devotionally made & hosted in India
Search
Mic
Android Play StoreIOS App Store
Ads Subscription Disabled
हि
Setting
Clock
Ads Subscription Disabledविज्ञापन हटायें
X

कूर्म द्वादशी व्रत कथा | पौष शुक्ल द्वादशी व्रत कथा

DeepakDeepak

कूर्म द्वादशी कथा

कूर्म द्वादशी व्रत कथा

ऋषि दुर्वासा द्वारा कूर्म द्वादशी व्रत माहात्म्य एवं विधान का वर्णन

ऋषि दुर्वासा जी कहते हैं - "हे मुने! जिस प्रकार मार्गशीर्ष की द्वादशी को मत्स्य द्वादशी व्रत के रूप में जाना जाता है, उसी प्रकार पौष मास का द्वादशी व्रत कूर्म द्वादशी व्रत कहलाता है। इसी मास में देवताओं ने समुद्रमन्थन किया था तथा उन्हें अमृत की प्राप्ति हुयी थी। उस समय पौष मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि पर भगवान नारायण स्वयं कच्छप रूप में अवतरित हुये थे। अतः यह कूर्म रूप धारण करने वाले परमात्मा श्रीहरि की प्रिय तिथि है।

इस व्रत में व्रती को पूर्वोक्त विधि के अनुसार दशमी तिथि के दिन स्नान आदि कृत्यों से निवृत्त होकर एकादशी तिथि में भक्तिपूर्वक भगवान जनार्दन की आराधना करनी चाहिये। हे मुनिवर! पूजा के मन्त्र भिन्न-भिन्न हैं। उन मन्त्रों के द्वारा ही भगवान श्रीहरि का पूजन करना आवश्यक है। ॐ कूर्माय नमः, ॐ नारायणाय नमः, ॐ सङ्कर्षणाय नमः, ॐ विशोकाय नमः, ॐ भवाय नमः, ॐ सुबाहवे नमः तथा ॐ विशालाय नमः, इन मन्त्रों का उच्चारण करते हुये क्रमशः भगवान श्रीहरि के चरण, कटिभाग, उदर, वक्षःस्थल, कण्ठ, भुजाओं तथा शिरःप्रदेश की विधिवत् पूजा करनी चाहिये।

तदुपरान्त "भगवान आपको नमस्कार है" ऐसा कहना चाहिये। पुनः नाम मन्त्र का उच्चारण करते हुये चन्दन, पुष्प, धूप, फल तथा नैवेद्य आदि अद्भुत उपचारों से परम प्रभु भगवान श्रीहरि की पूजा-अर्चना करें। तदुपरान्त सामने एक कलश रखकर उस पर यथाशक्ति भगवान कूर्म की सुवर्णमयी प्रतिमा स्थापित करें तथा मन्दराचल की प्रतिमा भी स्थापित करें। कलश को माला एवं स्वच्छ वस्त्र से सुशोभित करें। अनन्तर कलश में रत्न डालकर उसके ऊपर घृत से भरा एक ताम्र का पात्र रखकर उसी में प्रतिमा स्थापित करें।

तदुपरान्त वेदज्ञ ब्राह्मण का पूजन करके प्रतिमा उन्हें दान कर दें। प्रतिमा दान करते समय मन ही मन सङ्कल्प करें - "मैं कल अपनी शक्ति के अनुरूप दक्षिणा आदि से ब्राह्मणों का पूजन करूँगा। इस पूजन से कूर्म रूप में प्रकट होने वाले देवों के देव भगवान नारायण मुझसे प्रसन्न हों।" तत्पश्चात् अपने सेवक वर्ग के साथ बैठकर भोजन करें।

हे विप्र! इस प्रकार कार्य सम्पन्न करने पर व्रतकर्ता के पाप नष्ट हो जाते हैं। इसमें कुछ अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। वह पुरुष संसार चक्र का त्याग कर भगवान श्रीहरि के सनातन लोक में निवास करता है। उसके समस्त पाप तत्क्षण नष्ट हो जाते हैं तथा वह धन-समृद्धि से युक्त होकर सत्य के मार्ग पर अग्रसर होता है। भक्तिपूर्वक कूर्म द्वादशी व्रत का पालन करने से मनुष्य के अनेक जन्मों से सञ्चित पाप नष्ट हो जाते हैं। सर्वप्रथम जो मत्स्य द्वादशी का फल वर्णित किया गया है, कूर्म द्वादशी के व्रती को भी वही फल प्राप्त होता है तथा भगवान नारायण उस पर सहजता से प्रसन्न हो जाते हैं।"

॥इस प्रकार श्रीवराहपुराण में वर्णित कूर्म द्वादशी माहात्म्य सम्पूर्ण होता है॥


Name
Name
Email
द्रिकपञ्चाङ्ग पर टिप्पणी दर्ज करने के लिये गूगल अकाउंट से लॉग इन करें।
टिप्पणी
और लोड करें ↓
❮
Kalash
कॉपीराइट नोटिस
PanditJi Logo
सभी छवियाँ और डेटा - कॉपीराइट
Ⓒ www.drikpanchang.com
प्राइवेसी पॉलिसी
द्रिक पञ्चाङ्ग और पण्डितजी लोगो drikpanchang.com के पञ्जीकृत ट्रेडमार्क हैं।
Android Play StoreIOS App Store
Drikpanchang Donation