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वासुदेव चतुर्थी व्रत कथा | चैत्र शुक्ल चतुर्थी व्रत कथा

DeepakDeepak

वासुदेव चतुर्थी कथा

वासुदेव चतुर्थी व्रत कथा

चन्द्रप्रिय नामक राजा की प्रजा के रोगमुक्त होने की कथा

राजा दशरथ ने वशिष्ठ मुनि से कहा - "हे महामुनि! मैंने आपके श्रीमुख से फाल्गुन शुक्ल चतुर्थी व्रत का माहात्म्य श्रवण किया, किन्तु उसके श्रवण से भी मुझे तृप्ति नहीं हुयी है। अतः आप वरदायक चैत्र शुक्ल चतुर्थी के पावन माहात्म्य का वर्णन करने की कृपा करें।"

वशिष्ठ मुनि ने कहा - "हे राजा दशरथ! ध्यानपूर्वक चैत्र माह के शुक्लपक्ष की चतुर्थी के माहात्म्य का श्रवण करो। पूर्वकाल का प्रकरण है, बंगाल के शोभाभद्र नामक विख्यात नगर में एक धर्मात्मा राजा उत्तम नीति से शासन करता था। उस राजा का नाम चन्द्रप्रिय था तथा वह अत्यन्त शूरवीर एवं पराक्रमी था। उस राजा ने अपने बाहुबल एवं पराक्रम से सम्पूर्ण पृथ्वी को अपने अधीन कर लिया था तथा वीरता एवं धन-धान्य आदि से युक्त होकर शासन करता था।

सभी मन्त्री आदि उसके वशीभूत होकर उसकी सेवा में तत्पर रहते थे। यहाँ तक कि अन्य राज्यों के राजा भी उसकी सेवा करते थे। राजा चन्द्रप्रिय स्वयं भी धर्माचरण का पालन करता था तथा सभी मनुष्यों को भी उनके वर्णानुसार धर्म-पालन करवाता था। वर्ण धर्म की उपेक्षा करने वालों को राजा दण्डित करता था। उसके राज्य में सभी सुखी थे तथा व्यापारियों को भी चोरी आदि का कोई भय नहीं था।

कालान्तर में एक समय उसके राज्य में सभी मनुष्य विभिन्न प्रकार के गम्भीर रोगों से ग्रसित हो गये तथा स्त्रियाँ भी वन्ध्या आदि दोषों से युक्त हो गयीं। रोगादि से व्याकुल होकर सभी मनुष्य राजा के समीप उपस्थित हुये तथा राजा से इन रोगों का कारण पूछते हुये कहा - 'हे महाराज! आप अपने मन्त्रियों एवं सचिवों सहित धर्मपूर्वक शासन करते हैं तथा हम भी आपकी आज्ञानुसार अपने-अपने वर्ण-धर्म का पालन करते हैं। तथापि हम सभी नाना प्रकार के रोगों से ग्रसित हो गये हैं तथा धन-धान्य से रहित एवं पुत्रहीन हो गये हैं। हमारी सम्पूर्ण सुख-सम्पदा समाप्त हो गयी है। हे राजन्! आपके राज्य में पृथ्वी रसहीन हो गयी है, वृक्ष फलहीन हो गये हैं तथा गायें दुग्ध रहित हो गयी हैं। हे महामते! आपके समान धर्मात्मा राजा होने पर तो सभी मनुष्यों को सुख प्राप्त होना चाहिये किन्तु यहाँ तो विपरीत हो रहा है। राजा ही प्रजा का बल एवं रक्षक होता है। अतः हे नृपश्रेष्ठ! हमारी रक्षा कीजिये, हमारे आश्रय आप ही हैं।'"

