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पूर्णिमा व्रत कथा | द्वात्रिंशी पूर्णिमा व्रत कथा

DeepakDeepak

पूर्णिमा व्रत कथा

पूर्णिमा व्रत कथा

धनेश्वर नामक निःसन्तान ब्राह्मण को पुत्र प्राप्ति एवं अल्पायु दोष से मुक्ति की कथा

माता यशोदा ने कहा - "हे कृष्ण! तुम समस्त देवताओं के स्थिति एवं संहार के कर्ता हो। यदि कोई वास्तविक रूप से स्त्रियों को अवैधव्य करने वाला व्रत हो उसका वर्णन कीजिये।"

भगवान श्रीकृष्ण बोले - "हे माता! आपका प्रश्न उचित है, मैं एक उत्तम व्रत का वर्णन करता हूँ, कृपया श्रद्धापूर्वक श्रवण करें। स्त्रियों को सुख-सौभाग्य की प्राप्ति हेतु द्वात्रिंशी पूर्णिमा का व्रत करना चाहिये। इस व्रत के पुण्यफल से स्त्रियों को सुख, सौभाग्य एवं सम्पत्ति की प्राप्ति होती है। यह व्रत सुहाग की रक्षा करने वाला है एवं भगवान शिव को अत्यन्त प्रिय है।"

माता यशोदा जी ने प्रश्न किया - "मृत्युलोक में कब एवं किसने यह व्रत किया था। इस व्रत का विधान क्या है, जिससे भगवान शिव प्रसन्न हो जायें।"

श्रीकृष्ण ने कहा कि - "भूमण्डल पर अत्यन्त विख्यात, चन्द्रहास से पालित एवं नाना प्रकार के रत्नों से परिपूर्ण एक नगरी थी। उस नगरी का नाम कान्तिका था। कान्तिका नगरी में धनेश्वर नाम का एक ब्राह्मण निवास करता था। धनेश्वर की पत्नी अत्यन्त सुलक्षणी थी जिसका नाम रूपवती था। वे दोनों निःसन्तान थे, जिसके कारण सदैव दुखी रहते थे। एक दिन उनकी नगरी में एक जटाधारी योगी का आगमन हुआ। धनेश्वर के घर के अतिरिक्त उस जटाधारी योगी ने अन्य सभी घरों से भिक्षाटन किया तथा रूपवती से भिक्षा ग्रहण नहीं की। तदुपरान्त गङ्गा के तट पर जाकर उसने भिक्षा में प्राप्त अन्न को गङ्गाजल से धोया एवं उसका सेवन कर लिया। उस योगी को ऐसा करते हुये धनेश्वर ने देख लिया। स्वयं की भिक्षा का अनादर होने के कारण धनेश्वर का हृदय व्यथित हो गया तथा उसने योगी महोदय से प्रश्न किया - 'हे द्विजोत्तम! आप अन्य सभी गृहस्थों से भिक्षा ग्रहण करते हो किन्तु मेरे घर से भिक्षा ग्रहण नहीं करते, इसका क्या कारण है, कृपया स्पष्ट करने की कृपा करें।'

इस प्रकार धनेश्वर के प्रश्न करने पर वे महात्मा बोले - 'जो निपुत्री के घर की भिक्षा ग्रहण करता है वह पतितों के अन्न के समान वस्तु ग्रहण करता है, क्योंकि उसका सेवन कभी नहीं करना चाहिये।' यह सुनकर धनेश्वर अपने भाग्य को धिक्कारते हुये स्वयं की निन्दा करने लगा तथा करबद्ध निवेदन करते हुये योगी महाराज से बोला - 'आप मुझे पुत्र प्राप्ति का कोई उपाय बताने की कृपा करें। मैं धन-धान्य से समृद्ध हूँ किन्तु मेरे कोई सन्तान नहीं है।' यह सुनकर जटाधारी योगी ने कहा - 'जा! देवी चण्डिका की पूजा-अर्चना एवं आराधना कर।'

ब्राह्मण ने घर आकर सम्पूर्ण वृत्तान्त अपनी पत्नी रूपवती से कहा तथा तप करने हेतु वन की ओर प्रस्थान कर गया। वन में उसने देवी चण्डिका की आराधना की। सोलह दिवस व्रत करने के उपरान्त देवी चण्डी ने धनेश्वर को दर्शन दिया और कहा - 'हे धनेश्वर! जा तुझे एक पुत्र प्राप्त होगा। यथाशक्ति चून के अर्थात् आटे के दीपक प्रज्वलित करना। प्रतिदिन एक दीपक बढ़ाते जाना, इस प्रकार पूर्णिमा पर बत्तीस हो जाने चाहिये। इस व्रत के विषय में तुम अपनी पत्नी को बताना। अब आम के वृक्ष पर चढ़कर शीघ्रातिशीघ्र एक फल लेकर घर जाओ। वह फल अपनी पत्नी को ग्रहण कराओ, वह अवश्य ही गर्भवती हो जायेगी।'

