पूर्वकाल में ऋषि पुलस्त्य के कुल में ऋषि विश्रवा के पुत्रों के रूप में रावण, कुम्भकर्ण आदि राक्षसों का जन्म हुआ। यद्यपि वे ऋषि पुलस्त्य के पवित्र, निर्मल एवं अनुपम कुल में उत्पन्न हुये थे, तथापि पूर्वजन्म के शाप के कारण वे सभी पापरूप हो गये। वे सभी इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, दुष्ट, कुटिल, निर्दयी, हिंसक पापी तथा प्राणियों को दुःख प्रदान करने वाले थे। कालान्तर में रावण, कुम्भकर्ण एवं विभीषण तीनों भ्राताओं ने नाना प्रकार से अत्यन्त कठिन तपस्या की तथा भगवान ब्रह्मा से वरदान प्राप्त कर परम शक्तिशाली हो गये। यद्यपि विभीषण ने ब्रह्माजी से भगवान के चरणों की निष्काम भक्ति का वर माँगा था।
वरदान प्राप्त करने के पश्चात् रावण एवं कुम्भकर्ण समस्त लोकों में उपद्रव करने लगे। अत्यन्त विशालकाय कुम्भकर्ण छः माह तक मदिरापान कर शयन करता था तथा शेष छः माह अपने अत्याचारों से सभी को पीड़ित करता था। रावण का पुत्र मेघनाथ भी भीषण बलशाली एवं मायावी योद्धा था। रावण के चलने मात्र से सम्पूर्ण धरा डगमगाने लगती थी। अपने बाहुबल के अभिमान में चूर होकर रावण देवताओं को युद्ध के लिये ललकारने लगा। उसने देव, नाग, किन्नर, मनुष्य आदि सभी पर अत्याचार आरम्भ कर दिया। रावण एवं मेघनाथ के मार्गदर्शन में समस्त राक्षस दसों दिशाओं में उपद्रव करने लगे। वे जिस स्थान पर भी गौ एवं ब्राह्मण को पाते थे, उसी नगर, ग्राम आदि का सम्पूर्ण विध्वंस कर देते थे। उनके भय से संसार से यज्ञ, श्राद्ध, तर्पण, वेदपाठ तथा भक्ति आदि सत्कर्मों का लोप हो गया तथा चहुँओर अधर्माचरण होने लगा।
उस समय धर्म के प्रति मनुष्यों में ग्लानि, अरुचि एवं अनास्था से भयभीत होकर देवी पृथ्वी अत्यन्त व्याकुल हो गयीं तथा गौ का रूप धारण कर उस स्थान पर गयीं जहाँ देवता एवं मुनिगण रावण के भय से छिपे थे। देवी पृथ्वी की व्यथा सुनकर समस्त देवता, मुनिगण एवं गन्धर्व आदि सत्यलोक में ब्रह्माजी के समक्ष पहुँचे। ब्रह्माजी उनकी पीड़ा से अवगत थे, अतः उन्होंने देवी पृथ्वी से कहा - "हे पृथ्वि! धैर्यपूर्वक भगवान श्रीहरि का ध्यान करो। वे अपने भक्तों की पीड़ा जानते हैं तथा अवश्य ही तुम्हारे कष्ट का निवारण करेंगे।" ऐसा कहकर भगवान ब्रह्मा एवं देवी पृथ्वी सहित समस्त देवता आदि भगवान विष्णु का ध्यान करते हुये प्रार्थना करने लगे।
समस्त देवताओं सहित देवी पृथ्वी को भयभीत एवं व्याकुल होते हुये देख उसी समय एक दिव्य आकाशवाणी हुयी - "हे मुनि, सिद्ध एवं देवताओं के स्वामियों! भयभीत मत हो! भविष्य में मैं तुम्हारी रक्षा एवं अधर्म का नाश करने हेतु मनुष्य रूप धारण करूँगा तथा पवित्र सूर्यवंश में अंशों सहित मनुष्य अवतार लूँगा। कश्यप एवं अदिति ने अत्यन्त कठिन तप किया था, जिसके फलस्वरूप मैं उन्हें वर प्रदान कर चुका हूँ। वे ही दोनों दशरथ एवं कौशल्या के रूप में मनुष्यों के राजा होकर श्रीअयोध्यापुरी में प्रकट हुये हैं। उन्हीं के यहाँ मैं रघुकुल में चार भ्राताओं के रूप में पराशक्ति सहित अवतार लूँगा। मैं पृथ्वी का समस्त भार हर लूँगा। हे देवगणों! तुम निर्भय हो जाओ।"