वशिष्ठ मुनि कहते हैं - "हे दशरथ! प्रजा की करुण प्रार्थना सुनकर राजा चन्द्रप्रिय ने इस सङ्कट का उपाय खोजने हेतु वन में जाने का निश्चय किया तथा अपने प्रधान मन्त्रियों को राज्य सौंपकर वह वन की ओर प्रस्थान कर गये। वन में राजा विचरण कर ही रहे थे कि वहाँ महायोगी ऋषि अष्टावक्र आ गये। राजा ने अष्टावक्र मुनि को प्रणाम कर विधिवत् उनका पूजन किया तथा मुनिवर की चरण सेवा करते हुये उन्हें भोजन ग्रहण कराया।

तदुपरान्त राजा चन्द्रप्रिय ने ऋषि अष्टावक्र से कहा - 'हे महायोगिन्! आपका सौभाग्यशाली दर्शन पाकर मेरा जप-तप, दान, यज्ञ तथा जन्म आदि फलीभूत हो गये।' तदनन्तर राजा ने सम्पूर्ण वृत्तान्त का वर्णन ऋषि के समक्ष कर दिया।

राजा की व्यथा सुनकर अष्टावक्र मुनि बोले - 'हे राजन्! तुम्हारे राज्य में प्रसारित महापाप के कारण तुम्हारी समस्त प्रजा कष्ट भोग रही है। चारों पुरुषार्थ, अर्थात् धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष प्रदान करने वाला चतुर्थी व्रत तुम्हारे राज्य से लुप्त हो चुका है। अतः तुम्हारे राज्य में सभी मनुष्य पुरुषार्थों से हीन हो गये हैं, जिसके कारण अन्त में ये सभी तुम्हारे सहित नर्कगामी होंगे।'

यह सुनकर राजा ने कहा - 'हे कृपानिधे! मुझ पर कृपा करके उस उत्तम व्रत का वर्णन कीजिये, यह व्रत किस प्रकार का है तथा कौन से देवता को प्रिय है आदि तथ्यों का वर्णन करने की कृपा करें।'

ऋषि अष्टावक्र ने कहा - 'हे राजन्! शुक्लपक्ष एवं कृष्णपक्ष की चतुर्थी को किया जाने वाला व्रत गणेश्वर व्रत कहलाता है। चारों पुरुषार्थों की सिद्धि हेतु सभी मनुष्यों को इस व्रत का पालन करना चाहिये।' ऐसा कहकर मुनिवर ने चतुर्थी व्रत से सम्बन्धित माहात्म्य का वर्णन किया, जिसका श्रवण करके राजा चन्द्रप्रिय विस्मित हो गये।

राजा ने विनयपूर्वक पुनः ऋषि अष्टावक्र से प्रश्न किया - 'हे मुनिवर! जिनका व्रत इतना महिमामयी है, वे गणराज, भगवान गणेश कैसे हैं? कृपया आप मुझे उनके स्वरूप का परिचय प्रदान करें। तदुपरान्त मैं उनके स्वरूप में स्थित होकर भक्तिपूर्वक इस व्रत का पालन करूँगा।'

अष्टावक्र मुनि बोले - 'हे भूपाल! भगवान गणेश के स्वरूप का वर्णन तो मैं नहीं कर सकता हूँ। तथापि तुम इस व्रत के वृत्तान्त का श्रवण करो, जिसके द्वारा तुम्हें भगवान गणेश के विषय में ज्ञान हो जायेगा। हे राजन्! प्राचीनकाल में मैं यत्नपूर्वक तपस्या कर रहा था, उस समय अनेकों सुन्दर अप्सरायें मेरी तपस्या भङ्ग करने हेतु प्रकट हो गयीं। जब उन्होंने बारम्बार मेरा तप भङ्ग करने की कुचेष्टा की, तो मैं क्रोधित हो गया तथा मैंने उन अप्सराओं को शाप देते हुये कहा कि - 'तुम सभी मृत्युलोक को चली जाओगी तथा वहाँ चोर-लुटेरे तुम्हारा भोग करेंगे।' मेरे द्वारा शाप देने पर वे सभी भयभीत हो गयीं तथा नाना प्रकार से क्षमा-याचना करने लगीं। उनकी प्रार्थना से मुझे उन पर दया आ गयी तथा मैं प्रसन्न हो गया।