प्रातःकाल होते ही धनेश्वर आम का वृक्ष खोजने लगा। उसने वृक्ष पर चढ़ने का बहुत प्रयास किया किन्तु सफल नहीं हुआ। अतः वह अत्यन्त चिन्तित हो गया। इस सङ्कट के निवारण हेतु वह भगवान गणेश से प्रार्थना करते हुये बोला - 'हे दयानिधे! मुझ पर दया करो प्रभु! आपकी कृपा से मेरा मनोरथ सिद्ध हो जाये।' इस प्रकार गणेश जी से प्रार्थना करने से भगवान की कृपा से वह वृक्ष पर चढ़ने में सफल हुआ। तीन बार प्रयास करने पर उसे एक फल प्राप्त हुआ जिसे देखकर वह विचार करने लगा कि - 'यह वर से प्राप्त फल है अथवा नहीं।' घर आकर उसने अपनी पत्नी को सम्पूर्ण वृत्तान्त बताकर वह फल प्रदान किया। उस फल का सेवन करते ही उसकी पत्नी गर्भवती हो गयी।

देवी माँ की कृपा से उन्हें एक रूपवान एवं गुणी पुत्र की प्राप्ति हुयी जिसका नाम देवदास रखा गया। तदुपरान्त रूपवती ने माता के निर्देशानुसार व्रत किया। दैवयोग से धनेश्वर ने पुत्र को अध्ययन हेतु काशी भेजने का निर्णय लिया। तदुपरान्त अश्व पर आरूढ़ कर अपने पुत्र को मातुल अर्थात् मामा के सङ्ग काशी भेज दिया। मार्ग में अनेक दिवस व्यतीत हो गये। भागिनेय अर्थात् भान्जे सहित मातुल काशी पहुँच गया। रात्रि हो गयी थी, अतः वे दोनों देवदत्त नामक ब्राह्मण के घर पहुँचकर विश्राम करने लगे। संयोगवश उस दिन गृहस्वामी अपनी पुत्री का विवाह करने वाला था। तैल आदि चढ़ाकर मण्डप निर्माण किया गया। लग्न के समय वर को धनुर्वात नामक रोग हो गया। तब वर के पिता ने अपने कुटुम्बीजनों से विचार-विमर्श किया। अन्ततः उसने निश्चय किया कि यह कार्पटिक बालक मेरे पुत्र के समान ही रूपवान है। मैं इसके सङ्ग ही विवाह-लग्न करवाऊँगा। वर के पिता ने देवदास के मातुल से निवेदन किया कि - 'दो घड़ी के लिये अपने भागिनेय को मुझे दे दो।'

मातुल ने कहा - 'तुम्हें मधुपर्क एवं कन्यादान में जो प्राप्त हो यदि वो हमें मिल जाये तो मेरा भागिनेय तुम्हारी बारात का दुलहा बन जायेगा। वर के पिता की स्वीकृति पर उसने अपने भागिनेय को वर बनाने के लिये उन्हें सौंप दिया। तदुपरान्त विधि-विधान से उसका विवाह पूर्ण हुआ। वह पत्नी के साथ भोजन नहीं कर सका तथा मन ही मन विचार करने लगा कि यह किसकी वधू होगी?'

