भगवान राम हिन्दु धर्म के सर्वाधिक सम्मानीय एवं पूजनीय देवताओं में से एक हैं। उन्हें भगवान विष्णु का सातवाँ अवतार माना जाता है। भगवान राम, भगवान विष्णु के सर्वाधिक लोकप्रिय अवतारों में से एक हैं। विभिन्न दानवों का संहार एवं साधुजनों का कल्याण करने हेतु भगवान विष्णु, श्रीराम जी के रूप में अवतरित हुये थे।

भगवान राम का जन्म त्रेतायुग में हुआ था, जो धर्मग्रन्थों में वर्णित चार युगों में से एक है। अपने उच्च आदर्शों एवं धर्मपरायणता के कारण भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में भी जाना जाता है। भगवान राम अयोध्या नरेश महाराज दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र थे। महाराज दशरथ की तीन रानियाँ थीं, जिनका नाम कौशल्या, सुमित्रा एवं कैकेयी था।
त्रेतायुग में महाराज दशरथ ने सन्तान प्राप्ति की कामना से ऋष्यशृङ्ग (शृङ्गी ऋषि) की सहायता से अश्वमेध एवं पुत्रकामेष्टि यज्ञ सम्पन्न किया था। यज्ञ के समय यज्ञकुण्ड से दिव्याग्नि प्रकट हुयी तथा उसने महाराज दशरथ को एक खीर का पात्र प्रदान किया। दिव्याग्नि ने पुत्र प्राप्ति हेतु राजा दशरथ को वह खीर अपनी रानियों में वितरित करने को कहा।
कौशल्या ने आधी खीर का सेवन किया तथा सुमित्रा ने खीर के चतुर्थ भाग का सेवन किया। कैकेयी ने भी उस खीर के कुछ भाग का सेवन कर उसे सुमित्रा को दे दिया, जिन्होंने एक बार पुनः उसका सेवन कर लिया। फलस्वरूप कौशल्या ने भगवान राम, कैकेयी ने भरत तथा सुमित्रा ने लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न नामक जुड़वाँ सन्तानों को जन्म दिया।
महाराज दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र भगवान राम तथा उनसे छोटे भरत थे। मान्यताओं के अनुसार लक्ष्मण व शत्रुघ्न का जन्म भगवान राम के जन्म के दो दिवस पश्चात् हुआ था। भगवान राम के जन्मदिवस को राम नवमी के रूप में मनाया जाता है, जो हिन्दु कैलेण्डर के अनुसार चैत्र माह के शुक्ल पक्ष में आती है।
भगवान राम एवं भरत श्याम वर्ण के थे, जबकि लक्ष्मण व शत्रुघ्न गौर वर्ण के थे। अधिकांशतः भगवान राम के स्वरूप को भगवान कृष्ण के समान ही नीलवर्ण वाला दर्शाया जाता है। भगवान श्रीराम धनुष तथा पीठ पर बाणों से भरा तरकस धारण करते हैं।
रामायण के कुछ संस्करणों के अनुसार भगवान राम की एक ज्येष्ठ बहन भी थीं, जो महाराज दशरथ एवं उनकी प्रथम पत्नी कौशल्या की पुत्री थीं। उनका नाम शान्ता था तथा उन्हें महाराज रोमपाद ने गोद ले लिया था। कालान्तर में शान्ता का विवाह ऋष्यशृङ्ग के साथ हो गया था। शान्ता का जन्म महाराज दशरथ की अन्य दो रानियों सुमित्रा एवं कैकेयी के साथ विवाह से पूर्व हुआ था।
महाराज दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण स्वाभाविक रूप से भगवान राम ही अयोध्या के सिंहासन के उत्तराधिकारी थे। किन्तु कैकेयी अपने पुत्र भरत को अयोध्या का राजा बनाना चाहती थीं। महाराज दशरथ ने कदाचित् कैकेयी को उनके दो मनोवाञ्छित वरदानों की पूर्ति का वचन दिया था। वचन पालन हेतु राजा दशरथ ने अपने पुत्र राम को चौदह वर्ष का वनवास दे दिया।
अयोध्या से जाते समय भगवान राम के साथ उनकी अर्धाङ्गिनी देवी सीता एवं अनुज लक्ष्मण ने भी वनवास पर जाने का निर्णय लिया। वनवास काल में भगवान राम ने दैत्यराज रावण का वध कर दिया, जिसने छलपूर्वक साधु के भेष में देवी सीता का हरण किया था। जिस दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था, उस दिन को विजयादशमी अथवा दशहरा के रूप में मनाया जाता है।
चौदह वर्ष के पश्चात् भगवान राम पुनः अयोध्या आये तथा उन्होंने राजपाठ ग्रहण किया। हिन्दुओं का सर्वाधिक लोकप्रिय पर्व दीवाली, भगवान राम के वनवास पूर्ण कर पुनः अयोध्या आगमन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।
भगवान राम एक आदर्श राजा थे तथा उनके शासन को वर्तमान में भी रामराज्य के रूप में जाना जाता है। अयोध्या पर अनेक वर्षों तक शासन करने के पश्चात् भगवान राम ने अपने भ्राताओं सहित सरयू नदी में जल समाधि ग्रहण कर ली थी।
भगवान राम के पिता दशरथ एवं माता कौशल्या थीं। राजा दशरथ की सुमित्रा एवं कैकेयी नाम की दो अन्य पत्नियाँ भी थीं। उनके तीन भ्राता थे, जिन्हें लक्ष्मण, भरत एवं शत्रुघ्न के नाम से जाना जाता है। भगवान राम की एक बहन भी थीं, जिनका नाम शान्ता था। राम जी का विवाह देवी सीता के साथ हुआ था, जो राजा जनक की पुत्री थीं। भगवान राम के लव एवं कुश नामक दो पुत्र थे, जिनका जन्म भगवान राम द्वारा देवी सीता के त्याग के उपरान्त ऋषि वाल्मीकि के आश्रम में हुआ था।
सामान्यतः भगवान राम को नीलवर्ण अथवा श्यामवर्ण वाला एवं द्विभुज रूप में दर्शाया जाता है। भगवान राम को एक भुजा में कोदण्ड नामक धनुष धारण किये हुये तथा दूसरी भुजा को वरद मुद्रा में अथवा तीर लिये हुये दर्शाया जाता है। उनके कन्धे पर दिव्य बाणों से युक्त तरकश सुशोभित रहता है। वे सुन्दर पिताम्बरी धारण करते हैं तथा उनका मुखमण्डल सदैव प्रसन्नचित्त भाव-भङ्गिमा से युक्त रहता है।
भगवान राम के कुछ अन्य रूपों में उन्हें चतुर्भुज रूप में भी दर्शाया जाता है। इस रूप में राम जी को चार भुजाओं में चक्र, पद्म, धनुष तथा तीर धारण किये हुये दर्शाया जाता है।
सामान्य मन्त्र -
ॐ श्री रामचन्द्राय नमः।
ॐ रां रामाय नमः।
श्रीराम तारक मन्त्र -
श्री राम, जय राम, जय जय राम।
श्रीराम गायत्री मन्त्र -
ॐ दाशरथये विद्महे सीतावल्लभाय धीमहि।
तन्नो रामः प्रचोदयात्॥