तत्पश्चात् मैंने उन अप्सराओं से कहा कि - 'द्वापरयुग के समय यादव कुल में भगवान विष्णु अवतरित होंगे। उस अवतार में उनका नाम श्रीकृष्ण होगा तथा आप सभी उनकी पत्नियाँ होंगी किन्तु अन्त में चोरों को प्राप्त होंगी।' हे राजन्! यह सुनकर अप्सरायें वहाँ से अन्तर्धान हो गयीं तथा मैं पुनः तपस्या में लीन हो गया। तपस्या के प्रभाव से मुझे अन्तर्ज्ञान प्राप्त हो गया। तदुपरान्त मैं शम एवं दम परक होकर इन्द्रियों को शान्त एवं उनका दमन करने वाला हो गया। मैंने अनेक प्रकार के योग द्वारा समाधि का साधन किया। अन्त में मैं समाधि में स्थित हो गया किन्तु वहाँ समान रूप में मोह को देखकर मैं हतप्रभ हो गया।

हे राजन्! मैं शान्ति की प्राप्ति हेतु अत्यधिक कष्ट सहन कर रहा था। उसी समय महर्षि ऋभु वहाँ प्रकट हुये। महायोगी महर्षि ऋभु को प्रणाम एवं पूजन आदि करके मैंने उनसे कहा - 'हे महायोगिन्! आपका कृपामयी दर्शन प्राप्त कर मैं कृत-कृत्य हो गया। आपके दर्शन से मेरा जप, तप, हवन, यज्ञादि सब सफल हो गया।' यह सुनकर महर्षि ऋभु बोले - 'हे तात! तुम्हारी क्या मनोकामना है? अपना मनोरथ मुझसे कहो, मैं अवश्य उसे पूर्ण करूँगा।'

तदुपरान्त मैंने पुनः उन्हें प्रणाम करके योगशान्ति की प्राप्ति का मार्ग पूछा, जिस पर उन परम योगी ने कहा - 'हे तात! संयोग पाँच प्रकार के होते हैं, सत्, असत्, सम, एवं इति तथा स्वसंवेद्यमय होने पर ही योग द्वारा प्राप्त होते हैं। अयोग इन पाँचों से हीन होता है तथा वह मनुष्यों द्वारा निवृत्ति से प्राप्त होता है। इन दोनों का योग होना चाहिये जो शान्तिमार्ग से प्राप्त होता है। हे महामते! उन्हीं गणराज को ज्ञात कर तुम उनका भजन करो जिससे शान्ति का सुख तुम्हें प्राप्त होगा। गकार संयोग है एवं णकार अयोगवाचक है तथा इन दोनों के स्वामी गणेश हैं। पहले भ्रान्ति होने के कारण मैंने अनेकों प्रकार के योग किये तथा सहज योग का आश्रय लिया एवं वहाँ स्वाधीनता देखकर मैं आश्चर्यचकित हो गया। तदुपरान्त मैं योग की कामना से भगवान शिव की शरण में गया।

भगवान शिव ने मुझे गणनायक भगवान गणेश के भजन का आदेश दिया। तब मैंने एकाक्षर विधान से गणपति की आराधना एवं भजन किया, जिसके फलस्वरूप मुझे शान्ति प्राप्त हुयी। ऐसा कहकर महर्षि ऋभु ने मुझे एकाक्षर गणेश मन्त्र (गं) प्रदान किया जिसका जाप करने से मुझे भी शान्ति की प्राप्ति हो गयी।''"

