सूतजी कहते हैं - "हिरण्यकशिपु का वध करने के उपरान्त जगद्गुरु रमापति भगवान नृसिंह क्रोध शान्त करके विराजमान थे। उनकी गोद में ज्ञानियों में सर्वश्रेष्ठ भक्त प्रह्लाद भी बैठे थे। उसी समय भगवान की गोद में बैठे भक्त प्रह्लाद ने कहा - 'हे भगवान विष्णो! आपके इस नृसिंह स्वरूप को मेरा बारम्बार नमन है। हे स्वामिन्! मैं आपका भक्त हूँ, मेरे मन में एक जिज्ञासा है। हे सुरेश! मुझे अनेक प्रकार से आपके चरण कमलों की भक्ति प्राप्त हुयी है। आपने सदैव मेरी रक्षा की है, अतः हे भगवन्! मैं आपको प्रिय कैसे हो गया? कृपया इसका रहस्योद्घाटन करने की कृपा करें।'
भगवान नृसिंह ने कहा - 'हे महाप्राज्ञ! मैं तुम्हारी जिज्ञासा के शमन हेतु तुम्हारी भक्ति एवं तुम्हारे प्रति मेरे प्रियत्व का कारण वर्णित करता हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर श्रवण करो। पूर्वकाल में तुम वासुदेव नामक एक ब्राह्मण के रूप में उत्पन्न हुये थे। उस जन्म में तुम अनक्षर एवं घोर वेश्यागामी थे। वासुदेव ब्राह्मण के रूप में जीवन पर्यन्त तुमने किसी भी व्रत का पालन नहीं किया था। किन्तु एक विषय की संगति एवं इच्छा के कारण मेरा एक व्रत किया था। हे निष्पाप प्रह्लाद! उसी व्रत के फलस्वरूप तुम्हें मेरी भक्ति प्राप्त हुयी है।'
भगवान नृसिंह के श्रीमुख से इन वचनों का श्रवण करके प्रह्लाद ने कहा - 'हे भगवान नृसिंह! कृपया बताइये उस जन्म के मेरे पिता का नाम क्या है, वह दिव्य व्रत क्या है एवं किस प्रकार किया जाता है? वेश्यागामी होते हुये भी मैंने वह व्रत कैसे किया, जिससे आपकी कृपा प्राप्त हुयी? हे प्रभो! यह आप मुझे बताने की कृपा करें।'
भगवान नृसिंह बोले - 'पूर्वकाल में अवन्ती नगरी में एक वेद-वेदान्तों का ज्ञाता जगत् प्रसिद्ध ब्राह्मण निवास करता था। उस ब्राह्मण का नाम सुशर्म्मा था। वह प्रतिदिन अग्निहोत्र करता था, ब्राह्मणों की सभी वेदोक्त क्रियाओं में तत्पर था। उसने अग्निष्टोम आदि से सभी देवताओं के निमित्त यज्ञ किया था। सुशर्म्मा की धर्मपत्नी भी उसके समान ही अत्यन्त सुशील थी। वह पतिव्रता सदाचारिणी तथा पति की भक्ति में लीन रहने वाली थी। कालान्तर में उसकी पत्नी ने पाँच पुत्रों को जन्म दिया। तुम्हारे चार पुत्र तो अत्यन्त सदाचारी एवं विद्वान् थे, किन्तु तुम उसके सबसे कनिष्ठ पुत्र थे। तुम घोर वेश्यागामी थे तथा निरन्तर वेश्यावृत्ति में रत रहते थे। उस वेश्या के विरोध करने पर भी तुम अत्यधिक मदिरापान करते थे तथा चोरों के समूह के साथ तुमने बहुत अधिक मात्रा में स्वर्ण की चोरी की थी। उस विलासिनी के साथ तुमने नाना प्रकार के पापकर्म किये थे।
