विघ्न गणपति हिन्दु धर्मग्रन्थों में वर्णित भगवान गणेश के 32 रूपों में से नौवें स्वरूप हैं। भगवान गणेश के इन 32 रूपों का वर्णन मुद्गलपुराण, गणेशपुराण तथा तत्त्वनिधि आदि धर्मग्रन्थों में प्राप्त होता है। विघ्न गणपति को विघ्नेश गणपति के नाम से भी जाना जाता है।

भगवान विघ्न गणपति समस्त विघ्नों के स्वामी एवं बाधाओं के निवारणकर्ता हैं। विघ्न गणपति की पूजा विघ्नों के नाशक देवता के रूप में की जाती है। भक्तिपूर्वक उनकी आराधना करने से जीवन में आने वाली समस्त प्रकार की बाधाओं का निवारण हो जाता है। इसके अतिरिक्त विघ्न गणपति दुष्टों एवं पापियों के मार्ग में विघ्न उत्पन्न कर उन्हें दण्डित करते हैं।
भगवान गणपति का यह रूप सकारात्मक ऊर्जा का भण्डार है तथा उनके इस रूप का पूजन करने से नकारात्मक विचारों एवं दुष्प्रभावों से मुक्ति प्राप्त होती है। भगवान गणेश के इस रूप की तुलना भगवान विष्णु से की जाती है। यह गणेश जी का अत्यन्त वैभवशाली रूप है तथा वे नाना प्रकार के बहुमूल्य रत्नाभूषण धारण करते हैं।
वैदिक ज्योतिष में रोहिणी नक्षत्र का सम्बन्ध भगवान गणेश के विघ्न गणपति रूप से माना जाता है। अतः अनेक भक्तगण रोहिणी नक्षत्र से सम्बन्धित दोषों के निवारण एवं शुभ परिणामों की प्राप्ति हेतु भगवान विघ्न गणपति की उपासना करते हैं।
विघ्न गणपति रूप में भगवान गणेश का वर्ण स्वर्ण के समान बताया गया है। भगवान विघ्न गणपति को अष्टभुज रूप में दर्शाया जाता है। वे नाना प्रकार के आभूषणों से देदीप्यमान हो रहे हैं। उनकी आठ भुजाओं में शङ्ख, इक्षु-चाप अर्थात् गन्ने का धनुष, पुष्पबाण, परशु अस्त्र, पाश, चक्र, खण्डित दन्त, अङ्कुश सुशोभित हैं तथा उनकी सूँड़ में वे पुष्पगुच्छ अथवा मञ्जरी लिये हुये हैं।
श्री विघ्न गणपति, भगवान गणेश का ही एक अन्य रूप है, इसीलिये उनका कुटुम्ब गणेश जी के ही समान है। अतः उनके पिता भगवान शिव एवं माता देवी पार्वती हैं। भगवान कार्तिकेय उनके भ्राता हैं तथा अशोक सुन्दरी उनकी बहन हैं।
मूल मन्त्र -
ॐ विघ्न गणपतये नमः।
ध्यान मन्त्र -
अथ विघ्नगणपतिध्यानम् -
शंखेक्षुचापकुसुमेषुकुठारपाशचक्रस्वदंतसृणिमंजरिकाशराद्यैः॥
पाणिश्रितैःपरिसमीहितभूषणश्रीविघ्नेश्वरोविजयतेतपनीयगौरः॥1॥ स्वर्णवर्णः॥
पदच्छेद -
शंखेक्षुचापकुसुमेषुकुठारपाश-
-चक्रस्वदंतसृणिमंजरिकाशराद्यैः।
पाणिश्रितैः परिसमीहितभूषणश्री-
-विघ्नेश्वरो विजयते तपनीयगौरः॥
भावार्थ - "जो अपने कर-कमलों में शङ्ख, इक्षु-धनुष, पुष्प-बाण, कुठार, पाश, चक्र, खण्डित स्वदन्त, सृणी, अर्थात् छुरी, मञ्जरी तथा बरछी अथवा भाला धारण करते हैं, जो विभिन्न प्रकार के दिव्य आभूषणों से अलङ्कृत हैं, जो विघ्नों के नाशक एवं अग्नि में तप्त शुद्ध स्वर्ण के समान वर्ण वाले हैं, ऐसे भगवान विघ्न गणपति की सर्वदा जय हो।"