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Soma Pradosha Vrat Katha

DeepakDeepak

Soma Pradosha Katha

Soma Pradosha Vrat Katha

Story of Poor Widow Brahmini and her Son

रवि प्रदोष व्रत की कथा श्रवण करने के पश्चात् शौनकादि ऋषि ने कहा - "हे मुनिश्रेष्ठ सूतजी! अब आप हमें सोम त्रयोदशी प्रदोष की कथा सुनाने की कृपा करें।"

सूतजी ने कहा - "हे ऋषिगणों! अब मैं सोम त्रयोदशी व्रत के माहात्म्य का वर्णन करता हूँ। इस व्रत को करने से भगवान शिव एवं देवी पार्वती प्रसन्न होती हैं। प्रातः स्नानादि दैनिक कर्मों से निवृत्त होकर शिव-पार्वती का ध्यान करके उनका पूजन करें एवं अर्घ्य अर्पित करें। 'ॐ नमः शिवाय' मन्त्र का 108 बार जप करें। तदुपरान्त शिव जी की स्तुति करें - 'हे भगवन्! मैं इस दुःख से भरे संसार-सागर में गोते खा रहा हूँ, मैं ऋण के भार एवं ग्रहदशा से पीड़ित हूँ, हे कृपालु! मेरी रक्षा करें।'"

शौनकादि ऋषि ने पूछा - "हे महामुनि! आपने सम्पूर्ण कामनाओं की पूर्ति हेतु इस व्रत का वर्णन किया है, अब यह व्रत किसने किया तथा उससे क्या फल प्राप्त हुआ, कृपया यह वर्णन करें।"

सूतजी ने कहा - "एक नगर में एक ब्राह्मणी निवास करती थी। उसके पति का देहान्त हो गया था। उसका कोई भी सहारा नहीं था। इसीलिये वह प्रातः होते ही अपने पुत्र सहित भिक्षाटन हेतु जाती तथा जो भी भिक्षा प्राप्त होती उसी से वह स्वयं का एवं पुत्र का भरण पोषण करती थी।

एक दिन ब्राह्मणी भिक्षाटन करके लौट रही थी, उसी समय मार्ग में उसे एक बालक मिला, उसकी स्थिति अत्यन्त दयनीय थी। ब्राह्मणी को उस बालक पर दया आ गयी। वह उसे अपने साथ घर लेकर आ गयी।

वह बालक विदर्भ का राजकुमार था। पड़ोसी राज्य के राजा ने उसके पिता पर आक्रमण करके उसके राज्य पर कब्जा कर लिया था। इसीलिये वह इतनी दयनीय स्थिति में था। ब्राह्मणी अपने घर पर रखकर अपने पुत्र की भाँति ही उस राजकुमार का भी लालन-पालन करने लगी।

एक समय उस ब्राह्मणी का पुत्र तथा वह राजकुमार खेल रहे थे, उसी समय वहाँ गन्धर्व कन्यायों का आगमन होता है और वे राजकुमार पर मोहित हो जाती हैं। ब्राह्मण कुमार तो घर लौटकर आ गया किन्तु राजकुमार उसी स्थान पर अंशुमति नामक गन्धर्व कन्या से बात कर रहा था। दूसरे दिन अंशुमति अपने माता-पिता को राजकुमार से भेंट कराने हेतु ले आयी। अंशुमति के माता-पिता भी राजकुमार को देखकर अत्यन्त प्रभावित हुये।

कुछ दिवस उपरान्त अंशुमति के माता-पिता को भगवान शिव ने स्वप्न में दर्शन दिया तथा उन्हें अपनी कन्या का विवाह राजकुमार से कराने का आदेश दिया। शिव जी के आदेशानुसार उन्होंने अंशुमाति का विवाह राजकुमार से करा दिया।

ब्राह्मणी को ऋषियों से यह आज्ञा प्राप्त थी कि वह सदा प्रदोष व्रत करती रहे। उस ब्राह्मणी के व्रत के फलस्वरूप राजकुमार ने गन्धर्वराज की सेना की सहायता से अपने राज्य विदर्भ के शत्रुओं को परास्त कर दिया तथा अपने पिता का राज्य पुनः प्राप्तकर सुखपूर्वक शासन करने लगा। राजकुमार ने ब्राह्मण कुमार को अपना प्रधानमन्त्री बना लिया।

जिस प्रकार ब्राह्मणी द्वारा प्रदोष व्रत का पालन करने से राजकुमार एवं ब्राह्मण कुमार का समय परिवर्तित हुआ, उसी प्रकार भगवान शिव अपने अन्य भक्तों को भी सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं। इसीलिये सृष्टि में प्रदोष व्रत की अत्यधिक महिमा है।"

॥इति श्री सोम प्रदोष व्रत कथा सम्पूर्णः॥

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