सनत्कुमार ने भगवान शंकर से कहा, "हे महादेव! मैंने सब सुखों को देनेवाले महात्म्य को सुना। अब मेरी इच्छा श्रावण महीने के सोमवार व्रत की कथा सुनने की हो रही है। कृपया मेरी जिज्ञासा शान्त करें।"
भगवान शंकर ने ब्रह्मापुत्र सनत्कुमार से कहा, "हे सनत्कुमार! रवि मेरी आँख है। उसका महात्म्य भी श्रेष्ठ है। क्या मैं पार्वती सहित सोम महात्म्य का वर्णन कर पाऊँगा? मुझसे सोम महात्म्य का जो वर्णन हो सकेगा उसे मैं तुम्हें बताने का प्रयत्न करता हूँ। चन्द्रमा का दूसरा नाम सोम है। सोम ब्राह्मणों के राजा हैं। यज्ञ साधन सोमलता का नाम है। अब तुम ध्यानपूर्वक इन नामों के कारण को सुनो।
सोमवार मेरा स्वरूप है। बारह महीनों में सोमवार का व्रत करना उत्तम है। यदि वर्ष के सब सोमवार के व्रत करने में कोई असमर्थ है तो श्रावण मास के सोमवारों का व्रत करना चाहिए। श्रावण मास के सब सोमवारों का व्रत करने से वर्ष भर के सोमवारों के व्रतों का फल मिल जाता है।"
श्रावण मास के सब सोमवारों का व्रत करने का संकल्प करके प्रति सोमवार की शाम को भगवान सदा शिव महादेव का अर्चन करें। षोड़शोपचार से पूजन करें और एकाग्र मन से कथा सुनें। मैं तुम्हें सोमवार व्रत की विधि बताता हूँ। ध्यान लगाकर सुनो -
श्रावण मास के पहले सोमवार के दिन भली भाँति स्नान कर श्वेत वस्त्र धारण कर काम, क्रोध, अहंकार, द्वेष, चुगली आदि को त्याग देना चाहिए। मालती, मल्लिका आदि के सफेद पुष्पों तथा अन्य पुष्पों से तथा अभीष्ट उपचारों से मूल मंत्र "ॐ नमः शिवाय" या "त्र्यम्बक" मंत्र से पूजा करनी चाहिए और हाथ जोड़कर भोले नाथ का ध्यान करना चाहिए। उग्र, उग्रनाथ भव शशिमौलि का ध्यान करना चाहिए। देवेश का मनोहर उपचारों से अर्चन करें। इस व्रत के पुण्य फलों को तुम्हें बताता हूँ -
सोमवार के दिन जो भक्त पार्वती सहित मेरी पूजा अर्चना करते हैं वे पुनरावृत्ति से रहित दुर्लभ लोक प्राप्त कर लेते हैं। इस महीने के नक्त व्रत के पुण्य को संक्षेप मात्र से कहता हूँ। देव तथा दानवों से सात जन्म के अभेद्य पाप "नक्त भोजन" से नष्ट हो जाते हैं। इस उत्तम व्रत को उपवास रखकर करना चाहिए। इस व्रत के करने से पुत्र एवं धन दोनों की प्राप्ति होती है। वह व्यक्ति इस लोक के सभी भोगों को भोग कर उत्तम विमान द्वारा शिव लोक को जाता है और वहाँ सब का पूजनीय बन जाता है।
इस संसार को असार जानकर तन, मन, धन को चलायमान जानकर व्रतोद्यापन करना चाहिए। धन का लोभ और मन के मोह को त्यागकर अपनी शक्ति के अनुसार भगवान शिव-पार्वती की वृषभ पर स्थित स्वर्ण की प्रतिमा बनानी चाहिये। सुन्दर लिंगतोभद्र मंडल बनाकर उस पर घट स्थापित करें, दो सफेद वस्त्र से ढकें। घड़े के ऊपर ताँबे या काँसे का पात्र रखकर उसके ऊपर स्वर्ण निर्मित शिव-पार्वती की प्रतिमा रखें। श्रुति, स्मृति तथा पौराणिक मंत्रों द्वारा शिवजी की पूजा करें। पुष्पों का मंडल बनाकर उसके ऊपर एक रमणीक चंदोवा बाँधें। रात्रि जागरण करें। अपने "गृहसूत्र विधान" द्वारा बुद्धिमान को अग्नि की स्थापना करनी चाहिए। सर्व भवनाशन आदि एकादशं नामों से हवन करना चाहिए। पलाश की लकड़ियों से १०८ आहुतियाँ देनी चाहिएँ। घी, तिल तथा बेलपत्र आदि द्वारा "ॐ नमः शिवाय" मंत्र से हवन करना चाहिए। इसके बाद आचार्य का पूजन अर्चन कर दक्षिणा में गौ देनी चाहिए। ग्यारह ब्राह्मणों को भोजन कराकर उनको काँसे के घड़े देने चाहिए। देवता पर चढ़ी सामग्री आचार्य को दें और प्रार्थना करें कि मेरा व्रत पूर्ण हो। इस व्रत से भगवान शिव प्रसन्न हों। आदरपूर्वक हाथ जोड़कर पहले ब्राह्मणों को फिर आचार्य को विदा करें। इसके बाद बंधु बाँधवों सहित भोजन करें। जो विधि विधान से इस व्रत को करता है उसकी सारी इच्छाएँ पूरी होती हैं। अन्त में वह उत्तम विमान में बैठकर शिवलोक में जाता है जहाँ उसे आदर सम्मान प्राप्त होता है। सबसे पहले सोमवार व्रत को भगवान वासुदेव ने किया था। सोमवार व्रत के महात्म्य को जो प्राणी सुनेगा वह भी इस व्रत के फल का भागी होगा।
॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में "सोमवार व्रत कथा" नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