श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण के अनुसार, प्राचीन काल में असुर दम्भ को महिषासुर नामक एक पुत्र की प्राप्ति हुयी थी, जिसके भीतर बाल्यकाल से ही अमर होने की प्रबल इच्छा थी। अपनी इसी इच्छा की पूर्ति के लिये उसने अमर होने का वरदान प्राप्त करने हेतु भगवान ब्रह्मा के निमित्त घोर तपस्या आरम्भ की। महिषासुर द्वारा की गयी इस कठोर तपस्या से ब्रह्माजी प्रसन्न हुये तथा उसे मनचाहा वरदान माँगने को कहा। ऐसे में महिषासुर, जो केवल अमर होने का इच्छुक था, उसने ब्रह्माजी से अमरत्व का वरदान माँगा।
परन्तु ब्रह्माजी ने महिषासुर को अमरता का वरदान देने की बात यह कहते हुये टाल दी कि जन्म के उपरान्त मृत्यु तथा मृत्यु के उपरान्त पुनर्जन्म निश्चित है, इसीलिये अमरता का वरदान प्रदान करना सम्भव नहीं है। ब्रह्माजी के मुख से यह सुनकर महिषासुर ने उनसे एक अन्य वरदान माँगने की इच्छा व्यक्त की एवं कहा - "हे स्वामी! यदि मृत्यु होना निश्चित है, तो मुझे ऐसा वरदान प्रदान कीजिये कि मेरी मृत्यु केवल किसी स्त्री के हाथों ही हो। इसके अतिरिक्त कोई दैत्य, मानव अथवा देवता मेरा वध न कर सके।"
इसके पश्चात् ब्रह्माजी ने महिषासुर को यह वरदान प्रदान कर दिया। ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त करते ही महिषासुर अहङ्कार से अन्धा हो गया तथा उसके अत्याचार निरन्तर बढ़ने लगे। मृत्यु के भय से मुक्त होकर उसने अपनी विशाल सेना के साथ पृथ्वीलोक पर आक्रमण कर दिया। उसके अत्याचारों से पृथ्वी पर चारों ओर विनाश होने लगा। उसके बल तथा पराक्रम के सम्मुख समस्त जीव-जन्तु एवं प्राणी नतमस्तक होने लगे। पृथ्वीलोक एवं पाताललोक को अपने अधीन करने के पश्चात् अहङ्कारी महिषासुर ने स्वर्गलोक पर भी आक्रमण कर दिया तथा इन्द्रदेव को पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया।
महिषासुर के अत्याचारों से पीड़ित होकर सभी देवी-देवता त्रिदेवों अर्थात् भगवान ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश के समीप सहायता के लिये पहुँचे। तब भगवान विष्णु ने उसके वध के लिये देवी शक्ति के प्राकट्य का सुझाव दिया। भगवान विष्णु के निर्देश पर सभी देवताओं ने सङ्घटित होकर देवी शक्ति का आह्वान किया। उनकी इस पुकार को सुनकर सभी देवताओं की देह से उत्सर्जित दिव्य तेज ने मिलकर एक अत्यन्त सुन्दर देवी का स्वरूप धारण किया। उसी दिव्य तेज से माँ आदिशक्ति प्रकट हुयीं, जिनके अनुपम रूप एवं अलौकिक तेज का दर्शन कर सभी देवता आश्चर्यचकित रह गये।
त्रिदेवों की सहायता से प्रकट हुयी देवी दुर्गा को हिमवान ने वाहन के रूप में सिंह प्रदान किया। इसी प्रकार वहाँ उपस्थित सभी देवताओं ने भी माँ को अपने-अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र अर्पित किये। इस प्रकार देवी दुर्गा को महिषासुर के संहार हेतु सुसज्जित किया गया। देवी का अत्यन्त सुन्दर रूप देखकर महिषासुर उनके प्रति आकर्षित हो गया तथा उसने अपने एक दूत के माध्यम से देवी माँ के समक्ष विवाह का प्रस्ताव भेजा। अहङ्कारी महिषासुर की इस धृष्टता से देवी भगवती अत्यन्त कुपित हो गयीं तथा उन्होंने महिषासुर को युद्ध के लिये ललकारा।
माँ दुर्गा की युद्ध-ललकार सुनकर ब्रह्माजी से प्राप्त वरदान के अहङ्कार में अन्धा हो चुका महिषासुर युद्ध के लिये तत्पर हो गया। इस भीषण युद्ध में माँ दुर्गा ने एक-एक करके महिषासुर की सम्पूर्ण राक्षस सेना का सर्वनाश कर दिया। यह भीषण युद्ध निरन्तर नौ दिवस तक चला। इस अवधि में असुरों के राजा महिषासुर ने अनेक रूप धारण करके देवी माँ को छलने का प्रयास किया, किन्तु उसकी सभी योजनायें अन्ततः असफल रहीं। अन्त में देवी भगवती ने अपने चक्र से मस्तक काटकर उसका वध कर दिया। इस प्रकार देवी भगवती के पावन कर-कमलों द्वारा महिषासुर का अन्त हुआ।
मान्यताओं के अनुसार जिस दिन माँ भगवती ने स्वर्गलोक, पृथ्वीलोक तथा पाताललोक को महिषासुर के अत्याचारों से मुक्त कराया, उसी दिन से दुर्गा अष्टमी के पावन पर्व की परम्परा आरम्भ हुयी थी।
॥इस प्रकार श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण में वर्णित दुर्गा अष्टमी व्रत कथा सम्पूर्ण होती है॥