devotionally made & hosted in India
Search
Mic
Android Play StoreIOS App Store
Ads Subscription Disabled
हि
Setting
Clock
Ads Subscription Disabledविज्ञापन हटायें
X

श्रावण माहात्म्य प्रथम अध्याय | सावन माहात्म्य पहला अध्याय

DeepakDeepak

श्रावण माहात्म्य प्रथम अध्याय

पहला अध्याय

सूत जी का कथन

एक बार सूत जी शौनक तथा अन्य ऋषिगणों की सभा में पधारे। सूतजी ने उन्हें आदरपूर्वक प्रणाम किया और बैठने के लिए आसन दिया।

उनके बैठने के बाद मुनिश्रेष्ठ शौनकजी ने सूत जी से पूछा, "हे प्रभु! हम सब मुनियों की इच्छा हो रही है कि आप हमें कोई ऐसी कथा सुनाइये जिसे सुनकर हम सब तृप्त हो जाएँ। हमने आपके मुख से अनेक आख्यान सुनकर आनन्द प्राप्त किया है। आपके मुख से हमने तुला राशि का सूर्य होने पर कार्तिक मास का महात्म्य, मकर राशि का सूर्य होने पर माघ मास का महात्म्य तथा मेष राशि का सूर्य होने पर बैशाख मास का महात्म्य सुना है। अब इन मासों से भी उत्तम कोई मास हो तो हम उसका महात्म्य सुनना चाहते हैं।"

शौनक जी का आग्रह सुनकर सूत जी बड़े प्रेम पूर्ण शब्दों में बोले कि श्रोताओं में निम्नलिखित बारह गुण होने चाहिए - दम्भ रहित, आस्तिक बुद्धि, शठता रहित, परमात्मा में भक्ति, भगवत चर्चा सुनने की तीव्र इच्छा, नम्रता, ब्राह्मण भक्त, सुशील स्वभाव, धैर्यवान, पवित्र, तपस्वी, तथा दोषारोपण रहित।

ये सब गुण आप सज्जनों में विद्यमान हैं। इसलिए मैं प्रसन्नतापूर्वक आपको तत्त्व की बात सुनाता हूँ। एक बार ब्रह्मा पुत्र सनत्कुमार ने भगवान शिव से पूछा, "हे महादेव! हमारे हृदय में ऐसे मास के महात्म्य को सुनने की इच्छा हो रही है जो सब मासों में श्रेष्ठ हो। उस मास में कर्मों के करने से अनन्त फल की प्राप्ति हो। संसार के कल्याण के लिए ऐसे मास के सभी धर्मों का वर्णन विस्तारपूर्वक बताने की कृपा करें।"

भगवान शिव ने सनत्कुमारों की इच्छा जानकर कहा, "वर्ष के बारह महीनों में श्रावण मास मुझे सबसे अधिक प्रिय है। पूर्णिमा को श्रावण नक्षत्र का योग हो जाने से इस मास का नाम श्रावण पड़ा है। श्रावण मास में सिद्धि प्राप्त होने के कारण इस मास का नाम श्रावण पड़ा। आकाश के समान स्वच्छ हो जाने से नभा नाम कहा है। श्रावण मास के फलों को कहने के लिए ब्रह्माजी हुए। इसका महामात्य को देखने के लिए इन्द्र हुए और भगवान अनन्त ने इसके फल को कहने के लिए दो सहस्त्र जिह्वा धारण की थीं। इसलिए श्रावण मास के धर्मों की गणना करने के लिए पृथ्वी पर किसी में भी सामर्थ्य नहीं है। इस मास की कला को भी अन्य मास प्राप्त नहीं कर सकते। इस मास का कोई भी दिन व्रत शून्य नहीं है। इस मास की सब तिथियाँ व्रत वाली हैं।"

सनत्कुमार बोले, "हे महादेव! आपने अभी बताया कि इस मास की प्रत्येक तिथि व्रत वाली है। अतः आप मुझे बताइये कि किस तिथि में कौन सा व्रत रखा जाता है। उस व्रत का अधिकारी कौन है? उसका फल क्या मिलता है तथा उस व्रत को करने की विधि क्या है? किसने इस व्रत को किया है? उसकी उद्यापन विधि क्या है? उसका देवता कौन है? पूज्य कौन है? पूजन सामग्री क्या है? प्रधान पूजन किसका करना है? जागरण विधि क्या है? किस व्रत का क्या समय है? हे प्रभु! आप मुझे ये सब बातें कृपा कर विस्तापूर्वक बताने की कृपा करें। श्रावण मास आपको क्यों प्रिय हुआ? इसे पवित्रतम किस कारण से कहा गया है? इस मास में कौन अवतार उत्तम माना गया है। इस मास में कौन सा अनुष्ठान करने योग्य माना गया है? हे प्रभु! आप सब प्राणियों के लाभार्थ मुझसे कहें।"

रविवार से शनिवार तक जो व्रत आदि किये जाते हैं वह कृपा कर बताने का कष्ट करें। आप सब देवताओं में बड़े होने के कारण महादेव कहलाते हैं। पीपल के पेड़ में तीनों देवों (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) का निवास कहा गया है। उसमें भी आपका निवास सबसे ऊपर कहा गया है। आप कल्याण रूप होने के कारण शिव, पापनाशक होने के कारण हर कहलाते हैं।

शरीर में गणेशजी का अधिष्ठान रूप चार दल का मूलाधार नाम का चक्र है। उसके ऊपर छः दल का ब्रह्माजी का अधिष्ठान नाम का दूसरा चक्र है। सबसे ऊपर दस दल का भगवान विष्णु का मणिपुर नामक तीसरा चक्र है। चौथा चक्र हृदय में बारह दल का अनाहत नाम का है। इस चौथे चक्र में आपकी स्थिति कही गई है। आपका निवास सबसे ऊपर होने के कारण आपको मुख्यतः कहा गया है। इसलिए आपका पूजन करने से पंचायतन का पूजन हो जाता है।

अन्न को ब्रह्ममय कहा गया है। भगवान विष्णु जल रूप कहे गये हैं। जब आप उस अन्न और जल को ग्रहण करते हैं तो आपकी प्रवीणता में किसी को लेश मात्र भी संदेह नहीं रह जाता। आपका श्मशान और पर्वत पर निवास सब प्राणियों को विरक्ति का सन्देश देता है। आपके यश का वर्णन करना वाणी से परे की बात है।

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में "सूत जी का कथन" नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ ॥


Name
Name
Email
द्रिकपञ्चाङ्ग पर टिप्पणी दर्ज करने के लिये गूगल अकाउंट से लॉग इन करें।
टिप्पणी
और लोड करें ↓
Kalash
कॉपीराइट नोटिस
PanditJi Logo
सभी छवियाँ और डेटा - कॉपीराइट
Ⓒ www.drikpanchang.com
प्राइवेसी पॉलिसी
द्रिक पञ्चाङ्ग और पण्डितजी लोगो drikpanchang.com के पञ्जीकृत ट्रेडमार्क हैं।
Android Play StoreIOS App Store
Drikpanchang Donation