एक समय उसी वेश्या के घर में तुम्हारा उससे विवाद हो गया। विवाद के कारण व्याकुल होकर तुमने अन्नादि ग्रहण नहीं किया, जिसके कारण अज्ञानता में ही तुमसे व्रत हो गया। अज्ञानता से ही किया हो, किन्तु तुमने पूर्णतः इस उत्तम व्रत का पालन किया। जब वह वेश्या रात्रि में तुमसे मिलने नहीं आयी, तो तुमने रात्रि पर्यन्त ब्रह्मचर्य का पालन एवं जागरण भी किया। व्रत के प्रभाव से उस वेश्या के मन में तुम्हारे प्रति प्रियता उत्पन्न हो गयी तथा उसने भी समस्त भोगों को त्यागकर रात्रि में जागरण किया। इस व्रत से तो स्वर्ग में निवास करने वाले देवता भी प्रसन्न हो जाते हैं, तो उसका कल्याण तो होना निश्चित् ही था।
सृष्टि सृजन के लिये पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने यह श्रेष्ठ व्रत किया था। इसी व्रत के प्रभाव से ब्रह्माजी ने चराचर जगत् की रचना की थी। त्रिपुर नामक दैत्य का वध करने हेतु भगवान शिव ने भी इस व्रत का पालन किया था। इसी व्रत के माहात्म्य से शिवजी ने त्रिपुर का संहार किया। हे निष्पाप! अन्य भी बहुत से ऋषियों एवं राजाओं ने इस व्रत को किया है। इसी व्रत के प्रभाव से उन सभी को सिद्धि की प्राप्ति हुयी।
वह वेश्या भी मेरी प्रियता को प्राप्त हुयी तथा तीनों लोकों में सुखपूर्वक विचरण करने लगी। इस प्रकार यह मेरा व्रत संसार में प्रसिद्ध है। यही व्रत विवाद के कारण विलासिनी से हो गया था। हे प्रह्लाद! उसी व्रत के कारण तुम्हारे हृदय में मेरे प्रति यह अपूर्व भक्ति उत्पन्न हुयी। उस धूर्ता विलासिनी ने मेरे व्रत का दिन ज्ञात कर तुमसे लड़ाई कर ली तथा उसी बहाने से मेरा व्रत कर लिया। वह वेश्या तो नाना प्रकार के भोगों को भोगकर अप्सरा हो गयी। वह कर्मबन्धन से मुक्त होकर अन्ततः मुझ में विलय हो गयी।
हे भक्त प्रह्लाद! तुम मेरे शरीर से पृथक् होकर मेरे ही कार्य के उद्देश्य से रहते हो। आप शीघ्र कार्य समाप्त करके शीघ्र ही मुझमें विलय हो जायेंगे। जो मनुष्य इस व्रत को अवश्य करेंगे, उनका सौ कल्पों में पुनः जन्म नहीं होगा। इस व्रत से मेरा निपुत्री भक्त तेजस्वी पुत्रों को प्राप्त करता है, निर्धन को कुबेर के समान धनी राज्य प्राप्त होता है, आयु की कामना करने वाला शिवजी के समान आयु प्राप्त करता है तथा स्त्रियों को यह व्रत सुयोग्य पुत्र एवं सौभाग्य प्रदान करता है। वे कभी विधवा नहीं होती, न कभी पुत्रशोक भोगती हैं। यह व्रत धन-धान्य प्रदान करता है तथा जन्म को उत्तम बनाता है। वह पहले चक्रवर्ती राजा होकर तदुपरान्त दिव्य सुख भोगता है। जो स्त्री-पुरुष इस उत्तम व्रत का श्रद्धापूर्वक पालन करते हैं। मैं उन्हें भुक्ति-मुक्ति सहित उत्तम सुख प्रदान करता हूँ। हे वत्स! इस व्रत के अगणित फल का वर्णन करने में क्या सार है? मेरे इस व्रत का फल वर्णित करने की शक्ति न मुझमें है न ही शिवजी समर्थ हैं, चारों मुखों से ब्रह्माजी भी वर्णन करने लग जायें, तो भी उस महिमा की कोई सीमा नहीं है।'
