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2027 मदन द्वादशी का दिन और पूजा का समय लँकेस्टर, California, संयुक्त राज्य अमेरिका के लिये

DeepakDeepak

2027 मदन द्वादशी

लँकेस्टर, संयुक्त राज्य अमेरिका
मदन द्वादशी
17वाँ
अप्रैल 2027
Saturday / शनिवार
गरुड़ पर सवार भगवान विष्णु
Lord Vishnu on Garuda

मदन द्वादशी समय

मदन द्वादशी शनिवार, अप्रैल 17, 2027 को
18वाँ अप्रैल को, मदन द्वादशी पारण समय - 06:17 ए एम से 08:55 ए एम
पारण के दिन द्वादशी सूर्योदय से पहले समाप्त हो जाएगी।
द्वादशी तिथि प्रारम्भ - अप्रैल 16, 2027 को 08:57 पी एम बजे
द्वादशी तिथि समाप्त - अप्रैल 17, 2027 को 07:12 पी एम बजे

टिप्पणी: सभी समय १२-घण्टा प्रारूप में लँकेस्टर, संयुक्त राज्य अमेरिका के स्थानीय समय और डी.एस.टी समायोजित (यदि मान्य है) के साथ दर्शाये गए हैं।
आधी रात के बाद के समय जो आगामि दिन के समय को दर्शाते हैं, आगामि दिन से प्रत्यय कर दर्शाये गए हैं। पञ्चाङ्ग में दिन सूर्योदय से शुरू होता है और पूर्व दिन सूर्योदय के साथ ही समाप्त हो जाता है।

मदन द्वादशी 2027

भविष्यपुराण तथा मत्स्यपुराण आदि धर्मग्रन्थों में प्राप्त वर्णन के अनुसार चैत्र माह के शुक्लपक्ष की द्वादशी तिथि को मदन द्वादशी व्रत किया जाता है। भविष्यपुराण में प्राप्त वर्णन के अनुसार चैत्र शुक्ल द्वादशी को मदन द्वादशी व्रत का पालन करने वाला मनुष्य समस्त पापों से मुक्त होकर भगवान विष्णु की समता को प्राप्त हो जाता है। इस पुण्यशाली व्रत के प्रभाव से व्रती को इस लोक में श्रेष्ठ पुत्रों की प्राप्ति होती है तथा वह सुख-सौभाग्य से सम्पन्न जीवन व्यतीत करता है। मतान्तर से इस दिन वामन द्वादशी व्रत का पालन भी किया जाता है, जिसमें भगवान वामन की पूजा की जाती है।

हिन्दु धर्म में द्वादशी व्रत को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना जाता है। विशेषतः वैष्णव सम्प्रदाय के अनुयायियों के मध्य यह व्रत विशेष रूप से प्रचलित है। प्रत्येक माह की द्वादशी का एक विशेष महत्त्व एवं पुण्यफल होता है। मदन द्वादशी व्रत के पुण्य प्रभाव से महर्षि कश्यप को प्रसन्न करके देवी दिति ने उनचास मरुद्गणों को पुत्र रूप में प्राप्त किया था। धर्मराज युधिष्ठिर के पूछने पर भगवान श्रीकृष्ण ने इस व्रत का माहात्म्य एवं विधान उनके समक्ष वर्णित किया था।

मदन द्वादशी व्रत एवं पूजा विधि - भविष्यपुराणोक्त

भविष्यपुराण एवं स्कन्दपुराण में प्राप्त मदन द्वादशी व्रत विधान के अनुसार, व्रतधारी को चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि के दिन श्वेत चावलों से भरा हुआ छिद्र रहित एक घट की कलश स्थापना करनी चाहिये। उस घट पर श्वेत चन्दन का अनुलेपन करके उसे श्वेत वस्त्र के दो टुकड़ों से आच्छादित करें। कलश के निकट नाना प्रकार के ऋतु-फल एवं गन्ने के टुकड़े रखें। कलश विभिन्न प्रकार की खाद्य सामग्रियों से युक्त होना चाहिये तथा उसमें यथाशक्ति सुवर्ण-खण्ड भी डालना चाहिये।

तदुपरान्त कलश के मुख पर गुड़ से परिपूर्ण एक ताम्र पात्र स्थापित करना चाहिये। उस ताम्र पात्र के ऊपर केले के पत्ते पर कामदेव एवं शक्कर समन्वित देवी रति की स्थापना करें। तत्पश्चात् गन्ध, धूप आदि उपचारों से उनका पूजन करें तथा गायन, वादन एवं संगीत आदि आयोजन करें। अर्थाभाव के कारण यदि गायन, वादन आदि का प्रबन्ध करने में असमर्थ हैं तो भगवान विष्णु एवं कामदेव की कथा आयोजित करें। तदुपरान्त कामदेव नामक भगवान विष्णु को सुगन्धित जल से स्नान करायें तथा श्वेत पुष्प, अक्षत एवं तिलों द्वारा भगवान मधुसूदन की विधि-विधान पूर्वक पूजा-अर्चना करें।