इस प्रकार भगवान की आकाशवाणी सुनकर देवी पृथ्वी, देवता, गन्धर्व एवं मुनिगण आदि का हृदय शीतल हो गया तथा ब्रह्माजी ने सभी देवताओं को वानर रूप धारण कर भूलोक पर भगवान की सेवा में तत्पर होने का आदेश दिया। उनका आदेश पाकर देवगण निज लोकों को लौट गये।
कालान्तर में अवधपुरी में परम प्रतापी राजा दशरथ का जन्म हुआ। वे धर्माचरण करने वाले, गुणवान एवं अत्यन्त ज्ञानवान थे। उनकी कौशल्या, कैकेयी, सुमित्रा नामक तीनों रानियाँ भी पवित्र आचरण वाली एवं विनयशील थीं। एक समय राजा के मन में यह विचार कर अत्यन्त ग्लानि हुयी कि मेरे कोई पुत्र नहीं है। राजा तत्क्षण ही अपने गुरुदेव की शरण में गये तथा उनके चरणों में प्रणाम करते हुये विनयपूर्वक अपनी व्यथा सुनायी।
गुरु वशिष्ठ ने राजा को समझाते हुये कहा - "हे राजन्! तुम धैर्य धारण करो, भविष्य में तुम्हारे चार पुत्र होंगे। वे तीनों लोकों में प्रतिष्ठित एवं भक्तों के भय को हरने वाले होंगे।" ऐसा कहकर गुरु वशिष्ठ ने शृङ्गी ऋषि के द्वारा पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाया। यज्ञाग्नि से अग्नि देव चरु अर्थात् हविष्यान्न खीर लेकर प्रकट हुये।
अग्निदेव ने राजा दशरथ से कहा - "हे राजन्! ऋषि वसिष्ठ के हृदय में जो मनोरथ था, तुम्हारा वह मनोरथ सिद्ध हो गया। अब तुम इस हविष्यान्न पायस को इच्छानुसार रानियों में विभाजित कर दो। इसके प्रभाव से तुम्हें पुत्र-प्राप्ति अवश्य होगी।" तदुपरान्त अग्निदेव यज्ञस्थल से अन्तर्धान हो गये।
राजा को अत्यन्त हर्ष हुआ तथा उन्होंने तत्काल अपनी प्रिय रानियों को बुलाया। तदनन्तर राजा ने पायस का आधा भाग रानी कौसल्या को दिया तथा शेष आधे भाग के दो भाग किये। उनमें से एक भाग रानी कैकेयी को दिया तथा शेष पायस के पुनः दो भाग किये गये। राजा ने वे दोनों भाग कौसल्या एवं कैकेयी की अनुमति से रानी सुमित्रा को प्रदान कर दिये।
इस प्रकार उस दिव्य पायस के प्रभाव से भविष्य में तीनों रानियाँ गर्भवती हुयीं। इस दिव्य सुख की अनुभूति से उनका हृदय आनन्दित हो उठा। जिस दिन से भगवान श्रीहरि लीला करते हुये गर्भ में प्रविष्ट हुये, उसी समय से समस्त लोकों में सुख-शान्ति का प्रसार होने लगा। शोभा, शील एवं तेज से युक्त होकर तीनों रानियाँ महल में सुखपूर्वक समय व्यतीत करने लगीं। शनैः-शनैः समय व्यतीत हुआ तथा प्रभु के प्रकट होने का पावन अवसर आ गया। योग, लग्न, ग्रह, वार तथा तिथि आदि सभी अनुकूल हो गये। जड़ एवं चेतन सभी हर्षित होने लगे, क्योंकि श्रीराम का जन्म सभी सुखों का स्रोत है।