भगवान नृसिंह से व्रत का माहात्म्य श्रवण करने के उपरान्त भक्त प्रह्लाद बोले - 'हे भगवन्! आपकी कृपा से मैंने इस उत्तम व्रत का श्रवण कर लिया। इसी व्रत से मेरी आप में भक्ति एवं प्रीति हुयी है तथा उसमें वृद्धि भी हुयी है। हे स्वामिन्! अब मैं इस व्रत की सर्वश्रेष्ठ विधि सुनना चाहता हूँ। हे देव! यह विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये कि, यह कौन से मास, तिथि एवं वार में किया जाता है। हे प्रभो! इस व्रत का समग्र फल प्राप्त करने की समस्त विधि-विधानों का करने की कृपा करें।'
भगवान नृसिंह बोले - 'हे महाभाग! उचित है, मैं इस व्रत की एक श्रेष्ठ विधि वर्णित करता हूँ, तुम सावधान होकर श्रवण करो। वैशाख शुक्ल चौदश के दिन मेरे जन्म के उपलक्ष में किये जाने वाला यह व्रत समस्त पापों का शमन करने वाला है। भावभीरु मनुष्यों को परम पवित्र इस व्रत का पालन प्रतिवर्ष करना चाहिये। इस व्रत से मेरी तुष्टि होती है तथा इसका श्रद्धापूर्वक पालन करने से एक सहस्र द्वादशी का फल प्राप्त होता है। स्वाती नक्षत्र, शनिवार, सिद्ध योग, वणिज करण उनके योग में दैवयोग एवं सौभाग्य से पुष्य योग का संयोग होता है। यदि इन सभी का योग हो जाये तो यह व्रत कोटि हत्याओं के पाप का निवारण करता है। इनमें से किसी का भी योग हो तो भी पापनाशक है। केवल मेरे जन्म के दिन में इस उत्तम व्रत को कर लेना चाहिये। ऐसा न करने से सूर्य-चन्द्र के रहने तक नरक भोगता है। ज्यों-ज्यों कलियुग में पाप की प्रवृत्ति बढ़ेगी, त्यों-त्यों सभी धर्म नष्ट होते चले जायेंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं है। किन्तु इस व्रत के प्रभाव से दुष्टों के हृदय में भी भक्ति हो जायेगी। ऐसा विचारकर माधव मास में तो अवश्य करना चाहिये एवं दन्तधावन करके नियम पालन करना चाहिये।'
प्रह्लाद जी बोले - 'हे नृसिंह प्रभो! आप अत्यन्त उग्र एवं भयङ्कर हैं। मुझ पर कृपा कीजिये, अब मैं आपका व्रत करता हूँ। उसे निर्विघ्नतापूर्वक सम्पन्न कराइये।'
भगवान नृसिंह कहते हैं - 'समग्र फल चाहने वाले व्रती को पापियों का संग नहीं करना चाहिये। न मिथ्याभाषण करना चाहिये। स्त्रियों एवं दुष्टों से वार्ता नहीं करनी चाहिये। इस मेरे पवित्र दिन में केवल मेरे ही रूप का स्मरण करना चाहिये। तदुपरान्त मध्याह्न के समय नदी आदि के निर्मल जल में, बावड़ी आदि में तथा गृह में वैदिक मन्त्रों से स्नान करके मृत्तिका, गोमय तथा आँवलों से तथा समस्त पापों के नाशक महान्याओं अर्थात् आचार्यों के साथ स्नान करके पवित्र वस्त्र धारण कर नित्य कर्म सम्पन्न करें।
तदुपरान्त घर आकर भक्तिपूर्वक मेरा स्मरण कर गोबर से लीपकर अष्टदल कमल की रचना करें। ताँबे के कलश की स्थापना कर उसमें रत्न डालकर उस पर व्रीहि अर्थात् चावल या गेहूँ से भरा बाँस का पात्र रख दें। उस पर विधिवत् भगवान नृसिंह की स्वर्ण निर्मित मूर्ति देवी लक्ष्मी सहित स्थापित करें। अपनी सामर्थ्यानुसार एक पल आधे अथवा आधे के आधे पल भार की मूर्ति बनवानी चाहिये।
