
टिप्पणी: सभी समय १२-घण्टा प्रारूप में लँकेस्टर, संयुक्त राज्य अमेरिका के स्थानीय समय और डी.एस.टी समायोजित (यदि मान्य है) के साथ दर्शाये गए हैं।
आधी रात के बाद के समय जो आगामि दिन के समय को दर्शाते हैं, आगामि दिन से प्रत्यय कर दर्शाये गए हैं। पञ्चाङ्ग में दिन सूर्योदय से शुरू होता है और पूर्व दिन सूर्योदय के साथ ही समाप्त हो जाता है।
हिन्दु पञ्चाङ्ग के अनुसार कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि पर पुष्कर सरोवर में महास्नान किया जाता है, जिसे पुष्कर स्नान के नाम से जाना जाता है। हालाँकि पञ्च दिवसीय पुष्कर स्नान देवउठनी एकादशी से आरम्भ हो जाता है, किन्तु कार्तिक पूर्णिमा के स्नान को महास्नान माना गया है। हिन्दु मान्यताओं के अनुसार कार्तिक शुक्ल एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा के मध्य भगवान ब्रह्मा ने पुष्कर तीर्थ में यज्ञ किया था। अतः इस समयावधि में पुष्कर स्नान करना अत्यन्त पुण्यदायक माना जाता है।
कार्तिक पूर्णिमा स्नान के उपरान्त ही पञ्चतीर्थ यात्रा का समापन होता है। धर्मग्रन्थों में पुष्कर क्षेत्र को पञ्चम् तीर्थ के रूप में वर्णित किया गया है। अतः पुष्कर स्नान के बिना चार धाम यात्रा सहित अन्य सभी तीर्थ निष्फल माने जाते हैं। पुष्कर सरोवर को पुष्कर तीर्थ, ब्रह्म सरोवर तथा पुष्कर झील के नाम से भी जाना जाता है। यह सरोवर राजस्थान के अजमेर जिले के पुष्कर तीर्थ क्षेत्र में स्थित है। पुष्कर राजस्थान का सर्वाधिक लोकप्रिय तीर्थस्थान है, जहाँ प्रतिवर्ष विशाल एवं भव्य पुष्कर मेला आयोजित होता है। हिन्दु मान्यताओं के अनुसार यहाँ भगवान ब्रह्मा का एक मात्र मन्दिर स्थित है जिसके दर्शन हेतु प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु पधारते हैं। पुष्कर तीर्थ को पुराणों में भगवान ब्रह्मा के यज्ञ सदन, अर्थात् यज्ञशाला के रूप में वर्णित किया गया है। इस स्थान पर ब्रह्मा जी ने एक महान यज्ञ सम्पन्न किया था।
धर्मग्रन्थों में प्राप्त वर्णन के अनुसार भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु, देवराज इन्द्र तथा भगवान सूर्य सहित अन्य सभी देवगण एवं ऋषि-मुनि पुष्करवन में विराजमान रहते हैं। गऊ घाट, ब्रह्म घाट, वराह घाट तथा सप्तर्षि घाट सहित पुष्कर सरोवर पर सुन्दर एवं मनोरम 52 घाट स्थित हैं। इन घाटों पर श्रद्धालु स्नान कर स्वयं को कृतार्थ अनुभव करते हैं। पुष्कर सरोवर में स्नान करने से दुःख, रोग एवं दरिद्रता का नाश होता है तथा सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
पुष्कर सरोवर से सम्बन्धित किंवदन्तियों के अनुसार, ब्रह्मा जी ने पृथ्वीलोक पर वज्रनाभ नामक राक्षस का अन्त करने का निश्चय कर कमल पुष्प से उस पर प्रहार किया था। वज्रनाभ का वध करने के पश्चात् उस पुष्प के दल भूलोक पर तीन स्थानों पर गिरे, जहाँ ज्येष्ठ पुष्कर, मध्य पुष्कर तथा कनिष्ठ पुष्कर नामक तीन पवित्र सरोवर प्रकट हो गये। ब्रह्माजी ने यज्ञ के दौरान इन सरोवरों में स्नान एवं पूजन किया था, उसी समय से पुष्कर स्नान की महिमा समस्त संसार में प्रकाशित हो गयी।
