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रामलक्ष्मण द्वादशी व्रत कथा | ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी व्रत कथा

DeepakDeepak

रामलक्ष्मण द्वादशी कथा

रामलक्ष्मण द्वादशी व्रत कथा

द्वादशी व्रत के फल से महाराज दशरथ को चार पुत्रों की प्राप्ति की कथा

ऋषि दुर्वासा कहते हैं - "जिस प्रकार वैशाख शुक्ल द्वादशी को परशुराम द्वादशी व्रत किया जाता है, उसी प्रकार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में श्रीरामलक्ष्मण द्वादशी व्रत होता है। इस अवसर पर मनुष्य को नाना प्रकार के पवित्र एवं सुगन्धित पुष्पों से परम प्रभु परमात्मा की पूजा-अर्चना करनी चाहिये।

ॐ रामाभिरामाय नमः का उच्चारण करते हुये श्री भगवान के दोनों चरणों का पूजन करें। इसी प्रकार ॐ त्रिविक्रमाय नमः से कटि प्रदेश की, ॐ धृतविश्वाय नमः से उनके उदर की, ॐ संवत्सराय नमः से हृदय की, ॐ संवर्तकाय नमः से कण्ठ की, ॐ सर्वास्त्रधारिणे नमः से भुजाओं की, ॐ सहस्रशिरसे नमः से भगवान के शिरःप्रदेश की पूजा करें। ॐ पाञ्चजन्याय नमः से शङ्ख एवं ॐ सुदर्शनचक्राय नमः से चक्र का पूजन करें।

उपरोक्त विधि से पूजन करने के पश्चात् विधिपूर्वक कलश स्थापना करें तथा उसे वस्त्र से आच्छादित कर दें। तदनन्तर कलश पर भगवान राम एवं श्रीलक्ष्मण की सुवर्णमयी प्रतिमा स्थापित करें। तदुपरान्त उनका विधिवत् षोडशोपचार पूजन करें। पुत्र की कामना करने वाला मनुष्य प्रातःकाल उन प्रतिमाओं को ब्राह्मणों को दान कर दे।

पूर्वकाल का वृत्तान्त है कि, अयोध्या नरेश महाराज दशरथ के कोई पुत्र नहीं थे। अतः इस कारण वे अत्यन्त व्याकुल रहते थे। एक समय दशरथ जी हृदय में पुत्र प्राप्ति की लालसा लेकर महर्षि वशिष्ठ की शरण में गये तथा विभिन्न प्रकार से उनका पूजन आदि कर उनसे कहा - 'हे मुनिवर! मैं अपने हृदय में पुत्र प्राप्ति की अभिलाषा लेकर आपकी शरण में उपस्थित हुआ हूँ। कृपया मेरा मार्गदर्शन करने की कृपा करें।'

दशरथ जी की करुण प्रार्थना से द्रवित होकर महर्षि वशिष्ठ ने उनके समक्ष ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी व्रत के विधान का विस्तृत वर्णन किया। वशिष्ठ मुनि से व्रत का उपदेश प्राप्त कर महाराज दशरथ ने विधिपूर्वक द्वादशी व्रत का अनुष्ठान सम्पन्न किया। इस परम पुण्यप्रद व्रत के फलस्वरूप स्वयं भगवान श्रीहरि ने दशरथनन्दन भगवान राम के रूप में अवतार लिया।"

दुर्वासा जी कहते हैं - "हे महामुने! उस समय परम पुरुष भगवान श्रीहरि ने स्वयं को चार रूपों में विभक्त कर लिया, जो समस्त लोकों में राम, लक्ष्मण, भरत एवं शत्रुघ्न के रूप में प्रतिष्ठित हुये।

यह तो इस लोक का फल है, अब द्वादशी व्रत का परलोक में माहात्म्य सुनो। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन करता है वह देवराज इन्द्र सहित सम्पूर्ण देवताओं के स्वर्ग में निवास करने तक स्वर्गलोक में भाँति-भाँति के ऐश्वर्यों का सुख भोगता है। तदुपरान्त वहाँ की समयावधि समाप्त होने पर पुनः मर्त्यलोक में जन्म लेता है। यहाँ जन्म लेकर वह सौ यज्ञ करने वाले राजा के रूप में प्रतिष्ठित होता है।

जो भक्त इस व्रत का निष्काम भाव से पालन करता है, उसके समस्त पातक नष्ट हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त उसे भगवान श्रीहरि के कैवल्य पद की प्राप्ति होती है, जो परम पवित्र एवं शाश्वत है।"

॥इस प्रकार श्रीवराहपुराण में वर्णित श्रीरामलक्ष्मण द्वादशी व्रत माहात्म्य सम्पूर्ण होता है॥


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