तदनन्तर पञ्चामृत से स्नान कराकर पूजन करें। सदाचारी जितेन्द्रिय शान्त एवं निर्लोभ ब्राह्मण को आमन्त्रित कर उसे आचार्य बनायें। उसी के कथानुसार विधिपूर्वक पूजा-अर्चना करें। एक मण्डप निर्मित कर उसे पुष्पों के गुच्छों से सुशोभित करना चाहिये। स्वस्थ चित्त से ऋतुकाल के पुष्पों सहित वेदमन्त्रों का उच्चारण करते हुये भगवान का षोडशोपचार पूजन करें। पवित्र पौराणिक मन्त्रों से भी विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। गायन-वादन सहित रात्रिकाल में जागरण करना चाहिये। पुराणों की पवित्र कथाओं का श्रवण करना चाहिये। प्रातःकाल स्नानोपरान्त जितेन्द्रियतापूर्वक वर्णित इस विधान से प्रयत्नपूर्वक मेरी पूजा करनी चाहिये। स्वस्थ चित्त से मेरे समक्ष वैष्णव मन्त्रों का जप करें।
हे निष्पाप! तदुपरान्त यथोचित दान दें। दोनों लोकों पर विजय की इच्छा से सुपात्र ब्राह्मणों को मुझे सन्तुष्ट करने वाला स्वर्ण का सिंह दान करना चाहिये। फल प्राप्ति के इच्छुकों को गो, भूमि, तिल एवं स्वर्ण का दान करना चाहिये। सप्तधान्य एवं रुई के वस्त्रों सहित शय्या दान करनी चाहिये। सामर्थ्यानुसार अन्य भी वस्तुयें देनी चाहियें। व्रत के समुचित पुण्य-लाभ प्राप्त करने हेतु कृपणता नहीं करनी चाहिये। ब्राह्मणों को दक्षिणा सहित भोजन प्रदान करें।
यथाशक्ति निर्धनों को भी यह व्रत करना चाहिये, किन्तु दान अपने सामर्थ्य के अनुसार ही करें। मेरे व्रत में सभी वर्णों का अधिकार है, मेरे उन अनन्य भक्तों को जो मेरे प्रति समर्पित हैं, उन्हें यह व्रत अवश्य करना चाहिये। मेरी कृपा से उनके वंश में कोई दोष नहीं होगा। मेरे वंश में जो मनुष्य आ गये, वे तत्त्व प्राप्ति में लग जायें।
तदुपरान्त निम्नोक्त प्रार्थना करते हुये विधिपूर्वक देव का विसर्जन कर दें - "हे देवेश! आप हम जीवों का संसार-सागर से उद्धार कर देना, पातकों के समुद्र में डूबे हुये व्याधि दुख रूपी जल के मध्य में वास करने वाले जीवों द्वारा दमन किये गये मोह एवं दुःख से ग्रस्त मुझे हे शेषशायिन्! हे जगत् के स्वामिन्! अपने कर का अवलम्ब अर्थात् आधार प्रदान कीजिये। हे श्रीनृसिंह! हे रमाकान्त! हे भक्तों के भय को नष्ट करने वाले! हे क्षीरसागर में वास करने वाले! हे सुदर्शन चक्र धारण वाले! हे जनार्दन! हे देवेश! इस व्रत से भुक्ति एवं मुक्ति प्रदान करें।" इस प्रकार प्रार्थना कर देव विसर्जन करने के पश्चात् आचार्य को सभी उपहार आदि प्रदान कर दें। दक्षिणा से सन्तुष्ट करके ब्राह्मणों का विसर्जन कर देना चाहिये। मध्याह्नकाल में एकत्रित होकर भाई-बन्धुओं सहित भोजन ग्रहण करें।
जो भक्तिपूर्वक इस पापनाशक व्रत का पालन करता है एवं इसके माहात्म्य का श्रवण करता है, उसकी ब्रह्महत्या इसके श्रवण मात्र से ही दूर हो जाती है। जो मनुष्य इस परम पवित्र गोपनीय व्रत का श्रवण करता है, उसके सभी मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं तथा उसे इस व्रत का समुचित फल प्राप्त हो जाता है।'"
॥इस प्रकार नृसिंहपुराण में वर्णित नृसिंह चतुर्दशी व्रत कथा सम्पूर्ण होती है॥