नारदपुराण के उत्तरभाग में वर्णित पुष्कर माहात्म्य के अनुसार पुष्कर में तीन उज्ज्वल शिखर, तीन निर्मल झरने तथा तीन दिव्य सरोवर विद्यमान हैं। ये तीनों सरोवर ज्येष्ठ पुष्कर, मध्य अथवा मध्यम पुष्कर तथा कनिष्ठ पुष्कर के नाम से विख्यात हैं। इन तीन सरोवरों के देवता क्रमशः भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु एवं भगवान शिव हैं। पुष्कर से एक योजन की दूरी पर पश्चिम दिशा में नन्दा सरस्वती नामक महान तीर्थ स्थित है, जिसमें स्नान कर वेदज्ञ ब्राह्मण हो दुग्धा गोदान करने से ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है।
ज्येष्ठ पुष्कर में स्नान करके ब्राह्मण को गोदान करने से मनुष्य सभी सुखों को भोगकर ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित होता है। मध्य पुष्कर में स्नान करके ब्राह्मण को भूदान करने वाला पुरुष श्रेष्ठ विमान पर आरूढ़ होकर विष्णुलोक को प्राप्त होता है। कनिष्ठ पुष्कर में स्नान कर ब्राह्मण को स्वर्ण दान करने वाले के समस्त मनोरथ पूर्ण होते हैं तथा वह रुद्रलोक में प्रतिष्ठित होता है। तदुपरान्त नाग तीर्थ में स्नान एवं नागों की पूजा कर ब्राह्मणों को दान देने से मनुष्य एक युग तक स्वर्गलोक में आनन्द भोगता है। आकाश में पुष्कर का चिन्तन करके "आपो हि ष्ठा" इत्यादि मन्त्रों द्वारा पुष्करवन में स्नान करने वाले मनुष्य को शाश्वत ब्रह्मपद प्राप्त होता है। विद्वानों ने तीन पुष्कर तीर्थ वर्णित किये हैं जिन्हें आकाश पुष्कर, भूलोक पुष्कर तथा पाताल पुष्कर के रूप में जाना जाता है।
कार्तिक पूर्णिमा का संयोग कृत्तिका नक्षत्र से होने पर वह महातिथि मानी जाती है। इस दिन आकाश पुष्कर में स्नान करना चाहिये। भरणी नक्षत्र से युक्त कार्तिक पूर्णिमा को मध्यम पुष्कर में स्नान करने से आकाश पुष्कर में स्नान करने का फल प्राप्त होता है। रोहिणी नक्षत्र से युक्त कार्तिक पूर्णिमा को कनिष्ठ पुष्कर में स्नान करने वाला मनुष्य आकाश पुष्कर में स्नान करने का फल प्राप्त करता है।
जिस समय सूर्यदेव भरणी नक्षत्र पर, बृहस्पतिदेव कृत्तिका पर तथा चन्द्रदेव रोहिणी नक्षत्र पर हों तथा नन्दा तिथि का संयोग हो तो उस समय पुष्कर में स्नान करने से आकाश पुष्कर का सम्पूर्ण फल प्राप्त होता है। विशाखा नक्षत्र पर सूर्यदेव तथा कृत्तिका नक्षत्र पर चन्द्रदेव के होने पर आकाश पुष्कर योग निर्मित होता है। आकाश पुष्कर योग के समय इस पुष्कर तीर्थ में स्नान करने वाला पुरुष स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है।
पुराणों के अनुसार पुष्कर स्नान, दान एवं वास करना अत्यन्त दुर्लभ है। सो योजन दूर रहते हुये भी जो मनुष्य स्नान करते समय भक्तिपूर्वक पुष्कर का चिन्तन मात्र करता है, उसे भी पुष्कर स्नान का फल प्राप्त होता है।