भगवान शंकर सनत्कुमार से बोले, "श्रावण मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन वृष राशि के चन्द्रमा में अर्ध रात्रि के समय, इस योग के आने पर देवकी के गर्भ से भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ था परन्तु सिंह राशि के सूर्य आने पर इस महोत्सव को मनाना चाहिये। अष्टमी तिथि से पहले सप्तमी के दिन दातुन करके अल्प भोजन करना चाहिए। रात को जितेन्द्रिय होकर सो जाना चाहिये। प्रातः होने पर उपवास नियम करें। केवल उपवास द्वारा श्री कृष्णजन्माष्टमी का पवित्र दिन व्यतीत करना चाहिये। केवल उपवास करने से ही मनुष्य को सात जन्म के किये पापों से छुटकारा मिल जाता है। अष्टमी के दिन तिलों के साथ नदी में स्नान करना चाहिये। शोभन स्थान में देवकी के सूतिका घर को बनाकर उसे नाना प्रकार के रंगों के कपड़ों से कलश तथा फलों से सजाना चाहिये। दीपमाला, पुष्प, चन्दन, अगरबत्ती तथा धूपबत्ती जलाकर वहाँ गोकुल के कृष्ण चरित्र का वर्णन करें। वाद्यशब्द, नृत्यगान आदि से उस दिन को मनायें। सोलह उपचार द्वारा देवकी मंत्र से देवकी की पूजा करें। सतत वेणु-वीणा-निनाद सहित गायन आदि से किन्नरों द्वारा स्तुति की जाती हुई तथा श्रृंगार, दर्पण, दूर्वा, दधि, कलश धारण किये किन्नरों से सेवित अपने निवास स्थान पर खूब प्रसन्न मुख, देवमाता देवकी कृष्ण के सहित वसुदेव के साथ चारपाई पर लेटी हुई दिखानी चाहिये। सब पाप नाशार्थ आदि में 'प्रणव' तथा अन्त में 'नमः' जोड़कर चतुर्थ्यन्त युक्त अलग- अलग नाम कीर्तन पूजा करनी चाहिये। देवकी, वसुदेव, बलदेव, नन्द, यशोदा की अलग-अलग पूजा करनी चाहिये। चन्द्रमा के निकलने पर श्रीहरि का स्मरण कर चन्द्रमा को अर्घ्य देकर कहना चाहिये, "हे रोहिणीकांत! आप मेरे अर्घ्य को स्वीकार करें।"
श्री कृष्ण अष्टमी का व्रत एक करोड़ एकादशी के व्रतों के तुल्य होता है। इस प्रकार रात को पूजा करके नवमी को प्रातःकाल देवी भगवती विन्ध्यवासिनी का कृष्ण तुल्य महोत्सव करना चाहिये। ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा देकर कहना चाहिये, "भगवान वासुदेव मुझपर प्रसन्न हों, मैं आपको नमस्कार करता हूँ।"
जो देवी तथा भगवान श्री कृष्ण का प्रतिवर्ष महोत्सव करता है वह उपरोक्त फल प्राप्त करने के साथ-साथ आरोग्य तथा अतुलनीय सौभाग्य भी प्राप्त करता है। अन्त में बैकुण्ठ को जाता है।
उद्यापन विधि : उद्यापन किसी शुभ दिन सविधि करना चाहिये। प्रातःकाल संध्या आदि करके ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन करवाकर ऋषिओं की पूजा करनी चाहिये। स्वर्ण की भगवान कृष्ण की प्रतिमा बनवानी चाहिये। मण्डप में ब्रह्मादि देवताओं की स्थापना करनी चाहिये। उसपर ताँबे या मिट्टी का कलश रखकर उसमें रजत या बांस का पात्र रखना चाहिये। कपड़े से ढक कर साधक उस पर कृष्ण कन्हैया की वैदिक या तांत्रिक मंत्रों द्वारा षोड्शोपचार द्वारा पूजा करनी चाहिये। शंख में गंगाजल, फल, फूल, चन्दन रखकर, नारिकेल फल युक्त कर भूमि पर घुटने टेककर कहना चाहिये, "हे गोविन्द! आपका अवतार कंस के वध के लिए तथा भूमि का भार कम करने के लिए हुआ है। कौरवों के नाश तथा दैत्यों के विनाश के लिए आपका अवतार हुआ है। आप मेरे इस अर्घ्य को स्वीकार करें। हे प्रभु! वासुदेवात्मज! आपको मेरा नमस्कार है। आप इस भवसागर से मेरी रक्षा करें। इस प्रकार प्रार्थना करने के पश्चात् रात्रि जागरण करना चाहिये।"
अगले दिन जनार्दन की पूजा करके मूल मंत्र द्वारा पायस, तिल तथा शुद्ध घी से एक सौ आठ बार होम करके आहुति देनी चाहिये। 'इदं विष्णुः' मंत्र से होम करें। व्रत की समाप्ति पर एक कपिला गाय का दान करना चाहिये। आठ ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा तथा जल से भरे आठ घड़े दान करने चाहिये। इस प्रकार उद्यापन करने से मनुष्य उसी समय पाप से रहित हो जाता है।
॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में "श्री कृष्ण जन्माष्टमी" नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