वशिष्ठ जी कहते हैं - "हे राजा दशरथ! इस प्रकार वृत्तान्त वर्णित कर ऋषि अष्टावक्र ने राजा चन्द्रप्रिय को द्वादश वर्ण वाला मन्त्र प्रदान किया तथा सविधि मन्त्रराज की दीक्षा देकर ऋषि अष्टावक्र वहाँ से अन्तर्धान हो गये। तदुपरान्त राजा भगवान गणेश की आराधना में लीन हो गये। हे राजन्! तदनन्तर सर्वप्रथम चैत्र मास की शुक्ल चतुर्थी आने पर राजा ने प्रजा के सभी मनुष्यों सहित श्रद्धापूर्वक चतुर्थी व्रत किया। राजा द्वारा सभी जनपदों में चतुर्थी व्रत का पालन करने की घोषणा कर दी। राजा की आज्ञा से सभी मनुष्य शुक्लपक्ष एवं कृष्णपक्ष की चतुर्थी का व्रत करने लगे तथा व्रत के प्रभाव से सभी रोगमुक्त, स्वस्थ एवं धन-धान्य, पुत्र-पौत्रादि से सम्पन्न हो गये।

राजा चन्द्रप्रिय ने भी अनन्य भाव से भगवान गणेश का भजन किया तथा अपने पुत्र को शासन हस्तान्तरित करके वह पत्नी सहित वन में चले गये। कालान्तर में राजा चन्द्रप्रिय स्वानन्द धाम में गणेश जी का दर्शन प्राप्त कर ब्रह्मभूत हो गये। व्रत के पुण्य प्रभाव से राजा के राज्य में निवास करने वाले सभी मनुष्य अन्त समय में भगवान गणेश का दर्शन कर ब्रह्मलीन हो गये।"

वशिष्ठ मुनि ने आगे राजा दशरथ से कहा - "हे राजन्! अब चैत्र मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी के विषय में एक अन्य कथा श्रवण करो, जिसका माहात्म्य पाप को नष्ट करने वाला एवं सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान करने वाला है। प्राचीनकाल में मालव प्रदेश में शूद्र से उत्पन्न एक पापी मनुष्य निवास करता था। धन का लोभी वह नीच दुष्ट पुरुष वन में विचरण करने वाले जीवों एवं पथिकों की हत्या करता था। वह इतना पापी मनुष्य था कि उसके पापों की गणना करना भी असम्भव था। एक समय वह पापी एक वृक्ष पर छुपकर बैठा हुआ था तथा घात लगाकर पथिकों की हत्या कर रहा था। दैवयोग से उस वृक्ष पर एक भयङ्कर सर्प आ गया तथा उसने उस पापी को डस लिया। सर्पदंश से आहत एवं भयभीत होकर वह अपने घर चला गया।

हे राजन्! घर पहुँचते ही उस पर सर्प के विष का प्रभाव होने लगा तथा वह मूर्च्छित हो गया। हे नृप! दैवयोग से उस दिन चैत्र शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि आ गयी। अतः उस दिन वह शूद्र पीड़ा के कारण अन्न एवं जल ग्रहण नहीं कर पाया तथा पञ्चमी तिथि में उस पापी की मृत्यु हो गयी। अज्ञानता में ही उसके द्वारा किये गये व्रत के पुण्य प्रभाव से वह भगवान गणेश के स्वानन्दकपुर में चला गया। हे राजन्! इस प्रकार अनेकों प्रकार के पापी मनुष्य ब्रह्मभूत हो गये, उनके चरित्र का वर्णन करना सम्भव नहीं है। इस चैत्र शुक्लपक्ष की चतुर्थी के व्रत माहात्म्य का श्रवण अथवा पाठ करने से मनोवाञ्छित फल की प्राप्ति होती है।"

॥इस प्रकार श्रीमुद्गलपुराण में वर्णित चैत्र शुक्ल चतुर्थी माहात्म्य सम्पूर्ण होता है॥


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द्रिक पञ्चाङ्ग और पण्डितजी लोगो drikpanchang.com के पञ्जीकृत ट्रेडमार्क हैं।
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