भीष्म द्वादशी से सम्बन्धित प्रचलित कथा के अनुसार पूर्वकाल में एक अत्यन्त पराक्रमी एवं धर्मशील राजा थे जिनका नाम शान्तनु था। राजा शान्तनु का विवाह देवी गङ्गा से हुआ था। विवाह से पूर्व देवी गङ्गा ने राजा शान्तनु से यह वचन लिया था कि वे देवी गङ्गा के किसी भी कार्य में हस्तक्षेप नहीं करेंगे।
कालान्तर में देवी गङ्गा के गर्भ से सात पुत्रों का जन्म हुआ, जिन्हें एक-एक कर देवी ने नदी में प्रवाहित कर दिया। तदुपरान्त देवी गङ्गा ने देवव्रत नामक आठवें पुत्र को जन्म दिया। जब देवी गङ्गा देवव्रत को नदी में प्रवाहित करने जा रही थीं, उसी समय राजा शान्तनु ने उन्हें रोक लिया, जिसके फलस्वरूप देवी गङ्गा उनका परित्याग करके अन्तर्धान हो गयीं। यही देवव्रत भविष्य में गङ्गापुत्र भीष्म के नाम से प्रतिष्ठित हुये।
देवी गङ्गा के अन्तर्धान होने के उपरान्त राजा शान्तनु अत्यन्त व्याकुल एवं शोकग्रस्त रहने लगे। एक दिन वह गङ्गा नदी को पार करने की इच्छा से तट पर किसी नाविक की प्रतीक्षा कर रहे थे। उसी समय उन्हें नाव चला रही एक सुन्दर कन्या दृष्टिगोचर हुयी जिसका नाम मत्स्यगन्धा था। मत्स्यगन्धा हरिदास केवट की पुत्री थी जो भविष्य में सत्यवती के नाम से विख्यात हुयी।
राजा शान्तनु मत्स्यगन्धा की सुन्दरता से आकृष्ट हो गये तथा हरिदास केवट के समक्ष उसकी पुत्री से विवाह का प्रस्ताव लेकर उपस्थित हुये। सत्यवती के पिता ने राजा शान्तनु का विवाह प्रस्ताव स्वीकार करने से पूर्व उनसे यह वचन देने का आग्रह किया कि वे सत्यवती से उत्पन्न पुत्र को ही राज्य का उत्तराधिकारी घोषित करेंगे। किन्तु शान्तनु ने हरिदास केवट के इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।
मत्स्यगन्धा से विवाह न होने के कारण राजा शान्तनु उसकी स्मृति में व्यथित रहने लगे। अपने पिता की व्याकुलता से द्रवित होकर एक दिन देवव्रत ने उनसे उनके कष्ट का कारण पूछा। राजा शान्तनु ने मत्स्यगन्धा से सम्बन्धित सम्पूर्ण वृत्तान्त देवव्रत के समक्ष वर्णित कर दिया। अपने पिता की व्याकुलता का कारण ज्ञात होने पर देवव्रत स्वयं हरिदास केवट के सम्मुख गये तथा गङ्गाजल हाथ में लेकर आजीवन अविवाहित रहने की प्रतिज्ञा ग्रहण कर ली। इतनी भीष्म, अर्थात् कठिन एवं महान् प्रतिज्ञा लेने के कारण वे समस्त लोकों में भीष्म के नाम से प्रतिष्ठित हुये। राजा शान्तनु ने देवव्रत की पितृ भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें इच्छा-मृत्यु का वरदान प्रदान किया।
कालान्तर में महाभारत का युद्ध आरम्भ होने पर पितामह भीष्म कौरवों की ओर से रणभूमि में युद्ध करने हेतु उपस्थित हुये। उनकी अद्वितीय युद्धकला के कारण पाण्डवों की पराजय निश्चित प्रतीत होने लगी थी। अतः ऐसी स्थिति में भगवान श्रीकृष्ण ने शिखण्डी को आगे कर भीष्म को रणभूमि में निष्क्रिय करने की योजना बनायी। शिखण्डी को स्त्री-पुरुष रूप में जन्मा मानकर पितामह भीष्म ने उसके विरुद्ध शस्त्र उठाना अधर्म समझा, जिसका लाभ उठाते हुये अर्जुन ने शिखण्डी के पीछे खड़े होकर अपने बाणों से पितामह भीष्म को शरशय्या पर शयन करने हेतु विवश कर दिया।
पितामह भीष्म ने अपनी इच्छा-मृत्यु के वरदान के अनुसार स्वयं की मृत्यु का समय निर्धारित किया। उन्होंने सूर्यदेव के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की तथा माघ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन अपने प्राण त्यागे, जिसे भीष्म अष्टमी के नाम से जाना जाता है। मान्यताओं के अनुसार उनका अन्तिम संस्कार द्वादशी तिथि को किया गया था। इसीलिये यह तिथि भीष्म द्वादशी के नाम से प्रसिद्ध हो गयी। भीष्म द्वादशी के दिन पितामह भीष्म की स्मृति में उनका पूजन एवं तर्पण आदि कर्म किये जाते हैं।
॥इस प्रकार लोक प्रचलित भीष्म द्वादशी माहात्म्य सम्पूर्ण होता है॥