परम पवित्र चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि थी। भगवान का अत्यन्त प्रिय अभिजित मुहूर्त था। मध्याह्न का समय था। वह पवित्र समय समस्त लोकों को शान्ति प्रदान करने वाला था। शीतल, मन्द एवं सुगन्धित वायु प्रवाहित हो रही थी। देवताओं एवं मुनियों में हर्षोल्लास का सञ्चार हो रहा था। वन में चहुँओर पुष्प सुशोभित थे, पर्वतों के समूह मणियों से देदीप्यमान हो रहे थे तथा समस्त नदियाँ अमृत की धारा प्रवाहित कर रही थीं।
जब ब्रह्माजी को भगवान के प्रकट होने का अवसर ज्ञात हुआ तब वे समस्त देवताओं सहित सुसज्जित विमान में आरूढ़ होकर चले। सम्पूर्ण आकाशमण्डल देवताओं के समूहों से अलङ्कृत हो गया। गन्धर्व गायन-वादन सहित भगवान के गुणों का गान करते हुये पुष्पवर्षा करने लगे। आकाश में मृदङ्ग आदि का स्वर गुञ्जायमान हो रहा था। नाग, किन्नर, देवता तथा मुनि आदि स्तुति करने लगे तथा अनेक प्रकार से अपनी-अपनी सेवा भेंट करने लगे। उसी समय समस्त लोकों को शान्ति प्रदान करने वाले जगदीश्वर भगवान का प्राकट्य हुआ।
दीन-दुखियों पर दया करने वाले, कौसल्या जी का हित करने वाले प्रभु प्रकट हुये। मुनियों के मन को मोहित करने वाले भगवान के अद्भुत रूप का विचार करके माता हर्षित हो गयीं। भगवान का दिव्य श्यामवर्ण रूप नेत्रों को आनन्दित करने वाला था। वे चारों भुजाओं में आयुध धारण किये हुये थे, दिव्य आभूषणों एवं वनमाला से अलङ्कृत थे। इस प्रकार विशाल नयनों वाले भगवान प्रकट हुये।
भगवान के इस रूप का दर्शन करके दोनों हाथ जोड़कर माता कौसल्या ने कहा - "हे अनन्त! मैं किस प्रकार तुम्हारी स्तुति करूँ। वेद-पुराणों ने तुमको माया, गुण एवं ज्ञान से परे तथा परिमाण रहित कहा है। श्रुतियाँ एवं मुनिगण दया एवं सुख का सागर, गुणों का धाम कहकर जिनका गान करते हैं, वही भक्तों पर प्रेम करने वाले लक्ष्मीपति भगवान मेरे कल्याण के लिये प्रकट हुये हैं। वेदों के अनुसार तुम्हारे प्रत्येक रोम में माया से रचित अनेकों ब्रह्माण्डों के समूह विद्यमान हैं। हे तात! यह रूप त्यागकर अत्यन्त प्रिय बाललीला करने की कृपा कीजिये, मेरे लिये यह सुख परम आनन्दमयी होगा।" माता के प्रेमपूर्ण वचन सुनकर देवताओं के स्वामी भगवान ने बालरूप होकर रुदन आरम्भ कर दिया।
शिशु के रुदन की मधुर ध्वनि सुनकर सभी रानियाँ उत्सुक होकर चली आयीं। दासियाँ हर्षित होकर महल में घूमने लगीं। समस्त नगरवासी आनन्द में मग्न हो गये। राजा दशरथ को पुत्र जन्म का शुभ-समाचार सुनकर ब्रह्मानन्द की अनुभूति होने लगी। उनके मन में अतिशय प्रेम उमड़ने लगा तथा अङ्ग-प्रत्यङ्ग पुलकित होने लगे। उन्होंने गुरु वशिष्ठ को आमन्त्रित किया। वशिष्ठजी ब्राह्मणों सहित राजभवन में पधारे तथा बालक का दर्शन किया।
