी, जया, विजया, जयन्ती तथा पापनाशिनी यह आठ महाद्वादशी पापों को नष्ट करने वाली हैं, अतः इन तिथियों पर उपवास अवश्य करना चाहिये।