तदनन्तर, भगवान विष्णु के चरणों में कामदेव, जङ्घाओं में सौभाग्यदाता, वक्षःस्थल में अनङ्ग, मुख में पद्ममुख, बाहुओं में पञ्चशर तथा मस्तक में सर्वात्मा को नमस्कार है, ऐसा कहकर भगवान केशव का साङ्गोपाङ्ग पूजन करें। तदुपरान्त प्रातःकाल वह घट किसी सुयोग्य ब्राह्मण को दान कर दें। श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणों को भोजन करायें तथा स्वयं भी नमक रहित भोजन ग्रहण करें। ब्राह्मणों को दक्षिणा प्रदान कर निम्नोक्त मन्त्र का उच्चारण करें -

प्रियतामत्र भगवान् कामरूपी जनार्दनः।
हृदये सर्वभूतानां य आनन्दोऽभिधीयते॥

भावार्थ - "जो समस्त प्राणियों के हृदय में विद्यमान रहते हैं तथा जिन्हें आनन्द कहा जाता है, वे कामरूपी भगवान जनार्दन मेरे इस अनुष्ठान से प्रसन्न हों।"

उपरोक्त विधि द्वारा प्रत्येक माह में मदन द्वादशी व्रत का अनुष्ठान करना चाहिये। व्रतधारी को द्वादशी के दिन एक आमलक अथवा फल का सेवन कर भूमि-शयन करना चाहिये तथा त्रयोदशी के दिन भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिये।

मदन द्वादशी व्रत उद्यापन विधि

बारह माह तक निरन्तर मदन द्वादशी व्रत का पालन करने के उपरान्त तेरहवाँ माह आने पर घृतधेनु, अर्थात् घृत से निर्मित गौ सहित समस्त सामग्रियों से सम्पन्न शय्या, कामदेव की स्वर्ण-निर्मित प्रतिमा तथा श्वेत वर्ण की दुधारू गौ भगवान अनङ्ग को अर्पित करें। समस्त सामग्री भगवान अनङ्ग, अर्थात् कामदेव को अर्पित करने के उपरान्त ब्राह्मण को दान करें। तदनन्तर सामर्थ्यानुसार वस्त्राभूषणों द्वारा सपत्नीक ब्राह्मण देव का पूजन करें तथा उन्हें शय्या एवं सुगन्ध आदि प्रदान करते हुये कहें - "आप प्रसन्न हों।" तदुपरान्त व्रतधारी मनुष्य को गोदुग्ध से निर्मित हवि एवं श्वेत तिलों द्वारा हवन करना चाहिये। पुनः कृपणता का त्याग करते हुये ब्राह्मणों को भोजन करना चाहिये तथा उन्हें यथाशक्ति पुष्पमाला से सुशोभित कर गन्ना प्रदान करना चाहिये।

जो उक्त विधि के अनुसार मदन द्वादशी का व्रत करता है उसके समस्त पापों का शमन हो जाता है तथा भगवान विष्णु के सारूप्य मोक्ष प्राप्ति उसे होती है। इस व्रत के फलस्वरूप मनुष्य को पुत्र-पौत्रादि की प्राप्ति होती है तथा उसके जीवन में सुख-शान्ति का सञ्चार होता है।

व्रत परिचय में वर्णित मदन द्वादशी व्रत विधि

सर्वप्रथम प्रातःकाल नित्य कर्मों से निवृत्त होकर जल में गुड़ डालकर स्नान करें। तदुपरान्त पूजन स्थल पर एक वेदी पर चावलों से भरा कलश स्थापित करें। कलश के ऊपर ताम्र पात्र में गुड़ भरकर उस पर भगवान विष्णु की सुवर्ण की मूर्ति विराजमान करें। तदुपरान्त गन्ध-पुष्प आदि द्वारा षोडशोपचार श्रीविष्णु पूजन करें। भगवान विष्णु को ईख सहित विभिन्न प्रकार के फल, पुष्प एवं नैवेद्य अर्पित करें। उनमें से एक फल लेकर स्वयं ग्रहण करें। उक्त विधि से तेरह माह तक द्वादशी व्रत पालन करने से मनुष्य को पुत्र-शोक नहीं होता है।

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द्रिक पञ्चाङ्ग और पण्डितजी लोगो drikpanchang.com के पञ्जीकृत ट्रेडमार्क हैं।
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