तदुपरान्त राजा दशरथ ने नान्दीमुख श्राद्ध करके जातकर्म संस्कार आदि सम्पन्न किये तथा ब्राह्मणों को स्वर्ण, गौ, वस्त्र तथा मुक्ता-मणियों का दान किया। समस्त नगर ध्वजा, पताका, तोरण आदि से सुसज्जित थे तथा आकाश से पुष्पवर्षा हो रही थी। स्त्रियाँ समूह में स्वर्ण कलश एवं मङ्गल द्रव्य के थालों को लेकर राजद्वार में उपस्थित हुयीं। राज्य की सभी गलियाँ कस्तूरी, चन्दन तथा केसर के घोल से सुगन्धित हो रही थीं तथा घर-घर मङ्गलमय बधाई गायन हो रहा था।
तदनन्तर रानी कैकेयी एवं रानी सुमित्रा ने भी सुन्दर पुत्रों को जन्म दिया। उस परम सुख एवं सुन्दर क्षण का वर्णन करने में देवी सरस्वती एवं सर्पों के राजा शेषजी भी असमर्थ हैं। राजा दशरथ के दिव्य पुत्रों के प्राकट्य अवसर पर सम्पूर्ण अवधपुरी स्वर्ग के समान सुशोभित हो उठी थी। कुछ दिवस व्यतीत होने के पश्चात् ऋषि वसिष्ठ ने चारों राजकुमारों का नामकरण संस्कार किया। ऋषि वसिष्ठ को प्रणाम करते हुये राजा दशरथ ने कहा - "हे मुनिवर! आपके निर्मल मन में मेरे पुत्रों के लिये जो नाम आये हों, कृपया उनका वर्णन कीजिये।"
वशिष्ठजी ने कहा - "हे राजन्! इनके अनेक अनुपम नाम हैं, तथापि मैं अपनी बुद्धि के अनुसार वर्णन करता हूँ। ये जो आनन्दसिन्धु सुख की राशि हैं, जिनके एक अणु से तीनों लोक सुखी होते हैं, ऐसे आपके ज्येष्ठ पुत्र का नाम राम है। ये सुख के भण्डार एवं सम्पूर्ण लोकों को शान्ति प्रदान करने वाले हैं। जो समस्त संसार का भरण-पोषण करते हैं, ऐसे आपके द्वितीय पुत्र का नाम भरत होगा। जिनके स्मरण मात्र से शत्रु का नाश होता है, वेदों में प्रसिद्ध उनका नाम शत्रुघ्न है। जो शुभ लक्षणों के धाम, श्रीरामजी के प्रिय तथा सम्पूर्ण जगत् के आधार हैं, वे लक्ष्मण के नाम से प्रतिष्ठित होंगे।"
गुरु वसिष्ठ ने हृदय में विचारकर उपरोक्त नाम रखे तथा बोले - "हे राजन्! तुम्हारे चारों पुत्र वेद के तत्त्व एवं साक्षात् परात्पर भगवान हैं। जो मुनियों के धन, भक्तों के सर्वस्व तथा शिवजी के प्राण हैं। वे इस समय तुम लोगों के प्रेमवश ही बाललीला के रस में सुख लेने हेतु प्रकट हुये हैं।"
कालान्तर में वनवास के समय भगवान श्रीराम एवं लक्ष्मण जी ने रावण, कुम्भकर्ण एवं मेघनाथ आदि के अत्याचारों से संसार को मुक्त किया। नाना प्रकार के दुष्ट राक्षसों का संहार कर धर्म की स्थापना की, जिसके कारण ऋषि-मुनि पुनः यज्ञादि कर्म करने लगे।
इस प्रकार ब्राह्मण, गौ, देवता तथा साधु-सन्तों के लिये भगवान ने मनुष्य का अवतार लिया। वे अज्ञानमयी, मलिना माया तथा उसके गुण अर्थात् सत्, रज, तम तथा बाह्य एवं आन्तरिक इन्द्रियों से परे हैं। उनका दिव्य शरीर किसी कर्मबन्धन से परवश होकर त्रिगुणात्मक भौतिक पदार्थों के द्वारा नहीं, अपितु स्वेच्छा से ही निर्मित है।
॥इति श्री राम नवमी व्रत कथा सम्पूर्णः॥