देवदास एकान्त में बैठकर मन ही मन चिन्तित हो ही रहा था कि तभी उस वधू ने आकर उससे पूछा कि - 'क्या बात है? आप अत्यन्त चिन्तित एवं अप्रसन्न प्रतीत हो रहे हैं।' देवदास ने अपने मातुल एवं वर के पिता के मध्य हुये समस्त वृत्तान्त का वर्णन वधू के समक्ष कर दिया। कन्या ने कहा - 'ब्राह्म-विवाह के विपरीत यह कृत्य कैसे सम्भव है? देव, द्विज एवं अग्नि के समक्ष हम दोनों का विवाह हुआ है। अतः मैं सदैव आपकी ही सहधर्मिणी रहूँगी।' देवदास ने कहा - 'आप ऐसा मत करिये क्योंकि मेरी आयु बहुत थोड़ी है। अतः मैं अल्पायु हूँ।' किन्तु उस वधू ने दृढ़ निश्चय करते हुये कहा - 'जो आपकी गति होगी, वही मेरी गति होगी। हे मेरे स्वामिन्! उठिये कृपया भोजन ग्रहण कीजिये।' तदनन्तर देवदास ने उसके साथ भोजन किया। भोजनोपरान्त उसने एक रत्नजड़ित मुद्रिका एवं एक वस्त्र उस नववधू को प्रदान किया तथा उससे कहा कि - 'इसे ले एवं स्थिर चित्त हो जा, मेरे मरण एवं जीवन के विषय में ज्ञात करने हेतु एक पुष्पवाटिका बना ले, उस वाटिका में सुगन्धित नवमल्लिका पुष्प लगा ले, उनमें नित्य प्रतिदिन जल सिञ्चन करना एवं आनन्दपूर्वक रहना। जब तक मैं जीवित रहूँगा तब तक वह वाटिका हरी-भरी रहेगी तथा जिस दिन मेरी मृत्यु होगी उस दिन पुष्प सूख जायेंगे।' ऐसा कहकर देवदास अपने मातुल सहित ब्रह्ममुहूर्त में वहाँ से प्रस्थान कर गया।

प्रातःकाल विदाई हेतु गायन-वादन आदि होने लगा तो कन्या ने अपने पिता से कहा - 'यह मेरा पति नहीं है। यदि है तो बताये कि मैंने इसे क्या दिया है? मधुपर्क एवं कन्यादान में जो आभूषण आदि मैंने इसे दिये हैं, वे दिखाये तथा रात्रि में मैंने इससे क्या गुप्त चर्चा की वह भी बताये।' कन्या के वचन सुनकर वर ने कहा - 'मुझे इस विषय में कुछ भी ज्ञात नहीं।' तदुपरान्त लज्जित होकर वह कहीं चला गया।"

भगवान श्रीकृष्ण बोले - "वह बालक देवदास अध्ययन हेतु काशी पहुँच गया। कुछ दिवस व्यतीत होने पर उसकी मृत्यु का समय आ गया। रात्रिकाल में एक काला विषधर नाग उसे डसने के लिये आया। उसके शयन का स्थान चहुँओर से विष की ज्वाला से ढक गया, किन्तु वह नाग देवदास को डस नहीं पाया क्योंकि उसकी माँ ने द्वात्रिंशी पूर्णिमा का व्रत किया था। तदुपरान्त मध्याह्नकाल में स्वयं काल उसके प्राण हरने हेतु उपस्थित हुआ तथा उसने अपना मृत्युपाश अर्धोदक अर्थात् जल में नियुक्त किया जिसका पान कर देवदास निश्चेतस् हो गया। उसी समय माता पार्वती भगवान शिव के सहित वहाँ प्रकट हो गयीं। देवदास की यह दशा देख माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा - 'हे प्रभो! इसकी माँ ने पूर्वकाल में द्वात्रिंशी पूर्णिमा व्रत किया है। इसके फलस्वरूप आप इस अनाथ को जीवनदान दें।' देवी पार्वती के निवेदन पर भगवान शिव ने देवदास को पुनर्जीवित कर दिया। अतः द्वात्रिंशी पूर्णिमा व्रत के प्रभाव से वह ब्राह्मण पुत्र मृत्यु से भी बच गया।

उधर देवदास की नववधू उस पुष्पवाटिका का अवलोकन करते हुये उसके काल की प्रतीक्षा कर रही थी। उसने देखा कि वाटिका के समस्त पुष्प एवं पत्र आदि नष्ट हो गये थे। वह व्यथित हो ही रही थी कि पुनः उसकी पुष्पवाटिका हरी-भरी हो गयी थी। इससे उसे ज्ञात हो गया कि उसका पति सुरक्षित है। वह प्रसन्न होकर अपने पिता से बोली कि - 'मेरा पति जीवित है, आप उसे खोजने का प्रयास कीजिये।' इधर वधू का पिता देवदास को खोजने हेतु निकला ही था कि उधर देवदास भी काशी से चल दिया तथा यात्रा करते हुये उसी स्थान पर पहुँच गया जहाँ उसका विवाह हुआ था। उसके आगमन की सूचना प्राप्त होते ही देवदत्त प्रसन्नतापूर्वक उसे अपने घर ले आया। तदुपरान्त सभी नगरवासी भी एकत्र हो गये एवं सभी ने विचार किया कि निश्चय ही यही देवदत्त का जमाई है। नववधू ने भी अपने पति को पहचान लिया। सभी ने उत्साह एवं आनन्दपूर्वक उसका स्वागत किया तदुपरान्त मामा एवं श्वशुर के सङ्ग वह घर के लिये विदा हुआ।

उन दोनों ने जाकर धनेश्वर एवं सत्यवती को सूचना दी कि - 'तुम्हारा पुत्र आ गया है।' यह सुनकर वे दोनों बोले कि - 'हम भाग्यहीनों के प्रारब्ध में पुत्र का सुख कहाँ है?' इस पर अन्य लोगों ने भी कहा कि - 'यह सत्य है, तुम्हारा पुत्र आ गया है।' जब अन्य सभी लोगों ने कहा तब वे दोनों ब्राह्मण दम्पति बन्धु-बान्धवों सहित प्रसन्नतापूर्वक अपने पुत्र का स्वागत करने हेतु चल दिये। पुत्र के सकुशल आगमन पर धनेश्वर ने विशाल एवं भव्य उत्सव का आयोजन किया तथा ब्राह्मणों को नाना प्रकार की भेंट-दक्षिणा आदि प्रदान कीं। इस प्रकार धनेश्वर द्वात्रिंशी पूर्णिमा व्रत के प्रभाव से पुत्रवान् हो गया।"

श्रीकृष्ण कहते हैं - "जो भी स्त्री इस व्रत का पालन करती है वह कभी विधवा नहीं होती तथा जन्म-जन्मान्तरों तक उसे सौभाग्य की प्राप्ति होती है यह मेरा वचन है। यह श्रेष्ठ व्रत पुत्र-पौत्रादि की वृद्धि करने वाला है। इस व्रत का पालन करने से जो भी मनोकामना होती है वह निश्चित ही पूर्ण हो जाती है। इस प्रकार द्वात्रिंशी पूर्णिमा व्रत का विधान एवं कथा पूर्ण होती है।"

पूर्णिमा व्रत की अन्य व्रत कथा

धर्मदत्त नामक ब्राह्मण की कथा

प्राचीन काल की बात है। एक समय नारद मुनि देवताओं के लोकों का भ्रमण करते हुये विष्णुलोक पहुँचे। वहाँ उन्हें श्रीहरि विष्णु के शङ्ख, चक्र, गदा एवं पद्मधारी रूप का दर्शन हुआ। उनके चरणों में प्रणाम करते हुये नारद जी ने प्रश्न किया - "हे भगवन्! कलियुग में ऐसा कौन-सा व्रत है, जिससे मनुष्य जीवन के समस्त कष्टों से मुक्त होकर पुण्य लाभ प्राप्त करे तथा अन्तकाल में मोक्ष को प्राप्त हो?"

भगवान विष्णु ने कहा - "हे नारद! जो मनुष्य 32 पूर्णिमा तिथियों तक श्रद्धा एवं नियमपूर्वक उपवास करता है, सत्यनारायण कथा का पाठ करता है, चन्द्रमा को अर्घ्य अर्पण करता है तथा ब्राह्मणों को दान करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को प्राप्त होता है। मैं इस व्रत से सम्बन्धित एक कथा का वर्णन करता हूँ, कृपया ध्यानपूर्वक श्रवण करो -

प्राचीन काल में विदिशा नगरी में धर्मदत्त नामक एक ब्राह्मण निवास करता था। वह घोर निर्धन होते हुये भी अत्यन्त धर्मनिष्ठ एवं भक्ति भाव वाला मनुष्य था। एक समय उसे स्वप्न में भगवान विष्णु ने दर्शन देते हुये कहा - "हे धर्मदत्त! तुम 32 पूर्णिमाओं का व्रत करो। प्रत्येक पूर्णिमा को उपवास करो, सत्यनारायण व्रत कथा का पाठ करो तथा ब्राह्मणों को भोजन कराओ। इससे तुम्हारे जीवन की दरिद्रता दूर होगी तथा अन्ततः तुम्हें मोक्ष प्राप्त होगा।"

धर्मदत्त ने भगवान विष्णु की आज्ञानुसार पूर्णिमा व्रत का पालन किया। प्रत्येक पूर्णिमा को स्नान, पूजन, कथा, अन्नदान, चन्द्रमा को अर्घ्य आदि सहित व्रत किया। 32वीं पूर्णिमा को उन्होंने ब्राह्मण भोज, हवन एवं विशेष पूजन के साथ व्रत का उद्यापन किया। तदुपरान्त उनके जीवन में अद्भुत परिवर्तन आया। इस दिव्य व्रत के प्रभाव से उन्हें धन-सम्पत्ति, यश एवं सन्तानों की प्राप्ति हुयी। अन्त समय में जब उनका भौतिक शरीर छूटा, तब इसी व्रत के पुण्यफल से उन्हें विष्णुलोक की प्राप्ति हुयी।"

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